तू मेहरबाना मेहर करो,मैं नित नित गंदला होता,
अपने ही कर्मों के कारण,अंदर से दुखड़ा रोता।
माया-मोह ने घेर लिया,मन अपना राह भुलाता,
तेरी रहमत की एक नजर, डूबे को पार लगाता।
मेरे दाग न देख दातार,अपनी मेहर बरसा देना,
भटके हुए इस मन को तू,चरणों में अपने लगा लेना।
मैं कच्चा घड़ा हूँ मालिक,पल-पल टूटता जाता,
तेरा नाम सहारा बनकर,जीवन मेरा संवारता।
तेरी कृपा की बूंद पड़े तो,मन निर्मल हो जाए,
अहंकार की काली घटा हटे,भीतर सूरज उग आए।
झूठी दुनिया की चाह मिटे,सच्चे रंग में रंग जाऊँ,
तेरे नाम की धुन में मालिक,अपना आप भुलाऊँ।
तू चाहे तो काँटा भी प्रभु,फूलों जैसा खिल जाए,
तेरी नजर पड़े जिस पर,उसका भाग्य बदल जाए।
मेरी झोली खाली है,इसमें अपनी दया भर देना,
जिस राह से तू खुश हो मालिक,उसी राह पर चल देना।
तू मेहरबाना मेहर करो,बस इतनी अरदास हमारी,
तेरे बिना अधूरी लगती,दुनियाँ की हर खुशहाली।
किशन जब अंतिम साँस चले मेरी,नाम तेरा ही होठों पर,
तेरी मेहर में मिट जाऊँ मैं, तेरे ही पावन चरणों पर।

क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318