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नागरिक देवो भव:भ्रष्टाचार-मुक्त भारत की ओर एक निर्णायक यात्रा- आम नागरिक के लिए सरकार का मतलब संसद या मंत्रालय नहीं,उसका स्थानीय सरकारी तहसील कार्यालय, नगर निगम,पुलिस स्टेशन, सरकारी अस्पताल ही सरकार का चेहरा होता है-समग्र विश्लेषण

by Page 3 News International Desk
April 3, 2026
in Hindi Editorials
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भ्रष्टाचार केवल आर्थिक अपराध नहीं, सामाजिक विश्वास का हनन-नागरिक सर्वोपरि और उसकी सेवा ही सर्वोच्च कर्तव्य है अपने की ज़रूरत

भ्रष्टाचार को जीरो टॉलरेंस क़रने,डेडलाइन बनाने के साथ -साथ शासकीय रुतबे को त्यागने, सेवा को अपनाने नागरिक देवो भव को जीवन का मूल मंत्र बनाने का संकल्प लेना ज़रूरी -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत की सभ्यता और संस्कृति का मूल मंत्र सदियों से अतिथि देवो भव रहा है, जिसने न केवल सामाजिक मूल्यों को आकार दिया,बल्कि भारत की वैश्विक पहचान भी स्थापित की।किंतु आज के परिवर्तित समय में यह आवश्यकता महसूस की जा रही है कि इस मंत्र को एक व्यापक और अधिक समकालीन रूप देते हुए नागरिक देवो भव के रूप में स्थापित किया जाए। यह केवल एक नारा नहीं,बल्कि शासन व्यवस्था में मूलभूत परिवर्तन का दर्शन है। जब तक शासन के केंद्र में नागरिक नहीं होगा,तब तक विकास की कोई भी परिकल्पना अधूरी ही रहेगी। यह मंत्र केवल एक नारा नहीं, बल्कि शासन व्यवस्था के मूल चरित्र में आमूल-चूल परिवर्तन का आह्वान है। 2 अप्रैल 2026 को प्रधानमंत्री द्वारा कर्मयोगी साधना सप्ताह के दौरान दिया गया संदेश इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित हो सकता है।वर्तमान समय में जब भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में 2047 का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है तब भ्रष्टाचार इस यात्रा का सबसे बड़ा अवरोध बनकर सामने आता है।इसलिए यह समय की मांग है कि जैसे नक्सलवाद के उन्मूलन के लिए समय सीमा 31 मार्च 2026 निर्धारित की गई और लक्ष्य को प्राप्त कर लिया गया,वैसे ही भ्रष्टाचार के समूल नाश के लिए भी एक ठोस और समयबद्ध रणनीति अपनाई जाए। जिसकी मांग मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र गृह मंत्री श्री अमित शाह जी से हर आर्टिकल के माध्यम से करते रहता हूं आज फिर इस आर्टिकल के माध्यम से निवेदन कर रहा हूं।भ्रष्टाचार केवल आर्थिक अपराध नहीं है,यह सामाजिक विश्वास का हनन है। यह उस तंत्र को खोखला करता है, जिसपर लोकतंत्र टिका होता है। विकसित भारत के मार्ग में सबसे बड़ा अवरोध यदि हम ईमानदारी से आत्ममंथन करें,तो पाएंगे कि भारत के विकास के मार्ग में सबसे बड़ा रोड़ा भ्रष्टाचार है। यह केवल आर्थिक क्षति नहीं पहुंचाता, बल्कि सामाजिक विश्वास, प्रशासनिक पारदर्शिता और लोकतांत्रिक मूल्यों को भी कमजोर करता है।भ्रष्टाचार एक ऐसी दीमक है, जो व्यवस्था को भीतर से खोखला कर देती है। चाहे वह एक छोटे स्तर का कर्मचारी हो या उच्च पदस्थ अधिकारी जब तक काम निकालने की मानसिकता और जुगाड़ संस्कृति समाज में बनी रहेगी, तब तक भ्रष्टाचार का पूर्ण उन्मूलन संभव नहीं।जब एक आम नागरिक सरकारी दफ्तर में जाता है,तो वह केवल एक सेवा की अपेक्षा नहीं करता,बल्कि वह न्याय,पारदर्शिता और सम्मान की भी उम्मीद करता है। यदि उसे वहां भ्रष्टाचार,उपेक्षा या अपमान का सामना करना पड़ता है,तो उसका विश्वास न केवल उस संस्था से,बल्कि पूरे शासन तंत्र से उठने लगता है।यही कारण है कि नागरिक देवो भव की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है,क्योंकि यह शासन के हर स्तर पर यह सुनिश्चित करती है कि नागरिक सर्वोपरि है और उसकी सेवा ही सर्वोच्च कर्तव्य है।
साथियों बात अगर हम नागरिक देवो भव की संकल्पना को समझने की करें तो इसका का अर्थ है,हर नागरिक को सर्वोच्च प्राथमिकता देना।यह सोच प्रशासन को पावर-सेंट्रिक से पीपल-सेंट्रिक बनाती है।इस अवधारणा के अंतर्गत:सरकारी पद केवल अधिकार का प्रतीक नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम बनता है,अधिकारी और कर्मचारी अपने रुतबे को त्यागकर सेवाभाव को अपनाते हैं, हर निर्णय में नागरिक के हित को सर्वोपरि रखा जाता हैयदि चपरासी से लेकर मंत्री तक हर व्यक्ति इस भावना को आत्मसात कर ले, तो भ्रष्टाचार का स्वतः ही अंत हो सकता है।व्यक्तिगत परिवर्तन से संस्थागत परिवर्तन तक पीएम ने अपने संबोधन में एक अत्यंत महत्वपूर्ण बात कही हमारा व्यक्तिगत परिवर्तन ही संस्थागत परिवर्तन का आधार बन सकता है।यह विचार अत्यंत गहरा है। जब एक व्यक्ति अपने कर्तव्यों के प्रति ईमानदार होता है, तो उसका प्रभाव पूरे संस्थान पर पड़ता है।एक ईमानदार क्लर्क पूरी फाइल प्रक्रिया को पारदर्शी बना सकता है,एक जिम्मेदार अधिकारी पूरे विभाग की कार्यशैली बदल सकता हैएक संवेदनशील मंत्री नीति निर्माण को जनहितकारी बना सकता है,इस प्रकार,इंडिविजुअल ट्रांसफॉर्मेशन ही इंस्टिट्यूशनल ट्रांसफॉर्मेशन का आधार बनता है।स्थानीय प्रशासन: सरकार का वास्तविक चेहरा आम नागरिक के लिए सरकार का मतलब संसद या मंत्रालय नहीं होता, बल्कि उसका स्थानीय सरकारी कार्यालय ही सरकार का चेहरा होता है।तहसील कार्यालय नगर निगम,पुलिस स्टेशन,सरकारी अस्पताल यही वे स्थान हैं, जहां नागरिक सीधे सरकार से जुड़ता है। यदि यहां का व्यवहार सकारात्मक, पारदर्शी और संवेदनशील होगा, तो लोकतंत्र में विश्वास स्वतः ही मजबूत होगा। लेकिन यदि यहां भ्रष्टाचार, देरी और असंवेदन शीलता होगी, तो जनता का विश्वास डगमगा जाएगा।कर्तव्य- प्रधान प्रशासन: अधिकार से अधिक जिम्मेदारीपीएम ने प्रशासनिक संस्कृति में एक महत्वपूर्ण बदलाव की आवश्यकता पर जोर दिया, अधिकार से अधिक कर्तव्य पर ध्यान केंद्रित करना।भारतीय संविधान भी यही सिखाता है कि अधिकार, कर्तव्यों के निर्वहन से ही प्राप्त होते हैं।जब कोई अधिकारी हर निर्णय से पहले यह सोचता है कि:यह निर्णय जनता के लिए कितना लाभकारी है? इससे कितने लोगों का जीवन प्रभावित होगा?तो उसके निर्णय स्वतः ही अधिक प्रभावी और सटीक रूप से अति जनहितकारी बन जाते हैं।
साथियों बात अगर हरशासकीय कर्मचारी द्वारा इस भाव की संकल्पना को समझने की करें तो,हम आज आवश्यकता है कि चपरासी से लेकर उच्चतम अधिकारी तक,संत्री से लेकर मंत्री तक,हर शासकीय कर्मचारी इस भावना को अपने भीतर आत्मसत करे। पद का अहंकार छोड़कर सेवा का भाव अपनाना ही इस परिवर्तन की कुंजी है। जब एक अधिकारी अपने पद को अधिकार के रूप में नहीं, बल्कि जिम्मेदारी के रूप में देखेगा, तभी वास्तविक परिवर्तन संभव होगा।यह व्यक्तिगत परिवर्तन ही संस्थागत परिवर्तन का आधार बनता है। यदि हर व्यक्ति यह सोचने लगे कि उसके एक निर्णय से कितने लोगों का जीवन प्रभावित होगा,तो वह निर्णय अधिक जिम्मेदार और पारदर्शी होगा।
साथियों बात अगर हम वर्तमान समय में भारत की करें तो, भारत एक आकांक्षी समाज के रूप में उभर रहा है, जहां हर नागरिक के अपने सपने हैं, अपने लक्ष्य हैं। इन सपनों को साकार करने की जिम्मेदारी केवल नागरिक की नहीं, बल्कि पूरे शासन तंत्र की भी है। जब सरकार और नागरिक के बीच विश्वास का संबंध मजबूत होता है, तभी विकास की गति तेज होती है।इसके लिए यह आवश्यक है कि प्रशासनिक व्यवस्था अधिकसंवेदनशील उत्तरदायी और पारदर्शी बने। नागरिक देवो भव का सिद्धांत इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जो शासन को नागरिक- केंद्रित बनाता है।इस संदर्भ में क्षमता निर्माण आयोग (कैपेसिटी बिल्डिंग कमिशन) और आईगोट मिशन कर्मयोगी जैसी पहलें अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं। इनका उद्देश्य केवल प्रशिक्षण देना नहीं है,बल्कि एक नई कार्यसंस्कृति का निर्माण करना है, जहां हर सरकारी कर्मचारी एक कर्मयोगी के रूप में कार्य करे। कर्मयोगी वह होता है,जो अपने कर्तव्य को पूजा मानता है और बिना किसी स्वार्थ के सेवा करता है। जब यह भावना प्रशासन में विकसित होती है,तो वह केवल कार्य निष्पादन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह समाज में सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बनती है।प्रशासनिक सुधारों के लिए यह भी आवश्यक है कि विभागों के बीच समन्वय और संवाद को बढ़ावा दिया जाए। अक्सर देखा जाता है कि विभिन्न विभागों के बीच संवादहीनता के कारण योजनाएं प्रभावी रूप से लागू नहीं हो पातीं। इससे न केवल संसाधनों की बर्बादी होती है, बल्कि नागरिकों को भी असुविधा का सामना करना पड़ता है। यदि सभी विभाग एक साझा दृष्टिकोण और समझ के साथ कार्य करें, तो शासन अधिक प्रभावी और सटीक रूप से परिणामोन्मुखी बन सकता है।
साथियों बात अगर हम भ्रष्टाचार को जीरो टॉलरेंस की नीति को समझने की करें तो, भ्रष्टाचार के उन्मूलन के लिए केवल नीतियां बनाना पर्याप्त नहीं है,बल्कि उन्हें प्रभावी रूप से लागू करना भी आवश्यक है।इसके लिए एक सशक्त निगरानी तंत्र, पारदर्शी प्रक्रिया और समयबद्ध कार्रवाई अनिवार्य है। यदि किसी भ्रष्टाचार के मामले की जांच वर्षों तक लंबित रहती है, तो यह न केवल न्याय में देरी है,बल्कि यह भ्रष्टाचार को बढ़ावा भी देता है।इसलिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक मामले की जांच के लिए एक निश्चित समयसीमा तय की जाए और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए।
साथियों बात अगर हम भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त करने के लिए स्रोतों की करें तो,तकनीक का उपयोग भी भ्रष्टाचार को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। डिजिटल गवर्नेंस, ऑनलाइन सेवाएं,और पारदर्शी डेटा प्रणाली से न केवल प्रक्रियाएं सरल होती हैं, बल्कि मानव हस्तक्षेप भी कम होता है, जिससे भ्रष्टाचार की संभावनाएं घटती हैं। प्रत्यक्ष लाभ अंतरण जैसी योजनाओं ने यह साबित किया है कि यदि सही तरीके से तकनीक का उपयोग किया जाए, तो बिचौलियों की भूमिका समाप्त की जा सकती है और लाभ सीधे नागरिकों तक पहुंचाया जा सकता है।
साथियों बात अगर हम नागरिक देवो भव के क्रियान्वयन की करें तो इसकी भावना को केवल सरकारी कर्मचारियों तक सीमित नहीं रखा जा सकता, बल्कि इसे समाज के हर वर्ग तक फैलाना होगा।जब नागरिक स्वयं भी अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक होंगे और भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाएंगे,तभी यह आंदोलन व्यापक रूप ले सकेगा। इसके लिए जन जागरूकता अभियान, शिक्षा और सामाजिक सहभागिता अत्यंत आवश्यक हैं। सफलता का एक महत्वपूर्ण सिद्धांत यह भी है कि दूसरों को छोटा दिखाने के बजाय स्वयं को बेहतर बनाया जाए। यही सिद्धांत शासन व्यवस्था पर भी लागू होता है। यदि हम अपने तंत्र को अधिक सक्षम, पारदर्शी और संवेदनशील बनाते हैं, तो भ्रष्टाचार स्वतः ही समाप्त होने लगेगा। इसके लिए निरंतर सुधार,नवाचार और सीखने की प्रवृत्ति को सटीक रूप से अपनाना होगा।
साथियों बात अगर हम गुरुवार दिनांक 2 अप्रैल 2026 को प्रधानमंत्री द्वारा कर्मयोगी साधना सप्ताह के दौरान दिए गए संदेश को समझने की करें तो वह इसी दिशा में एक प्रेरणास्रोत है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि शासन का मूल मंत्र नागरिक देवो भव होना चाहिए और प्रत्येक लोक सेवक को अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ करना चाहिए।उन्होंने यह भी कहा कि आम नागरिक के लिए स्थानीय सरकारी कार्यालय ही सरकार का चेहरा होता है, इसलिए वहां का व्यवहार और कार्यशैली अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि वहां पारदर्शिता, संवेदनशीलता और उत्तरदायित्व होगा, तो जनता का विश्वास स्वतः ही मजबूत होगा।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़िनागरिक देवो भव केवल एक विचार नहीं, बल्कि एक क्रांति है,एक ऐसी क्रांति, जो भारत की प्रशासनिक, सामाजिक और नैतिक संरचना को बदल सकती है।यदि:हर अधिकारी सेवाभाव अपनाए,हर नागरिक जागरूक बने,हर निर्णय में जनहित सर्वोपरि होतो वह दिन दूर नहीं, जब भारत वास्तव में भ्रष्टाचार मुक्त बन जाएगा।और तब विकसित भारत 2047 केवल एक सपना नहीं,बल्कि एक साकार वास्तविकता होगी।अंततः, यह समय है,रुतबे को त्यागने का,सेवा को अपनाने का,और “नागरिक देवो भव” को जीवन का मूल मंत्र बनाने का।

kishan2 2
संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यम सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425

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