अच्छाई और बुराई,वस्तु में नहीं कर्म में होती है,
मन की सोच ही हर राह को सुंदर या मर्म में ढोती है।
कोई बाँस को तराशकर तीर बना देता है,
कोई उसी बाँस में मधुर बाँसुरी का स्वर जगा देता है।
तीर बने तो उसकी दिशा हर जीवन को घायल करती है,
बाँसुरी बने तो उसकी धुन मन की पीड़ा हरती है।
वस्तु वही रहती है, बदलता केवल उपयोग है,
इंसान के कर्मों में ही छिपा उसका असली स्वरूप है।
जिस हाथ में करुणा हो,वह काँटों में फूल खिलाता है,
जिस मन में द्वेष भरा हो,वह अपनों को भी ठुकराता है।
ज्ञान वही है, पर सोच उसे प्रकाश या अँधेरा बनाती है,
कर्मों की हर छोटी-बड़ी धारा जीवन की दिशा बताती है।
शक्ति मिले तो उसका उपयोग सुरक्षा का आधार बने,
वाणी मिले तो वह प्रेम और विश्वास का संसार बने।
हर साधन का मूल्य उसके सदुपयोग से बढ़ता है,
मानव का सच्चा चरित्र उसके कर्मों से ही गढ़ता है।
इसलिए मन में प्रेम,दया और सद्भाव जगाइए,
हर शक्ति को जनहित की सुंदर राह पर लगाइए।
किशन बाँस बने बाँसुरी,जीवन में मधुरता भर जाए,
अच्छे कर्मों की सुगंध से संसार सँवर जाए।
क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318
