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माता-पिता क़े परित्याग पर कठोर कानून- संवैधानिक संतुलन, अंतरराष्ट्रीय अनुभव और भारत के लिए नीतिगत रोडमैप सर्वोच्च प्राथमिकता

by Page 3 News International Desk
February 18, 2026
in Hindi Editorials
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छल कपट और पाप न कर बंदिया

आओ चैन की नींद सोएं-पर्याप्त नींद के बिना दीर्घकालीन और गंभीर समस्या महसूस हो सकती है

एफएसएसएआई की ताज़ा मिल्क सर्विलांस रिपोर्ट 2025- जांच में 38 प्रतिशत नमूने मिलावटी, हर तीन में से एक नमूना फेल -उम्र कैद व 10 लाख तक जुर्माना जैसे प्रावधान निष्प्रभावी? -एक समग्र विश्लेषण

बदलती भारतीय संस्कृति, प्रवासी संतानों की जिम्मेदारी और बुजुर्ग माता-पिता का संरक्षण-सशक्त पांच समकालीन कानूनों की आवश्यकता

भारत में बुजुर्ग माता-पिता क़ा परित्याग, उपेक्षा व अकेले छूटते जाना,यह केवल भावनात्मक प्रश्न नहीं,बल्कि सामाजिक न्याय,मानवाधिकार व केंद्र,राज्य क़े उत्तरदायित्व-व्यवस्था से जुड़ा विषय है -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत की सभ्यता की मूल आत्मा मातृदेवो भव,पितृदेवो भव के आदर्श में निहित रही है।भारतीय परिवार व्यवस्था केवल रक्त संबंधों का ढांचा नहीं,बल्कि नैतिक उत्तरदायित्व,त्याग, सह- अस्तित्व और पीढ़ियों के परस्पर सम्मान पर आधारित एक सामाजिक अनुबंध है। किंतु 21वीं सदी के तीव्र वैश्वीकरण, शहरीकरण और प्रवासन के युग में यह पारंपरिक ताना-बाना तेज़ी से बदल रहा है। छोटे शहरों और गांवों से निकलकर युवा मेट्रो सिटीज़ और विदेशों में बस रहे हैं।आर्थिक प्रगति, करियर अवसर और वैश्विक एक्सपोज़र निश्चित रूप से सकारात्मक परिवर्तन हैं,परंतु इन उपलब्धियों की छाया में मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह महसूस कर रहा हूं कि एक गंभीर सामाजिक संकट भी उभर रहा है, भारत में अकेले छूटते जा रहे बुजुर्ग माता -पिता की उपेक्षा! यह केवल भावनात्मक प्रश्न नहीं,बल्कि सामाजिक न्याय,मानवाधिकार और राज्य की उत्तरदायित्व -व्यवस्था से जुड़ा विषय है।भारत से बाहर रहने वाले भारतीयों की संख्या लगभग साढ़े तीन करोड़ बताई जाती है। इनमें से बड़ी संख्या ऐसे लोगों की है जिनके माता-पिता भारत में ही रहते हैं। प्रारंभिक वर्षों में प्रवासी संतानें आर्थिक सहायता और नियमित संपर्क बनाए रखती हैं,परंतु समय बीतने के साथ पारिवारिक लगाव का क्षरण होने लगता है।अनेक मामलों में बुजुर्ग माता-पिता आर्थिक,शारीरिक और भावनात्मक रूप से असुरक्षित स्थिति में रह जाते हैं। पिछले वर्ष ऐसे 500 से अधिक मामले सामने आए, जिनमें अकेले रह रहे माता- पिता की मृत्यु अत्यंत दुखद परिस्थितियों में हुई और संतान समय पर लौटकर भी नहीं आई। दिल्ली और इंदौर जैसे शहरों में सामने आई घटनाओं ने समाज को झकझोर दिया है।यह स्थिति केवल व्यक्तिगत नैतिक विफलता नहीं है; यह एक संरचनात्मक शून्य की ओर संकेत करती है। संयुक्त परिवार से एकल परिवार की ओर संक्रमण, बढ़ती जीवनशैली लागत,विदेशों में व्यावसायिक दबाव और सांस्कृतिकअनुकूलन के कारण संतानें अक्सर अपने मूल दायित्वों से दूर हो जाती हैं। परिणामस्वरूप, माता-पिता सामाजिक अलगाव, आर्थिक निर्भरता और मानसिक अवसाद का सामना करते हैं।हाल ही में राज्यसभा के बजट सत्र में राधा मोहन अग्रवाल साहब ने यह मुद्दा जोरदार तरीके से उठाया जो तारीफ़ ए काबिल है,उन्होंने प्रस्ताव रखा कि जो प्रवासी भारतीय अपने माता-पिता की देखभाल नहीं करते, उनके पासपोर्ट रद्द किए जाएँ। उन्होंने यह भी सुझाव दिया कि विदेश जाने से पहले संतान से हलफनामा लिया जाए,जिसमें वे अपनी आय का एक निश्चित हिस्सा माता-पिता को देने, उनके लिए केयरटेकर और बीमा की व्यवस्था करने तथा सप्ताह में कम से कम एक बार संपर्क बनाए रखने का वचन दें। छह माह में सर्टिफिकेट ऑफ फुलफिल्ड ऑब्लिगेशन जमा कराने की व्यवस्था भी प्रस्तावित की गई, जिसके आधार पर यह प्रमाणित हो कि संतान अपनी जिम्मेदारियाँ निभा रही है।यह प्रस्ताव कठोर अवश्य है, परंतु इसके पीछे निहित भावनात्मक और नैतिक तर्क अत्यंत सशक्त है संतान की सफलता के पीछे माता-पिता का त्याग, तपस्या और कभी-कभी संपत्ति तक का बलिदान होता है। राज्य की सस्ती शिक्षा और स्वास्थ्य योजनाओं का भी योगदान रहता है। ऐसे में यदि संतान अपनी जड़ों को भूल जाए, तो यह केवल पारिवारिक विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक अनुबंध का उल्लंघन है।
साथियों बात अगर हम वर्तमान कानूनी ढांचा और उसकीसीमाएँ इसको समझने की करें तोभारत सरकार ने वर्ष 2007 में मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ़ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन्स एक्ट,2007 (माता-पिता और वरिष्ठनागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007) लागू किया था। इस कानून का उद्देश्य संतानों पर माता-पिता के भरण-पोषण की कानूनी जिम्मेदारी निर्धारित करना था। अधिनियम के अंतर्गत माता- पिता ट्रिब्यूनल में आवेदन कर आर्थिक सहायता का आदेश प्राप्त कर सकते हैं।किन्तु व्यावहारिक स्तरपर यह कानून कई कारणों से दंतहीन सिद्ध हुआ है। प्रथम, शिकायत दर्ज कराने की पहल स्वयं बुजुर्गों को करनी होती है, जो सामाजिक संकोच, भावनात्मक दबाव या शारीरिक अक्षमता के कारण अक्सर संभव नहीं हो पाती। द्वितीय, प्रवासी संतानें विदेश में होने के कारण आदेशों के क्रियान्वयन में प्रशासनिक कठिनाइयाँ आती हैं। तृतीय, कानून मुख्यतःआर्थिक सहायता तक सीमित है;इसमेंभावनात्मक और देखभाल संबंधी दायित्वों का स्पष्ट प्रवर्तन तंत्र नहीं है। परिणामतः समस्या की गंभीरता के अनुरूप प्रभावी समाधान नहीं मिल पाता। इसीलिए ही जरूरत आन पड़ी है कि कुछ मेरे द्वारा सुझाए के पांच कानून को विधायक के रूप में संसद में पेश करो ने तुरंत पारित करने की प्रक्रिया की जाए यह सुझाव में इस आर्टिकल के माध्यम से नीति निर्धारकों, राज्यसभा लोकसभा सांसदों,प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति कार्यालयों तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा हूं।
साथियों बातें कर हम मेरे द्वारा सुझाए गए पांच प्रस्तावित नए कानून की आवश्यकता कुछ समझने की करें तो समस्या की गंभीरता को देखते हुए एक समकालीन,वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप और तकनीकी रूप से सक्षम कानून कीआवश्यकता अनुभव की जा रही है। इसके लिए निम्नलिखित संभावित नाम प्रस्तावित किए जा सकते हैं(1)भारतीय माता-पिता संरक्षण एवं सम्मान अधिनियम, 2026(2)वरिष्ठ नागरिक वैश्विक उत्तरदायित्व अधिनियम, 2026 (3) माता-पिता भरण-पोषण अनिवार्यता एवं दायित्व अधिनियम, 2026 (4) भारतीय पारिवारिक उत्तरदायित्व एवं संरक्षण अधिनियम, 2026 (5) प्रवासी संतान अभिभावक संरक्षण अधिनियम, 2026, इन नामों में केवल दंडात्मक दृष्टिकोण नहीं, बल्कि संरक्षण, सम्मान और उत्तरदायित्व की भावना झलकती है। किसी भी नए कानून का उद्देश्य परिवारों को तोड़ना नहीं, बल्कि उन्हें पुनःजोड़ना होना चाहिएकानूनों की संभावित मुख्य विशेषताएँ- एक प्रभावी कानून बहुस्तरीय होना चाहिए,आर्थिक, प्रशासनिक तकनीकी और नैतिक आयामों को समाहित करते हुए। (1) विदेश या किसी मेट्रो या किसी भी छोटी सिटीज में रहने वाली संतान के लिए अनिवार्य वार्षिक आर्थिक योगदान की व्यवस्था। यह योगदान आय के अनुपात में निर्धारित हो सकता है,जिससे आर्थिक असमानता का संतुलन बना रहे। (2) माता-पिता की शिकायत पर त्वरित न्यायिक तंत्र विशेष ट्रिब्यूनल या फास्ट- ट्रैक व्यवस्था हो,जहाँ 60 से 90 दिनों के भीतर निर्णय दिया जाए।(3) एक राष्ट्रीय डिजिटल पोर्टल, जहाँ बुजुर्ग अपनी शिकायत दर्ज कर सकें। यह पोर्टल सरल भाषा, वीडियो सहायता और हेल्पलाइन से युक्त हो,ताकि तकनीकी रूप से कमज़ोर वरिष्ठ नागरिक भी इसका उपयोग कर सकें।(4) वेतन या आय से स्वचालित कटौती की कानूनी व्यवस्था।आयकर विभाग और बैंकों के सहयोग से निर्धारित राशि सीधे माता-पिता के खाते में स्थानांतरित की जा सके।(5), गंभीर उपेक्षा की स्थिति में पासपोर्ट निलंबन या वीजा प्रतिबंध। यह प्रावधान अंतिम उपाय के रूप में हो, ताकि दंडात्मक कार्रवाई से पहले सुधार का अवसर मिले हलफनामा और प्रमाणन प्रणाली-छह माह में सर्टिफिकेट ऑफ फुलफिल्ड ऑब्लिगेशन जमा कराने की व्यवस्था भी प्रस्तावित की जाए अन्यथा सैलरी पर रोक तथा संबंधित व्यक्ति पर क्रिमिनल केस दर्ज करने का आधार माना जाए (6) विदेश जाने से पहले एक अनिवार्य हलफनामा लिया जा सकता है,जिसमें संतान अपने माता-पिता की देखभाल का वचन दे।इसमें निम्न बिंदु शामिल हों, (1)आय का निश्चित प्रतिशत माता-पिता को देना।(2)स्वास्थ्य बीमा औरआवश्यक चिकित्सा व्यवस्था सुनिश्चित करना। (3)आवश्यकता पड़ने पर केयरटेकर नियुक्त करना।(4) सप्ताह में कम से कम एक बार यह प्रमाण पत्र माता-पिता द्वारा जारी किया जाए कि उनकी संतान दायित्व निभा रही है। यदि प्रमाण पत्र न दिया जाए,तो संबंधितप्राधिकारी कारण की जांच करे और आवश्यकतानुसार चेतावनी या दंडात्मक कार्रवाई करे।
साथियों बात अगर हम पासपोर्ट निरस्तीकरण का प्रश्न इसको समझने की करें तो,पासपोर्ट रद्द करना एक कठोर कदम है, क्योंकि यह व्यक्ति की अंतरराष्ट्रीय गतिशीलता और रोजगार पर सीधा प्रभाव डालता है।अतः इसे अंतिम उपाय के रूप में ही रखा जाना चाहिए। प्रारंभिक चरण में चेतावनी, जुर्माना या अस्थायी निलंबन जैसे उपाय अपनाए जा सकते हैं। केवल गंभीर और निरंतर उपेक्षा की स्थिति में ही पासपोर्ट निरस्तीकरण का प्रावधान हो। इससे कानून का संदेश सख्त भी रहेगा और बेहतर तरीके से न्यायसंगत भी।
साथियों बात अगर हम इस मुद्दे को संवैधानिक परिप्रेक्ष्य में समझने की करें तो (1)अनुच्छेद 21- जीवन और गरिमा का अधिकार- भारतीय संविधानका अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार देता है।सर्वोच्च न्यायालय ने समय-समय पर इसे विस्तृत अर्थ में व्याख्यायित किया है जिसमें भोजन, स्वास्थ्य, आश्रय और सम्मान सम्मिलित हैं।वृद्ध माता-पिता का परित्याग सीधे-सीधे उनके गरिमामय जीवन के अधिकार का उल्लंघन माना जा सकता है। अतः राज्य का दायित्व बनता है कि वह उनकी रक्षा करे। (2) अनुच्छेद 19 (1) (डी) और 19(1)(जी)- आवाजाही और व्यवसाय की स्वतंत्रता-यदि पासपोर्ट रद्द करने या विदेश यात्रा पर रोक लगाने का प्रावधान किया जाए, तो यह नागरिक की स्वतंत्रता पर अंकुश होगा।अनुच्छेद 19 के तहत दी गई स्वतंत्रताओं पर उचित प्रतिबंध ही लगाए जा सकते हैं।
अतः कोई भी नया कानून तभी टिकेगा जब वह: आनुपातिक हो,सार्वजनिक हित में हो, न्यायिक समीक्षा के अधीन हो (3) नीति-निदेशक तत्व अनुच्छेद 41 और 46 राज्य को वृद्धों और कमजोर वर्गों की सुरक्षा का निर्देश देते हैं। यद्यपि ये न्यायालय में प्रवर्तनीय नहीं, लेकिन नीति निर्माण में मार्गदर्शक हैं।
साथियों बात अगर हम इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य मैं समझने की करें तो,विश्व के अनेक देशों में फिलियल रिस्पॉन्सिबिलिटी लॉ की अवधारणा मौजूद है, जहाँ संतानों पर माता-पिता की देखभाल का दायित्व कानूनी रूप से निर्धारित है। एशियाई समाजों में पारिवारिक उत्तरदायित्व की परंपरा मजबूत रही है।भारत यदि एक समकालीन और संतुलित कानून बनाता है, तो वह वैश्विक स्तर पर वृद्धजन संरक्षण के क्षेत्र में एक मॉडल प्रस्तुत कर सकता है।दंडात्मक नहीं पुनर्स्थापनात्मक दृष्टिकोणकिसी भी कानून का लक्ष्य केवल दंड देना नहीं होना चाहिए। परिवारों के बीच संवाद, परामर्श और मध्यस्थता की व्यवस्था भी शामिल होनी चाहिए। यदि संबंधों में दूरी आई है, तो काउंसलिंग और पारिवारिक मध्यस्थता के माध्यम से उसे पुनः स्थापित किया जाए। समाज सेवा संगठनों और स्थानीय प्रशासन को इसमें सटीक भागीदार बनाया जा सकता है।
साथियों बात अगर हम इस मुद्दे को संवैधानिक और नैतिक संतुलन के परिपेक्ष में समझने की करें तो भारत का संविधान नागरिकों को आवागमन और रोजगार की स्वतंत्रता देता है।इसलिए किसी भी नए कानून को इन मौलिक अधिकारों के साथ संतुलन स्थापित करना होगा। दायित्व सुनिश्चित करना आवश्यक है,परंतु यह अनुपातिक और न्यायसंगत होना चाहिए। कानून ऐसा हो जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता और पारिवारिक उत्तरदायित्व के बीच संतुलन स्थापित करे।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि बदलते भारतीय समाज में आर्थिक प्रगति और वैश्विक अवसरस्वागतयोग्य हैं, परंतु इनकी कीमत पर माता-पिता की उपेक्षा स्वीकार्य नहीं हो सकती। यदि समाज अपने मूल्यों से विमुख हो जाता है,तो उसकी प्रगति अधूरी रह जाती है।एक सशक्त तकनीक-समर्थ और मानवीय दृष्टिकोण वाला कानून समय की मांग है।यह केवल बुजुर्गों की सुरक्षा का प्रश्न नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति की आत्मा की रक्षा का विषय है। यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियाँ भी पारिवारिक उत्तरदायित्व को समझें,तो आज ठोस कदम उठाने होंगे। संसद में उठी आवाज़ इस दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत है। अब आवश्यकता है कि नीति- निर्माता न्यायपालिका, प्रवासी समुदाय और समाज मिलकर ऐसा ढांचा तैयार करें, जो हर बुजुर्ग माता-पिता को यह विश्वास दिला सके कि वे अकेले नहीं हैं—उनकी संतान और उनका राष्ट्र दोनों उनके साथ खड़े हैं।

kishan2 1
संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425

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