भारत का नया ग्लोबल पावर गेम: पैसा,बाजार, अंतरिक्ष और ब्रिक्स -2047 तक दुनियाँ की आर्थिक धुरी बनने की तैयारी
अब भारत सिर्फ़ बाजार नहीं,वैश्विक शक्ति का केंद्र :शेयर बाजार,निवेश, अंतरिक्ष और ब्रिक्स से 2047 की निर्णायक छलांग -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर आज की दुनियाँ में किसी देश की आर्थिक ताकत का आकलन केवल उसके सकल घरेलू उत्पाद शेयर बाजार के सूचकांकों या विदेशी मुद्रा भंडार से नहीं किया जाता।वास्तविक शक्ति उस देश की इस क्षमता से तय होती है कि वह वैश्विक पूंजी कोकितना आकर्षित कर सकता है, अपनी आपूर्तिश्रृंखलाओं को कितना सुरक्षित रख सकता है,तकनीकी और रणनीतिक क्षेत्रों में कितनी आत्मनिर्भरता हासिल कर सकता है तथा बदलती विश्व व्यवस्था में अपनी आवाज को कितना प्रभावशाली बना सकता है।इसी दृष्टि से वर्ष 2026 भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण दिखाई देता है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह बताना चाहूंगा कि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की अमेरिका यात्रा, ज़ी20 में भारत की सक्रिय भूमिका, ईओएस-05 जैसे अत्याधुनिक पृथ्वी अवलोकन उपग्रह की सफलता,विदेशी मुद्रा भंडार का रिकॉर्ड स्तर और आगामी 12-13 सितंबर 2026 नई दिल्ली ब्रिक्स शिखर सम्मेलन,ये सभी घटनाएं अलग-अलग दिखाई देती हैं,लेकिन वास्तव में इनके पीछे एक साझा कहानी है: भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था में केवल भागीदार नहीं, बल्कि प्रभावशाली शक्ति बनने की दिशा में सटीकता से आगे बढ़ रहा है।
साथियों, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की हालिया अंतरराष्ट्रीय आर्थिक कूटनीति इस परिवर्तन का महत्वपूर्ण हिस्सा है।सरकारी कार्यक्रम के अनुसार 25 अगस्त से 2 सितंबर 2026 तक कनाडा और अमेरिका की यात्रा के दौरान उन्होंने निवेशकों, कंपनियों और वित्तीय क्षेत्र के प्रतिनिधियों से मुलाकात की तथा अमेरिका में शिकागो, एशविले और न्यूयॉर्क का दौरा किया।एशविले में 31 अगस्त और 1 सितंबर को आयोजित ज़ी 20 फाइनेंस मिनिस्टर्स एंड सेंट्रल बैंक गवर्नर्स बैठक में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व करना विशेष महत्व रखता है।इसका अर्थ यह है कि भारत वैश्विक आर्थिक संकटों पर प्रतिक्रिया देने वाला देश मात्र नहीं रहना चाहता,बल्कि वैश्विक आर्थिक नियमों, वित्तीय स्थिरता और विकास की दिशा तय करने वाली बातचीत में अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है। ऐसे समय में जब व्यापार तनाव, ऊर्जा कीमतों, ऋण संकट और भू-राजनीतिक संघर्षों ने वैश्विक निवेशकों के सामने अनिश्चितता बढ़ाई है, भारत का संदेश यह है कि उसकी अर्थव्यवस्था दीर्घकालिक निवेश, उत्पादन और तकनीकी विस्तार के लिए एक महत्वपूर्ण गंतव्य बनी हुई है।इसका सीधा प्रभाव भारतीय शेयर बाजार पर भी पड़ सकता है। जब वित्त मंत्री विश्व के बड़े निवेशकों के सामने भारत की आर्थिक क्षमता, निवेश अवसरों और वित्तीय क्षेत्र की संभावनाओं को प्रस्तुत करती हैं, तो इसका महत्व केवल कूटनीतिक नहीं होता। विदेशी संस्थागत निवेशक किसी बाजार में पैसा लगाने से पहले आर्थिक वृद्धि,मुद्रास्थिरता विदेशी मुद्रा भंडार राजकोषीय स्थिति,नीतिगत स्थिरता और कॉर्पोरेट संभावनाओं को देखते हैं।यदि इन मोर्चों पर विश्वास मजबूत होता है तो भारतीय इक्विटी बाजार में दीर्घकालिक विदेशी पूंजी का प्रवाह बढ़ सकताहैहालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि शेयर बाजार लगातार ऊपर ही जाएगा। वैश्विक ब्याज दरें, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, कच्चे तेल की कीमतें, युद्ध और व्यापार नीतियां भारतीय बाजार में अस्थिरता पैदा कर सकती हैं। इसलिए भारत की कहानी मजबूत होने के बावजूद निवेशकों के लिए जोखिम प्रबंधन उतना ही महत्वपूर्ण रहेगा।
साथियों, इसी आर्थिक कहानी को भारत के रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा भंडार ने और मजबूती दी है।28 अगस्त 2026 को समाप्त सप्ताह में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 11.475 अरब डॉलर बढ़कर 740.803 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया।विदेशी मुद्रा परिसंपत्तियां लगभग 600.67 अरब डॉलर और स्वर्ण भंडार लगभग 116.41 अरब डॉलर रहा। यह उपलब्धि भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महज एक आंकड़ा नहीं है। विशाल विदेशी मुद्रा भंडार वैश्विक झटकों के सामने सुरक्षा- कवच की तरह काम करता है।यदि डॉलर मजबूत होता है, पूंजी बाजारों में अचानक निकासी होती है या तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार भारतीय रिजर्व बैंक को बाजार में व्यवस्थित हस्तक्षेप और रुपये में अत्यधिक अस्थिरता को नियंत्रित करने की क्षमता देता है। यही कारण है कि रिकॉर्ड रिजर्व भारतीय और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के मन में भारत की बाहरी वित्तीय स्थिरता को लेकर विश्वास बढ़ा सकता है।रुपये के संदर्भ में भी इसका महत्व अत्यंत बड़ा है। विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत होने से बाजार में यह विश्वास पैदा होता है कि भारत के पास वैश्विक भुगतान दायित्वों और बाहरी झटकों से निपटने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं।लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी भी आवश्यक है,उच्च विदेशी मुद्रा भंडार अपने आप में रुपये को स्थायी रूप से मजबूत नहीं बनाता।कच्चे तेल का आयात, अमेरिकी डॉलर की वैश्विक मांग,ब्याज दरों का अंतर और पूंजी प्रवाह जैसे अनेक कारक रुपये की दिशा तय करते हैं। इसलिए रिकॉर्ड रिजर्व को भारत की वित्तीय ताकत का संकेत माना जाना चाहिए,न कि शेयर बाजार या मुद्रा में सटीकता से निश्चित तेजी की गारंटी।
साथियो, अब इस आर्थिक तस्वीर में अंतरिक्ष शक्ति को जोड़ना आवश्यक है। ईओएस -05 मिशन भारत की रणनीतिक और तकनीकी क्षमता के विस्तार का संकेत देता है। इसरो के अनुसार जीएसएलवी -एफ़ 17 ने ईओएस -05 को सब -जियोसिंचरोनास ट्रांसफर ओरबिट में स्थापित किया और ईओएस-05 भारत का पहला इमेजिग सटेलाइट है जिसे जियोसिंचरोनास ओरबिट से पृथ्वी अवलोकन के लिए डिजाइन किया गया है। लगभग 36,000 किलोमीटर की ऊंचाई वाले जियोसिंक्रोनस क्षेत्र में पृथ्वी अवलोकन की क्षमता का महत्व केवल सैन्य निगरानी तक सीमित नहीं है। इसका उपयोग मौसम, आपदा प्रबंधन,कृषि,पर्यावरण निगरानी और व्यापक राष्ट्रीय सुरक्षा आवश्यकताओं में किया जा सकता है। इस तरह अंतरिक्ष तकनीक अब भारत की अर्थव्यवस्था का भी हिस्सा बन रही है।
साथियों यहां से अंतरराष्ट्रीय निवेश के लिए एक नया क्षेत्र खुलता है।यदि भारत पृथ्वी अवलोकन,संचार,नेविगेशन, लॉन्च सेवाओं, सैटेलाइट डेटा और अंतरिक्ष-आधारित सेवाओं में अपनी क्षमता बढ़ाता है तो इससे निजी अंतरिक्ष कंपनियों, रक्षा- तकनीक, इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर,सेंसर,सॉफ्टवेयर और डेटा एनालिटिक्स कंपनियों के लिए नए बाजार बन सकते हैं। परिणाम स्वरूप भारतीय शेयर बाजार में केवल पारंपरिक बैंकिंग, आईटी या ऑटोमोबाइल कंपनियां ही नहीं, बल्कि स्पेस-टेक और डीप-टेक से जुड़ी कंपनियां भी भविष्य की निवेश कहानी का हिस्सा बन सकती हैं लेकिन ईओएस-05 की रणनीतिक अहमियत इससे भी आगे जाती है। आज दुनिया में युद्ध की प्रकृति बदल रही है। भविष्य के संघर्षों में जमीन, समुद्र और हवा के साथ अंतरिक्ष और साइबर क्षेत्र की भूमिका लगातार बढ़ सकती है। अमेरिका और चीन के बीच अंतरिक्ष क्षमता, उपग्रह नेटवर्क, संचार, नेविगेशन और पृथ्वी निगरानी को लेकर प्रतिस्पर्धा इसी बड़े बदलाव का संकेत है। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह अंतरिक्ष को केवल वैज्ञानिक उपलब्धि न मानकर आर्थिक,रणनीतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा अवसंरचना के रूप में विकसित करे। यदि भारत ऐसा करता है तो अंतरिक्ष क्षेत्र विज़न 2047 की तकनीकी शक्ति का महत्वपूर्ण स्तंभ बन सकता है।
साथियों, इसी बीच 12 और 13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में होने वाला 18वां ब्रिक्स सम्मिट भारत की वैश्विक आर्थिक कूटनीति के लिए एक और बड़ा अवसर है। भारत 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता कर रहा है और उसका थीम बिल्डिंग फॉर रेसिलिन्स, इन्नोवेशन, कोआपरेशन एंड
सस्टेएबिलिटी रखा गया है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार वर्षभर में 25 से अधिक शहरों में 350 से अधिक बैठकें और उच्चस्तरीय कार्यक्रम आयोजित किए जा चुके हैं। इसका अर्थ है कि ब्रिक्स केवल नेताओं की एक शिखर बैठक नहीं, बल्कि व्यापार, वित्त, निवेश, तकनीक और विकास सहयोग का विस्तृत मंच बन रहा है।
साथियों,ब्रिक्स और ज़ी 7 की तुलना करते समय इसे कौन जीता कौन हारा के सरल प्रश्न में सीमित करना उचित नहीं होगा।ज़ी 7 के पास विकसित गतिशील अर्थव्यवस्थाओं वैश्विक वित्तीय संस्थानों तकनीकी कंपनियों और पूंजी बाजारों में भारी प्रभाव है, जबकि ब्रिक्स का महत्व उभरती गतिशील अर्थव्यवस्थाओं ऊर्जा प्राकृतिक संसाधनों बड़े उपभोक्ता बाजारों और ग्लोबल साउथ की आवाज से जुड़ा है। दोनों समूहों की ताकत अलग-अलग क्षेत्रों में है। असली बदलाव यह है कि विश्व अर्थव्यवस्था अब एकध्रुवीय ढांचे से अधिक बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। भारत के लिए यह परिस्थिति चुनौती के साथ- साथ असाधारण अवसर भी है।नई दिल्ली में ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत को ग्लोबल साउथ और विकसित अर्थव्यवस्थाओं के बीच एक सेतु के रूप में प्रस्तुत करने का अवसर देगा। यदि भारत व्यापार, डिजिटल भुगतान, स्थानीय मुद्राओं में कारोबार, ऊर्जा सुरक्षा, महत्वपूर्ण खनिजों, विकास वित्त, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आपूर्ति श्रृंखला सहयोग पर व्यावहारिक पहल आगे बढ़ाता है,तो इसका लाभ भारतीय कंपनियों को मिल सकता है। भारतीय बैंकों, डिजिटल भुगतान कंपनियों, इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनियों, ऊर्जा क्षेत्र, फार्मा, ऑटोमोबाइल, आईटी और विनिर्माण क्षेत्र के लिए नए बाजार खुल सकते हैं। विदेशी निवेशकों के लिए भी भारत का आकर्षण केवल भारत में निवेश तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारत के माध्यम से वैश्विक बाजारों तक पहुंच का मॉडल बन सकता है।
साथियों भारतीय शेयर बाजार के लिए इन सभी घटनाओं का संयुक्त प्रभाव मनोवैज्ञानिक और वास्तविक दोनों हो सकता है। मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार बाजार को बाहरी झटकों के विरुद्ध भरोसा देता है; वैश्विक आर्थिक कूटनीति विदेशी निवेशकों का विश्वास बढ़ा सकती है; अंतरिक्ष और रक्षा तकनीक नए औद्योगिक अवसर पैदा कर सकते हैं; जबकि ब्रिक्स और ज़ी 20 में भारत की सक्रियता भारतीय कंपनियों के लिए नए वैश्विक बाजारों के दरवाजे खोल सकती है। इसके साथ घरेलू उपभोग, बुनियादी ढांचा निवेश, विनिर्माण विस्तार और डिजिटल अर्थव्यवस्था जुड़ जाए तो भारत का इक्विटी बाजार दीर्घकाल में व्यापक विकास कहानी का प्रतिनिधि बन सकता है।अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए भारत की सबसे बड़ी ताकत अब केवल तेज जीडीपी ग्रोथ नहीं होगी।उन्हें भारत में एक साथ कई कहानियां दिखाई देंगी,बड़ा उपभोक्ता बाजार, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना, विनिर्माण क्षमता, ऊर्जा संक्रमण, अंतरिक्ष तकनीक, रक्षा उत्पादन, वित्तीय गहराई, स्टार्टअप इकोसिस्टम और ग्लोबल साउथ के साथ बढ़ते आर्थिक संबंध। लेकिन भारत को इस अवसर को स्थायी पूंजी में बदलने के लिए नियामकीय स्थिरता, न्यायिक और संविदात्मक निश्चितता, बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता, कौशल विकास और कारोबार करने की सरलता पर निरंतर काम करना होगा।
साथियो, विज़न 2047 की दृष्टि से इन घटनाओं का महत्व सबसे अधिक है। विकसित भारत केवल तब बनेगा जब भारत आर्थिक रूप से बड़ा होने के साथ- साथ वित्तीय रूप से मजबूत, तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर, रणनीतिक रूप से सुरक्षित और वैश्विक स्तर पर प्रभावशाली बने। विदेशी मुद्रा भंडार भारत की वित्तीय ढाल को मजबूत करता है; अंतरिक्ष मिशन तकनीकी शक्ति का प्रदर्शन करता है; ज़ी 20 में आर्थिक कूटनीति वैश्विक नीति-निर्माण में भारत की आवाज को मजबूत करती है; और ब्रिक्स भारत को बदलती बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में नेतृत्व का मंच देता है। इन चारों को एक साथ देखने पर विज़न 2047 का आर्थिक खाका अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि भारत के सामने अवसर बहुत बड़ा है, लेकिन इसे स्वतः मिलने वाली उपलब्धि समझना सबसे बड़ी भूल होगी। वैश्विक अर्थव्यवस्था में पूंजी आज उसी देश की ओर जाती है जहां विकास की संभावना के साथ नीति की विश्वसनीयता, संस्थागत मजबूती और भविष्य की तकनीकी क्षमता दिखाई देती है।भारत के रिकॉर्ड विदेशी मुद्रा भंडार, अंतरराष्ट्रीय आर्थिक कूटनीति, अंतरिक्ष क्षेत्र में बढ़ती क्षमता और ब्रिक्स नेतृत्व ने एक मजबूत आधार तैयार किया है।अब अगला चरण इस आधार को रोजगार उत्पादकता, निर्यात, निजी निवेश, नवाचार और आम नागरिक की आय में बदलने का है।यदि भारत ऐसा करने में सफल रहता है तो 2047 केवल स्वतंत्रता की शताब्दी का उत्सव नहीं होगा, बल्कि उस समय तक भारत विश्व अर्थव्यवस्था का एक निर्णायक केंद्र, वैश्विक पूंजी का प्रमुख गंतव्य और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था का प्रभावशाली स्तंभ बन सकता है। यही इन चार घटनाओं का सबसे बड़ा संयुक्त संदेश है, भारत अब वैश्विक अर्थव्यवस्था को केवल देख नहीं रहा; वह उसके अगले अध्याय को आकार देने की तैयारी कर रहा है।
क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318
