एमिशन गैप रिपोर्ट 2026 का बड़ा खुलासा! -जलवायु संकल्पों व ज़मीनी हकीकत के बीच गहरी खाई -1.5° सी का लक्ष्य खतरे में, 2040 तक उत्सर्जन में 69 प्रतिशत कटौती की चुनौती!
धरती तप रही है, दुनियाँ के वादे अधूरे हैं ! ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार पर लगाम नहीं लगी तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य कितना सुरक्षित? -क्या जागेंगी दुनियाँ की सरकारें? -भारत के सामने भी बड़ी परीक्षा! -एडवोकेट
किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर दुनियाँ आज विकास, आधुनिकता और तकनीकी प्रगति के नए-नए कीर्तिमान स्थापित कर रही है,लेकिन इसी विकास की कीमतहमारा ग्रह बढ़ते तापमान, भीषण गर्मी,अनियमित वर्षा,बाढ, सूखे और चरम मौसमी घटनाओं के रूप में चुका रहा है।वैश्विक मंचों पर जलवायु परिवर्तन को लेकर चिंताएं व्यक्त की जा रही हैं, अंतरराष्ट्रीय समझौते किए जा रहे हैं और कार्बन उत्सर्जन घटाने के संकल्प दोहराए जा रहे हैं, लेकिन इन प्रयासों की रफ्तार जलवायु संकटकी गंभीरता के अनुरूप नहीं है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र बताना चाहूंगा क़ि इसी चिंताजनक स्थिति के बीच संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) ने बुधवार दिनांक 21 अक्टूबर 2026 को अपनी नई इमिशयंस गैप रिपोर्ट 2026: द पॉइंट ऑफ़ रिटर्न जारी की है।रिपोर्ट का संदेश स्पष्ट है दुनियाँ के सामने अब केवल ग्लोबल वार्मिंग को रोकने की चुनौती नहीं,बल्कि तापमान में होने वाली संभावित वृद्धि को सीमित करने और भविष्य में उसे फिर से सुरक्षित स्तर तक लाने की कठिन परीक्षा भी है। रिपोर्ट के अनुसार,औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तर की तुलना में वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने का लक्ष्य बिना या बहुत सीमित सीमा तक तापमान बढ़ने की स्थिति में हासिल करना अब संभव नहीं रह गया है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि मानवता के पास कुछ करने का अवसर समाप्त हो गया है।अब सबसे बड़ी जरूरत तापमान में होने वाली अतिरिक्त वृद्धि को न्यूनतम रखने, उसके दुष्प्रभावों को कम करने और इस सदी के अंत तक तापमान को दोबारा 1.5 डिग्री सेल्सियस या उससे नीचे लाने की दिशा में ठोस कार्रवाई करने की है।
साथियों बात अगर हम 1.5 डिग्री का लक्ष्य क्यों बना दुनियाँ के लिए सबसे बड़ी चिंता? को समझनेकी करें तो अब पेरिस जलवायु समझौते के तहत दुनियाँ के देशों ने वैश्विक तापमान वृद्धि को औद्योगिक क्रांति से पहले के स्तर की तुलना में 2 डिग्री सेल्सियस से काफी नीचे रखने और इसे 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के प्रयास करने का संकल्प लिया था। लेकिन वर्षों से जारी अपर्याप्त जलवायु कार्रवाई ने परिस्थितियों को बेहद गंभीर बना दिया है। यूएनईपी की 2026 की रिपोर्ट बताती है कि 1.5 डिग्री सेल्सियस की सीमा को बिना या बहुत सीमित ओवरशूट के भीतर बनाए रखने की संभावना अब समाप्त हो चुकी है। इसका मतलब है कि आने वाले दशकों में तापमान इस सीमा से ऊपर जा सकता है।हालांकि वैज्ञानिकआकलन यह भी बताता है कि अगर उत्सर्जन में तेजी से और बड़े पैमाने पर कटौती की जाए, तो तापमान में अधिकतम वृद्धि को सीमित करना और इस सदी के अंत तक फिर से 1.5 डिग्री सेल्सियस के स्तर पर लौटने की लगभग 50 प्रतिशत संभावना वाला रास्ता अभी भी मौजूद है।रिपोर्ट के सबसे कम संभावितओवरशूट वाले परिदृश्य में मध्य शताब्दी के आसपास तापमान वृद्धि लगभग 1.7 से 1.8 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने की परिकल्पना की गई है। लेकिन इस दिशा में सफलता हासिल करने के लिए दुनिया को केवल घोषणाएं नहीं,बल्कि अभूतपूर्व गति से वास्तविक उत्सर्जन कटौती करनी होगी।
साथियों बात अगर हम 2030, 2035 और 2040 के लिए संयुक्त राष्ट्र का सबसे बड़ा अल्टीमेटम को समझने की करें तो,रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण और चिंताजनक पहलू ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती के लिए निर्धारित समयसीमा है। यूएनईपी के मुताबिक, तापमान वृद्धि को न्यूनतम रखने और भविष्य में 1.5 डिग्री सेल्सियस तक लौटने के सबसे कम ओवरशूट वाले परिदृश्य के लिए वर्ष 2025 के स्तर की तुलना में वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 2030 तक 18 प्रतिशत, 2035 तक 45 प्रतिशत और 2040 तक 69 प्रतिशत की कटौती आवश्यक होगी। इन आंकड़ों का सीधा अर्थ है कि दुनिया के देशों को आने वाले वर्षों में अपने ऊर्जा उत्पादन, उद्योग,परिवहन,भवन निर्माण और कृषि संबंधी गतिविधियों में बड़े बदलाव करने होंगे।जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम किए बिना और स्वच्छ ऊर्जा के विकल्पों को तेजी से अपनाए बिना इतनी बड़ी कटौती करना संभव नहीं होगा। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उत्सर्जन में कटौती का लक्ष्य केवल कागजों पर निर्धारित करना पर्याप्त नहीं है। सरकारों को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि घोषित नीतियों का वास्तविक परिणाम कार्बन उत्सर्जन में दिखाई दे। समय निकलने के साथ चुनौती और कठिन होती जाएगी, क्योंकि जितनी देर से कटौती शुरू होगी, उतनी ही तेजी से और अधिक कठोर कदम उठाने पड़ेंगे।
साथियों बात अगर हम मौजूदा नीतियां जारी रहीं तो 2.8 डिग्री तक पहुंच सकता है तापमान को समझने की करें तो,जलवायु संकट की
गंभीरता समझने के लिए यह जानना जरूरी है कि वर्तमान नीतियों और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के आधार पर दुनिया किस दिशा में बढ़ रही है। उपलब्ध आकलनों के अनुसार, यदि मौजूदा नीतियां बिना बड़े बदलाव के जारी रहती हैं, तो इस सदी के अंत तक वैश्विक तापमान वृद्धि लगभग 2.8 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच सकती है। यदि देशों की घोषित जलवायु प्रतिबद्धताओं को पूरी तरह लागू कर दिया जाए, तब भी तापमान वृद्धि लगभग 2.6 डिग्री सेल्सियस के आसपास रहने का अनुमान है। यह स्थिति पेरिस समझौते के लक्ष्यों से काफी दूर है। यहां सबसे बड़ी समस्या संकल्प और क्रियान्वयन के बीच का अंतर है। दुनिया के अनेक देश नवीकरणीय ऊर्जा, कार्बन उत्सर्जन में कमी और नेट- जीरो के लक्ष्य घोषित कर चुके हैं,लेकिन मौजूदा प्रतिबद्धताएं उस स्तर की कटौती सुनिश्चित नहीं करतीं जिसकी वैज्ञानिक दृष्टि से आवश्यकता है। यही अंतर एमिशन गैप कहलाता है यानी जितना उत्सर्जन वास्तव में होने की आशंका है और जलवायु लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए जितना उत्सर्जन होना चाहिए, उनके बीच की खाई। इस खाई को पाटने के लिए सरकारों को अल्पकालिक लक्ष्यों, निवेश, ऊर्जा नीतियों और जवाबदेही को एक साथ मजबूत करना होगा।
साथियों बात अगर हम जलवायु परिवर्तन के बढ़ते दुष्परिणाम: खतरे की घंटी बज चुकी है, इसको समझने की करें तो,वैश्विक तापमान में वृद्धि केवल पर्यावरण से जुड़ा आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह मानव जीवन, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और प्राकृतिक संसाधनों के भविष्य से जुड़ा हुआ प्रश्न है। तापमान बढ़ने से भीषण गर्मी की घटनाओं का जोखिम बढ़ता है और लंबे समय तक चलने वाली गर्म लहरें मानव स्वास्थ्य तथा श्रम उत्पादकता को प्रभावित कर सकती हैं। दूसरी ओर, कुछ क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा, बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बढ़ सकता है, जबकि दूसरे क्षेत्रों में सूखे और जल संकट की स्थिति गंभीर हो सकती है। कृषि उत्पादन पर पड़ने वाले प्रभाव खाद्य पदार्थों की उपलब्धता और कीमतों को प्रभावित कर सकते हैं। समुद्र के स्तर में वृद्धि तटीय क्षेत्रों और वहां रहने वाली आबादी के सामने नई चुनौतियां खड़ी करती है। इन प्रभावों का बोझ सभी देशों और समुदायों पर समान रूप से नहीं पड़ता। सीमित संसाधनों वाले देश, कमजोर बुनियादी ढांचे वाले क्षेत्र और जलवायु के प्रति संवेदनशील समुदाय अक्सर अधिक जोखिम झेलते हैं। इसलिए जलवायु कार्रवाई का अर्थ केवल उत्सर्जन घटाना नहीं है, बल्कि बाढ़ नियंत्रण, जल संरक्षण, टिकाऊ कृषि, समय पर चेतावनी प्रणालियों और जलवायु-अनुकूल बुनियादी ढांचे में निवेश करना भी है।
साथियों बात अगर हम भारत की जलवायु प्रतिबद्धताएं लक्ष्य क्या हैं और प्रगति कितनी हुई?इसको समझने की करें तो,भारत जैसे विशाल और तेजी से विकसित होते देश के लिए जलवायु परिवर्तन से निपटना एक बहुआयामी चुनौती है। एक तरफ देश को करोड़ों लोगों की ऊर्जा आवश्यकताएं पूरी करनी हैं,उद्योगों और परिवहन का विस्तार करना है तथा आर्थिक विकास को गति देनी है; दूसरी तरफ उत्सर्जन घटाने और पर्यावरणीय सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी निभानी है। भारत ने वर्ष 2070 तक नेट-जीरोउत्सर्जन का दीर्घकालिक लक्ष्य घोषित किया है। इसके साथ ही भारत की अद्यतन राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित जलवायु प्रतिबद्धताओं (एनडीसी 3.0) में 2035 तक वर्ष 2005 के स्तर की तुलना में सकल घरेलू उत्पाद की उत्सर्जन तीव्रता में 47 प्रतिशत कमी और कुल स्थापित बिजली उत्पादन क्षमता में गैर-जीवाश्म ऊर्जा स्रोतों की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य शामिल है। उत्सर्जन तीव्रता में कमी का अर्थ है कि अर्थव्यवस्था के प्रत्येक इकाई उत्पादन के लिए होने वाला उत्सर्जन घटाया जाए; यह कुल उत्सर्जन में उसी अनुपात की कमी होने के समान नहीं है।भारत सरकार के अनुसार, वर्ष 2022 तक क़ी उत्सर्जन तीव्रता में 2005 की तुलना में 37.38 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई थी। इसके अतिरिक्त, जून 2025 में स्थापित बिजली क्षमता में गैर-जीवाश्म स्रोतों की हिस्सेदारी 50 प्रतिशत से अधिक हो गई थी और 30 जून 2026 तक यह 54.18 प्रतिशत बताई गई। वर्ष 2005 से 2022 के बीच अतिरिक्त कार्बन सिंक का निर्माण 2.44 अरब टन सीओ ₂- समतुल्य आंका गया, जबकि 2030 तक 2.5 से 3 अरब टन का लक्ष्य रखा गया है। ये उपलब्धियां प्रगति का संकेत देती हैं, लेकिन आगे की राह में ऊर्जा परिवर्तन, वन संरक्षण और वास्तविक उत्सर्जन कटौती पर निरंतर काम करना जरूरी है।
साथियों बात अगर हम वैश्विक पर्यावरण सूचकांक में भारत की स्थिति: उपलब्धियों के साथ गंभीर सवाल को समझने की करें तो, भारत की जलवायु नीति का मूल्यांकन करते समय उसके घोषित लक्ष्यों और हासिल की गई प्रगति को देखना जरूरी है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण सूचकांक भी कुछ महत्वपूर्ण चुनौतियों की ओर ध्यान आकर्षित करते हैं। येल विश्वविद्यालय के पर्यावरण कानून एवं नीति केंद्र से जुड़े शोधकर्ताओं द्वारा तैयार इंविरोंमेन्टल परफॉरमेंस इंडेक्स 2026 में भारत को 177 देशों में 176 वां स्थान मिला और उसका कुल स्कोर 100 में से 22.46 रहा। जलवायु परिवर्तन शमन श्रेणी में भारत 130 वें स्थान पर था। यह सूचकांक वायु गुणवत्ता, पर्यावरणीय स्वास्थ्य, पारिस्थितिकी तंत्र और जलवायु संबंधी कई संकेतकों को मिलाकर तैयार किया जाता है। इसलिए इसे केवल कार्बन उत्सर्जन या किसी एक जलवायु लक्ष्य की उपलब्धि का सूचक नहीं समझना चाहिए। भारत की इस रैंकिंग से स्पष्ट होता है कि आर्थिक विकास और स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में प्रगति के बावजूद पर्यावरणीय प्रदर्शन में व्यापक सुधार की आवश्यकता है। साथ ही, किसी देश की कुल रैंकिंग को समझते समय उसकी पद्धति, संकेतकों और राष्ट्रीय परिस्थितियों को भी ध्यान में रखना चाहिए। भारत के लिए चुनौती यह है कि गैर-जीवाश्म बिजली क्षमता में बढ़ोतरी को वास्तविक स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन, कोयले पर निर्भरता में क्रमिक कमी, वायु प्रदूषण नियंत्रण, वन संरक्षण और उत्सर्जन में मापनीय गिरावट के साथ जोड़ा जाए।
साथियों बात अगर हम समाधान क्या है? स्वच्छ ऊर्जा, मजबूत नीतियां और जवाबदेही को समझने की करें तो यूएनईपी की रिपोर्ट का संदेश निराशा फैलाना नहीं, बल्कि उपलब्ध विकल्पों पर तत्काल काम करने की चेतावनी देना है। सौर और पवन ऊर्जा की क्षमता का तेजी से विस्तार, बिजली ग्रिड का आधुनिकीकरण, ऊर्जा भंडारण की सुविधाएं सार्वजनिक परिवहन, ऊर्जा- कुशल भवन और उद्योगों में स्वच्छ तकनीकों का इस्तेमाल उत्सर्जन घटाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। मीथेन जैसी शक्तिशाली ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करना भी कम समय में जलवायु लाभ पहुंचा सकता है। इसके साथ ही, जंगलों और प्राकृतिक पारिस्थितिकी तंत्रों का संरक्षण तथा कार्बन डाइऑक्साइड को वातावरण से हटाने की सुरक्षित और प्रभावी तकनीकों पर काम करना आवश्यक होगा। रिपोर्ट के अनुसार, सदी के अंत तक तापमान को फिर से 1.5 डिग्री सेल्सियस या उससे नीचे लाने के परिदृश्य में वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड हटाने की बड़ी मात्रा में आवश्यकता पड़ेगी। हालांकि, ऐसी तकनीकों पर पूरी तरह निर्भर रहना उचित नहीं होगा, क्योंकि उनकी क्षमता, लागत और बड़े पैमाने पर इस्तेमाल की व्यावहारिक सीमाएं हैं।इसलिएप्राथमिकता उत्सर्जन को स्रोत पर ही घटाने की होनी चाहिए। विकसित देशों को वित्तीय सहायता, तकनीक हस्तांतरण और विकासशील देशों के लिए जलवायु वित्त उपलब्ध कराने में भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी, ताकि स्वच्छ ऊर्जा परिवर्तन न्यायसंगत और सटीकता से व्यावहारिक बन सके।
क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318


