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नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023: पारिवारिक पुरुषों द्वारा नेतृत्व में दखलअंदाजी,न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन होगा, बल्कि पारिवारिक संबंधों में भी तनाव उत्पन्न कर सकता है -सख्त अपराधिक सज़ा का प्रावधान जरूरी

by Page 3 News International Desk
April 17, 2026
in Hindi Editorials
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महिलाओं का विशेष संकल्प व जनता से एकल नेतृत्व का वादा जरूरी- प्रतिनिधित्व से नेतृत्व तक संकल्प, संरचना और सशक्तिकरण का नया अध्याय

नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 महिला सशक्तिकरण से पारिवारिक कलह का कारण ना बने,इसलिए नेतृत्व में पुरुष की दखलअंदाजी पर कड़ी सजा का प्रावधान हो- एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 एक मील का पत्थर साबित होगा। यह केवल एक संवैधानिक संशोधन नहीं,बल्कि सामाजिक संरचना,राजनीतिक भागीदारी और लैंगिक न्याय की दिशा में एक व्यापक परिवर्तनकारी पहल है। इस अधिनियम के माध्यम से संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण प्रदान करने का प्रावधान किया गया है, जिससे देश की आधी आबादी को नीति-निर्माण के केंद्र में स्थान मिले। किंतु यह आरक्षण केवल प्रतिनिधित्व का अवसर नहीं है, बल्कि इसके साथ एक बड़ी जवाबदेही भी जुड़ी है स्वतंत्र नेतृत्व की स्थापना। यह अपेक्षा की जा रही है कि महिलाएं इस अवसर को केवल प्रतीकात्मक उपस्थिति तक सीमित न रखें, बल्कि अपने स्वयं के निर्णय, दृष्टि और नेतृत्व क्षमता के आधार पर राजनीति में अपनी पहचान स्थापित करें। इस संदर्भ में सरकार की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि महिलाओं के नेतृत्व में पुरुषों की दखल अंदाजी को रोकना है, तो इसके लिए केवल सामाजिक जागरूकता पर्याप्त नहीं होगी,बल्कि कानूनी प्रावधानों की भी आवश्यकता होगी। एक सख्त अधिनियम के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि यदि कोई पुरुष किसी महिला जनप्रतिनिधि के अधिकारों में हस्तक्षेप करता है या उसके नाम पर निर्णय लेता है, तो उसे दंडित किया जाए। यह दंड केवल प्रतीकात्मक न होकर प्रभावी और निवारक होना चाहिए, ताकि भविष्य में ऐसी प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाया जा सके। इसके साथ ही, महिलाओं के लिए नेतृत्व प्रशिक्षण, राजनीतिक शिक्षा और प्रशासनिक कौशल विकास के कार्यक्रम भी चलाए जाने चाहिए, जिससे वे आत्मनिर्भर बन सकें।क्यों क़ि आज के सामाजिक और राजनीतिक परिदृश्य में एक महत्वपूर्ण चुनौती यह है कि कई महिला जनप्रतिनिधियों के पीछे वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति उनके पारिवारिक पुरुष सदस्यों, जैसे पति, पिता या भाई के हाथों में होती है। इस प्रवृत्ति को अक्सर प्रॉक्सी राजनीति कहा जाता है। यह न केवल लोकतंत्र की आत्मा के विरुद्ध है, बल्कि मतदाताओं के विश्वास का भी हनन है। जब जनता एक महिला को उसकी ईमानदारी, संवेदनशीलता और नेतृत्व क्षमता के आधार पर चुनती है, तो यह अपेक्षा करती है कि वह स्वयं निर्णय लेगी, न कि किसी अन्य के निर्देशों पर कार्य करेगी। इसलिए, अब समय आ गया है कि महिलाएं स्वयं संकल्प लें कि वे किसी भी प्रकार के बाहरी या पारिवारिक दबाव से मुक्त होकर नेतृत्व करेंगी। उन्हें अपनी बौद्धिक,भावनात्मक और प्रशासनिक क्षमताओं का विकास करना होगा, ताकि वे न केवल प्रभावी जनप्रतिनिधि बन सकें, बल्कि समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत भी बनें।
साथियों माननीय प्रधानमंत्री द्वारा सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्सः (पूर्व में ट्विटर) के माध्यम से महिलाओं से यह अपील की गई है कि वे अपने क्षेत्र के विधायकों और सांसदों को पत्र लिखकर नारी शक्ति वंदनअधिनियम 2023 के समर्थन में सहयोग दें। यह पहल न केवल महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को मजबूत करने का प्रयास है, बल्कि उन्हें नीति-निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित भी करती है।परंतु इसी संदर्भ में एक महिला द्वारा दिया गया सुझाव अत्यंत महत्वपूर्ण और विचारणीय है। उनका कहना है कि वर्तमान समय में कई स्थानों पर महिला जन प्रतिनिधियों के नेतृत्व में उनके पति या अन्य पुरुष परिजन हस्तक्षेप करते हैं, जिससे वास्तविक महिला सशक्तिकरण प्रभावित होता है। ऐसे में यदि अधिनियम के अंतर्गत पुरुषों द्वारा इस प्रकार की दखल अंदाजी पर सख्त कानूनी प्रावधान नहीं बनाए गए, तो यह न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन होगा, बल्कि पारिवारिक संबंधों में भी तनाव उत्पन्न कर सकता है।इसलिए आवश्यक है कि नारी शक्ति वंदन अधिनियम में स्पष्ट रूप से यह प्रावधान जोड़ा जाए कि किसी भी महिला जनप्रतिनिधि के अधिकारों में बाहरी या पारिवारिक हस्तक्षेप को अपराध की श्रेणी में रखा जाए। साथ ही, ऐसे मामलों में कठोर दंड का प्रावधान हो, ताकि महिलाओं को स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने का अधिकार मिल सके।यह कदम न केवल महिला नेतृत्व को सशक्त बनाएगा, बल्कि समाज में वास्तविक लैंगिक समानता स्थापित करने की दिशा में भी एक मजबूत संदेश देगा।
साथियों इस ऐतिहासिक पहल को राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक समर्थन भी प्राप्त हो रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अधिनियम के समर्थन में लोकसभा और राज्यसभा के सभी दलों के नेताओं को पत्र लिखकर एकजुटता की अपील की है। उन्होंने इसे किसी एक पार्टी या व्यक्ति से ऊपर उठकर राष्ट्रहित का विषय बताया है। यह दृष्टिकोण दर्शाता है कि यह अधिनियम केवल राजनीतिक लाभ के लिए नहीं, बल्कि भारत के भविष्य के निर्माण के लिए लाया गया है। प्रधानमंत्री का यह प्रयास लोकतंत्र की उस भावना को मजबूत करता है, जिसमें सभी दल मिलकर एक साझा लक्ष्य की दिशा में कार्य करते हैं। हालांकि, यह भी अपेक्षा की जा रही है कि सरकार इस अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए ठोस कदम उठाएगी, विशेष रूप से महिलाओं के नेतृत्व में बाहरी हस्तक्षेप को रोकने के लिए।
साथियों इस अधिनियम को देश के वरिष्ठ और अनुभवी नेताओं का भी समर्थन प्राप्त हो रहा है। भारत की पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर इस विधेयक की सराहना की है और इसे भारतीय लोकतंत्र के लिए एक परिवर्तनकारी कदम बताया है। उनका यह समर्थन केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि नैतिक और वैचारिक भी है। एक महिला होने के नाते उन्होंने इस अधिनियम के महत्व को गहराई से समझा है और यह विश्वास व्यक्त किया है कि यह महिलाओं को सशक्त बनाने की दिशा में एक निर्णायक कदम सिद्ध होगा। उनका यह समर्थन देश की महिलाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है और यह दर्शाता है कि शीर्ष नेतृत्व भी इस परिवर्तन के पक्ष में है।
साथियों राज्य स्तरपर भी इस अधिनियम को लेकर सक्रियता देखी जा रही है। छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव सहाय ने राज्य के सभी सांसदों, विधायकों और राज्यसभा सदस्यों को पत्र लिखकर इस अधिनियम के प्रभावी क्रियान्वयन की अपील की है। उन्होंने महिला संगठनों को भी इस प्रक्रिया में सक्रिय भागीदारी निभाने के लिए आमंत्रित किया है। यह पहल दर्शाती है कि राज्य सरकारें भी इस अधिनियम को गंभीरता से ले रही हैं और इसे जमीनी स्तर पर लागू करने के लिए प्रयासरत हैं। हालांकि, यह भी आवश्यक है कि राज्य सरकारें महिलाओं के खिलाफ होने वाले अत्याचारों पर कठोर कार्रवाई करें और यह सुनिश्चित करें कि महिला जनप्रतिनिधियों को स्वतंत्र रूप से कार्य करने का वातावरण मिले।
साथियों नारी शक्ति वंदन अधिनियम का वास्तविक उद्देश्य केवल महिलाओं की संख्या बढ़ाना नहीं है, बल्कि उन्हें सशक्त बनाना है। यह सशक्तिकरण तभी संभव है जब महिलाएं स्वयं नेतृत्व की जिम्मेदारी को स्वीकार करें और उसे निभाने के लिए आवश्यक कौशल विकसित करें। इसके लिए उन्हें शिक्षा, प्रशिक्षण और संसाधनों की आवश्यकता होगी। साथ ही, समाज को भी अपनी सोच में बदलाव लाना होगा और महिलाओं को केवल “सहायक” के रूप में नहीं, बल्कि “नेता” के रूप में स्वीकार करना होगा।
साथियों अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की इस पहल को एक सकारात्मक कदम के रूप में देखा जा रहा है।दुनिया के कई देशों में महिला प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के लिए आरक्षण या कोटा प्रणाली लागू की गई है, जैसे कि रवांडा, नॉर्वे और फ्रांस। इन देशों में महिलाओं की भागीदारी ने न केवल नीति-निर्माण को अधिक समावेशी बनाया है, बल्कि सामाजिक विकास के संकेतकों में भी सुधार किया है। भारत यदि इस अधिनियम को प्रभावी रूप से लागू करता है, तो यह वैश्विक मंच पर एक उदाहरण प्रस्तुत कर सकता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 एक अवसर है,एक ऐसा अवसर जो भारत को एक अधिक न्यायपूर्ण, समावेशी और सशक्त राष्ट्र बना सकता है। लेकिन यह अवसर तभी सफल होगा जब महिलाएं स्वयं नेतृत्व की जिम्मेदारी को स्वीकार करें और समाज, सरकार तथा संस्थाएं उन्हें आवश्यक समर्थन प्रदान करें। यह समय है संकल्प का, साहस का और परिवर्तन का। यदि महिलाएं यह ठान लें कि वे अपने बल पर नेतृत्व करेंगी, तो न केवल यह अधिनियम सफल होगा, बल्कि भारत का विजन 2047 भी साकार होगा एक ऐसा भारत, जहां नारी केवल शक्ति का प्रतीक नहीं, बल्कि परिवर्तन की अग्रदूत होगी।

kishanchand sanmukhadas Bhawnani
संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यम सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425

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