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भारत में स्मार्ट और प्रीपेड बिजली मीटर- वैधानिक स्थिति, विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 47(5),और राज्य नियामक आयोगों का दृष्टिकोण -एक समग्र विश्लेषण

by Page 3 News International Desk
February 22, 2026
in Hindi Editorials
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स्मार्ट एवं पूर्वभुगतान विद्युत मीटर-विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 47(5) और राज्य विद्युत नियामक आयोगों की भूमिका

परंपरागत बिज़ली मीटर से स्मार्ट/प्रीपेड मीटर तक का परिवर्तन,विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 47(5) कानूनी रेखा-राज्य विद्युत नियामक आयोगों क़े विनियमों आदेशों का गहन परीक्षण आवश्यक -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर पारंपरिक मीटर व्यवस्था से उन्नत डिजिटल मीटरिंग प्रणाली की ओर पूरी दुनियाँ चल पड़ी है।पिछले कुछ वर्षों से भारत देश के अनेक राज्यों में पारंपरिक विद्युत मीटरों को हटाकर उन्नत डिजिटल अथवा पूर्वभुगतान मीटर लगाए जाने की प्रक्रिया तेज़ हुई है। अनेक स्थानों से समाचार प्राप्त हुए हैं कि विद्युत विभागों के कर्मचारी उपभोक्ताओं की सहमति के बिना पुराने मीटरों को हटाकर नए पूर्वभुगतान या डिजिटल मीटर स्थापित कर रहे हैं,जिसके कारण जनसामान्य में असंतोष और विरोध की स्थिति उत्पन्न हुई है। इस परिस्थिति ने एक महत्वपूर्ण विधिक प्रश्न को जन्म दिया है,क्या भारत में ऐसा कोई वैधानिक प्रावधान है जो इन मीटरों को अनिवार्य रूप से लागू करने की अनुमति देता हो? मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि इस प्रश्न का उत्तर खोजने के लिए विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 47(5),केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण द्वारा बनाए गए नियमों तथा राज्य विद्युत नियामक आयोगों द्वारा जारी विनियमों और दर आदेशों का गहन परीक्षण आवश्यक है। पिछले कुछ वर्षों में भारत में पारंपरिक (पोस्टपेड/एक्यूरेटेड) मीटरों के स्थान पर स्मार्ट मीटर और स्मार्ट प्रीपेड मीटर लगाने का अभियान तेज़ी से बढ़ा है। इसका मुख्य उद्देश्य बिजली वितरण कंपनियों की वित्तीय स्थिति सुधारना, एग्रीगेट टेक्निकल एंड कमर्शियल नुकसान घटाना, वास्तविक- समय डेटा आधारित बिलिंग करना और उपभोक्ताओं को बिजली उपयोग नियंत्रण का विकल्प देना रहा है। इस रणनीति का बड़ा ढांचा रेवाम्पड डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर स्कीम के तहत है, जिसमें हजारों लाख स्मार्ट मीटर के रोलआउट का लक्ष्य रखा गया है,लेकिन सैद्धांतिक और ऐतिहासिक पैमाने पर मीटर बदलना अनिवार्य है या वैकल्पिक है,इस पर बहस जारी है।बहुत-सी मीडिया रिपोर्टों और उपभोक्ता विरोध के बीच,यह समझना ज़रूरी है कि कानूनी-नियामक आधार क्या कहता है, विशेषकर विद्युत अधिनियम, 2003 का प्रावधान धारा 47(5) और राज्य विद्युत नियामक आयोग के नियमन/आदेशों के संदर्भ में। इस आर्टिकल के माध्यम से चर्चा करेंगे।
साथियों बात अगर हम विद्युत अधिनियम, 2003 की धारा 47(5):वास्तविक विधिक आशय को समझने की करें तो, विद्युत अधिनियम, 2003 भारत में विद्युत क्षेत्र का मूल कानून है। इसकी धारा 47 मुख्यतः सुरक्षा जमा से संबंधित है।धारा 47(5) का आशय यह है कि यदि कोई उपभोक्ता पूर्वभुगतान मीटर के माध्यम से विद्युत आपूर्ति प्राप्त करने के लिए सहमत होता है, तो वितरण अनुज्ञाधारी उससे सुरक्षा जमा राशि नहीं ले सकता। यहाँ दो महत्वपूर्ण बिंदु उभरते हैं,पहला, यह प्रावधान उपभोक्ता को विकल्प देता है। दूसरा,यह प्रावधान वितरण कंपनी को यह अधिकार नहीं देता कि वह सभी उपभोक्ताओं पर पूर्वभुगतान मीटर अनिवार्य रूप से लागू करे।अर्थात् धारा 47(5) का उद्देश्य उपभोक्ता के हित में विकल्प प्रदान करना है, न कि अनिवार्यता थोपना। यदि कानून की भाषा का शाब्दिक और उद्देश्यपरक विश्लेषण किया जाए, तो स्पष्ट होता है कि इसमें कहीं भी यह नहीं कहा गया कि प्रत्येक उपभोक्ता को पूर्वभुगतान या डिजिटल मीटर स्वीकार करना ही होगा,उसे ऑप्शन जरूर होगा।
साथियों बात अगर हम क्या किसी भी राज्य के राज्य विद्युत वितरण नियम,इस अधिनियम से ऊपर हो सकते हैं? विधिक सिद्धांत की कसौटी इसको समझने की करें तो, भारतीय विधि व्यवस्था का एक मूल सिद्धांत है कि अधीनस्थ नियम, विनियम या आदेश मूल अधिनियम के विपरीत नहीं हो सकते। यदि अधिनियम में कोई अनिवार्यता नहीं दी गई है,तो नियम बनाकर उसेअनिवार्य नहीं बनाया जा सकता।केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण ने मीटर स्थापना और संचालन से संबंधित विनियम जारी किए हैं, जिनमें उन्नत मीटर प्रणाली को प्रोत्साहित किया गया है। किंतु यह विनियम अधिनियम की सीमाओं के भीतर ही प्रभावी हो सकते हैं। यदि अधिनियम उपभोक्ता को विकल्प देता है, तो नियम बनाकर उस विकल्प को समाप्त नहीं किया जा सकता। इस प्रकार, केवल प्रशासनिक सुविधा या वित्तीय सुधार के आधार पर उपभोक्ता की वैधानिक स्वतंत्रता को बिलकुल सीमित नहीं किया जा सकता।
साथियों बात अगर हम राज्य विद्युत नियामक आयोगों की भूमिका और अधिकार क्षेत्र को समझने की करें तो प्रत्येक राज्य में एक राज्य विद्युत नियामक आयोग स्थापित है।इन आयोगों का दायित्व है,विद्युत दरों का निर्धारण करना,वितरणकंपनियों के कार्यों की निगरानी करना, उपभोक्ता हितों की रक्षा करना, नियम एवं विनियम बनाना, किन्तु इन आयोगों की शक्ति भी विद्युत अधिनियम, 2003 से ही प्राप्त होती है।अतः वे ऐसे नियम नहीं बना सकते जो अधिनियम की मूल भावना के विरुद्ध हों।अब प्रश्न उठता है क्या किसी राज्य आयोग ने ऐसा कोई विनियम या दर आदेश जारी किया है जो सभी उपभोक्ताओं के लिए स्मार्ट अथवा पूर्व भुगतान मीटर अनिवार्य करता हो?उपलब्ध सार्वजनिक अभिलेखों के आधार पर यह स्पष्ट है कि अधिकांश राज्यों में ऐसे विनियम प्रारूप स्तर पर तैयार किए गए हैं, या केवल प्रोत्साहन स्वरूप व्यवस्था की गई है। पूर्णतःसार्वभौमिक अनिवार्यता लागू करने वाला स्पष्ट,व्यापक और बाध्यकारी विनियम अभी तक व्यापक रूप से लागू नहीं हुआ है।
साथियों बात अगर हम विभिन्न राज्यों की स्थिति: नीतिगत प्रोत्साहन बनाम वैधानिक अनिवार्यता इसको समझने की करें तो,देश के कई राज्यों में वितरण कंपनियों ने प्रशासनिक आदेशों के माध्यम से नए कनेक्शनों पर उन्नत मीटर लगाने की प्रक्रिया प्रारंभ की है। कुछ राज्यों में सरकारी कार्यालयों और संस्थानों में पहले चरण में इन मीटरों की स्थापना की गई है। कुछ स्थानों पर सभी नए उपभोक्ताओं के लिए स्मार्ट मीटर अनिवार्य करने का निर्णय लिया गया है।परंतु यहाँ एक महत्वपूर्ण भेद समझना आवश्यक है, प्रशासनिक निर्णय और वैधानिक अनिवार्यता में अंतर है।यदि कोई वितरण कंपनी अपने स्तर पर आदेश जारी करती है, तो वह तभी वैध होगा जब उसे राज्य विद्युत नियामक आयोग की स्वीकृति प्राप्त हो और वह अधिनियम के अनुरूप हो। यदि आयोग ने विधिवत विनियम बनाकर, सार्वजनिक परामर्श के बाद, अधिनियम की सीमाओं के भीतर अनिवार्यता घोषित की हो,तभी उसे पूर्ण वैधानिक बल प्राप्त होगा।अब तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार,अधिकतर राज्यों में स्मार्ट मीटरिंग को नीति स्तरपर बढ़ावा दिया गया है, किंतु इसे पूर्ण रूप से सभी उपभोक्ताओं के लिए बाध्यकारी घोषित करने का स्पष्ट और निर्विवाद उदाहरण सीमित या विवादास्पद है।
साथियों बात अगर हम उपभोक्ता अधिकार और सहमति का प्रश्न को समझाने की करें तो, भारतीय संविधान उपभोक्ता को विधि द्वारा संरक्षित अधिकार प्रदान करता है। विद्युत सेवा एक आवश्यक सार्वजनिक सेवा है। यदि किसी उपभोक्ता की सहमति के बिना उसका मीटर बदला जाता है, और उसे ऐसी प्रणाली में डाला जाता है जिससे उसका सेवा अधिकार प्रभावित होता हो, तो यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध हो सकता है।कई स्थानों पर उपभोक्ता संगठनों ने यह तर्क दिया है कि,धारा 47(5) विकल्प देती हैअनिवार्यता उपभोक्ता अधिकार का हनन है,सुरक्षा जमा की वापसी एवं भुगतान प्रणाली में पारदर्शिता सुनिश्चित होनी चाहिए न्यायालयों में दायर याचिकाओं में भी यही तर्क प्रस्तुत किया गया है कि यदि अधिनियम विकल्प देता है, तो उसे प्रशासनिक आदेश से बिलकुल ही समाप्त नहीं किया जा सकता।
साथियों बात अगर हम आर्थिक और प्रशासनिक तर्क बनाम विधिक सीमाएँ इसको समझने की करें तो,सरकार और वितरण कंपनियाँ यह तर्क देती हैं कि उन्नत मीटर प्रणाली से,राजस्व संग्रहण सुधरेगा,चोरी एवं तकनीकी हानि कम होगी, बिलिंग त्रुटियाँ घटेंगीउपभोक्ता वास्तविक समय में खपत देख सकेंगे, ये तर्क आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। किंतु किसी भी आर्थिक या तकनीकी लाभ को लागू करने से पूर्व विधिक वैधता आवश्यक है।विधिक प्रक्रिया में सार्वजनिक परामर्श,पारदर्शिता और न्यायसंगतता अनिवार्य तत्व हैं।यदि अनिवार्यता लागू करनी है तो,स्पष्ट विनियम बने,उपभोक्ताओं को सुनवाई का अवसर मिले,संक्रमण अवधि दी जाए,सुरक्षा और डेटा गोपनीयता के मानक सुनिश्चित किए जाएँ।
साथियों बात अगर हम क्या कोई राज्य आयोग ने पूर्ण अनिवार्यता लागू की है? इसको समझने की करें तो उपलब्ध सार्वजनिक अभिलेखों और विनियमों के परीक्षण से यह निष्कर्ष निकलता है कि, अधिकांश राज्यों ने स्मार्ट मीटरिंग को प्रोत्साहित किया है। कुछ राज्यों ने नए कनेक्शनों पर इसे लागू करने का निर्णय लिया है। कई राज्यों में प्रारूप विनियम तैयार किए गए हैं।किंतु सभी उपभोक्ताओं पर बिना विकल्प के पूर्ण अनिवार्यता लागू करने वाला व्यापक और निर्विवाद विनियम व्यापक रूप से लागू नहीं हुआ है।अर्थात् वर्तमान स्थिति मिश्रित है नीतिगत प्रोत्साहन अधिक है,परंतु वैधानिक अनिवार्यता सीमित या विवादाधीन है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि भारत के किसी भी प्रमुख राज्य विद्युत नियामक आयोग ने सार्वजनिक रूप से एक नियम/आदेश जारी नहीं किया है, जो हर उपभोक्ता पर स्मार्ट/प्रेपेड मीटर लागू करना अनिवार्य करे। अधिकांश मामलों में नियमन वैकल्पिक उपयोग, नए कनेक्शनों पर सिफारिश या उत्पादन-लागत सहायता/टाइमलाइन जैसे विषयों पर केंद्रित है।कई न्यायालयिक मामलों और पीआईएल (जैसे बॉम्बे हाईकोर्ट , कर्नाटका हाईकोर्ट ) में यह तर्क दिया गया है कि उपभोक्ता की सहमति के बिना मीटर को बदलना या उसे प्रीपेड फार्मेट में स्विच करना नियमों के विरुद्ध है। विशेष रूप से, कुछ न्यायालयों ने यह स्पष्ट किया कि धारा 47(5) सुरक्षा जमा संबंधी प्रावधान देती है, न कि मामूली से अनिवार्यता हालाँकि सुप्रीमकोर्ट के एक मामले में यह भी पाया गया कि जब उपभोक्ता स्वेच्छा से प्रीपेड मीटर अपनाता है,तो उसकी सुरक्षा जमा राशि को वापस करना आवश्यक है, इसका मतलब यह है कि वैकल्पिक उपयोग को सटीक मान्यता दी जाती है,न कि जबरन लागू करना।
साथियों बात अगर हम इस मुद्दे कोअंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में समझने की करें तो,विश्व के अनेक देशों में उन्नत मीटर प्रणाली लागू की गई है। किंतु वहाँ भी इसे चरणबद्ध ढंग से, व्यापक जनपरामर्श और विधिक स्पष्टता के साथ लागू किया गया। उपभोक्ता अधिकार, डेटा सुरक्षा, पारदर्शिता और शिकायत निवारण तंत्र को पहले स्थापित किया गया, तत्पश्चात अनिवार्यता लागू की गई।भारत में भी यदि इस दिशा में स्थायी और निर्विवाद व्यवस्था स्थापित करनी है, तो वही मार्ग अपनाना होगा।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि,विद्युतअधिनियम, 2003 की धारा 47(5) पूर्वभुगतान मीटर को विकल्प के रूप में मान्यता देती है, अनिवार्यता के रूप में नहीं।राज्य विद्युत नियामक आयोगों को अधिनियम की सीमाओं में रहकर नियम बनाने होते हैं।अधिकांश राज्यों में स्मार्ट मीटरिंग को नीति स्तर पर प्रोत्साहन मिला है, किंतु सर्वव्यापी अनिवार्यता का स्पष्ट और निर्विवाद उदाहरण सीमित है।प्रशासनिक आदेश और वैधानिक विनियम में अंतर है।उपभोक्ता सहमति, पारदर्शिता और विधिक प्रक्रिया का पालन अनिवार्य है।इसलिए वर्तमान विधिक स्थिति यह दर्शाती है कि स्मार्ट या पूर्वभुगतान मीटर का व्यापक प्रसार हो रहा है,किंतु इसे पूर्णतःऔर सार्वभौमिक रूप से बाध्यकारी घोषित करने के लिए स्पष्ट विधिक आधार, पारदर्शी प्रक्रिया और न्यायसंगत विनियमन आवश्यक है।यदि भविष्य में कोई राज्य आयोग स्पष्ट रूप से अनिवार्यता घोषित करता है, तो वह तभी वैध मानी जाएगी जब वह,अधिनियम की भावना के अनुरूप हो उपभोक्ता अधिकारों की रक्षा करे विधिक चुनौती की कसौटी पर खरी उतरे इस प्रकार, वर्तमान स्थिति को समझने के लिए केवल प्रशासनिक घोषणाओं पर नहीं, बल्कि अधिनियम, विनियम और न्यायिक व्याख्या पर ध्यान देना आवश्यक है।

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संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425

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