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एक सरकारी स्कूल में 7वीं-8वीं कक्षा के 35 बच्चों द्वारा ब्लेड से अपनी कलाई काटने की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया- प्रशासनिक जवाबदेही, नियमित निरीक्षण और अंतरराष्ट्रीय मानकों की अनिवार्यता

by Page 3 News International Desk
February 21, 2026
in Hindi Editorials
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हमारी रोजमर्रा की व्यवहारिक जिंदगी में राजनीतिक आर्थिक सामाजिक संवाद करते समय हमें शब्दों का चयन सोच समझ कर करना चाहिए

आओ ख़ुशहाल रिश्तों नातों को मज़बूत करने,नजरअंदाजी झुकना व समर्पण का भाव के मन्त्रों को आत्मसत करें

भारतीय रुपया ऐतिहासिक निचले स्तर पर: शेयर बाजार में भारी गिरावट दर्ज- पश्चिम एशिया संकट,वैश्विक बाजारों में उथल-पुथल और भारत की आर्थिक परीक्षा -समग्र अंतरराष्ट्रीय विश्लेषण

भारत में स्कूली बच्चों की सुरक्षा -शिक्षा से आगे बढ़कर जीवन की रक्षा का राष्ट्रीय और वैश्विक दायित्व

शिक्षा विभाग नियमित निरीक्षण सुनिश्चित करे, कलेक्टर औचक निरीक्षण करें,मुख्यमंत्री स्वयं समीक्षा करें व समाज सक्रिय भागीदारी निभाए -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत 142 करोड़ से अधिक आबादी वाला विश्व का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक राष्ट्र है। इतनी विशाल जनसंख्या में करोड़ों बच्चे प्रतिदिन स्कूलों में शिक्षा ग्रहण करने जाते हैं। स्कूल केवल ज्ञान का केंद्र नहीं, बल्कि बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण, सामाजिकविकास और भविष्य की नींव का आधार होते हैं। ऐसे में स्कूलों में बच्चों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। हाल के वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों में हुई घटनाएँ चाहे वह छत्तीसगढ़ के धमतरी जैसी दर्दनाक घटना हो या अन्य राज्यों में स्कूल परिसरों में हुई दुर्घटनाएँ,यह स्पष्ट संकेत देती हैं कि अब केवल शिक्षा की गुणवत्ता ही नहीं, बल्कि सुरक्षा की समग्र व्यवस्था पर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर के मानक लागू करने की आवश्यकता है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि किसी भी सभ्य समाज की प्रगति का वास्तविक मापदंड उसके विद्यालयों की स्थिति और वहाँ पढ़ने वाले बच्चों की सुरक्षा से निर्धारित होता है। विद्यालय केवल ज्ञान अर्जन का केंद्र नहीं, बल्कि भविष्य निर्माण की प्रयोगशाला होते हैं। यदि यह प्रयोगशाला ही असुरक्षित हो जाए तो राष्ट्र की नींव कमजोर हो जाती है। हाल के वर्षों में भारत के विभिन्न राज्यों से सामने आई घटनाएँ चाहे वह छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले की चौंकाने वाली घटना हो या अनेक राज्यों से जर्जर स्कूल भवनों के गिरने की खबरें,यह स्पष्ट संकेत देती हैं कि अब समय आ गया है जब स्कूल सुरक्षा को शिक्षा नीति के पूरक तत्व के रूप में नहीं, बल्कि उसके मूल स्तंभ के रूप में स्थापित किया जाए। शिक्षा की गुणवत्ता, डिजिटल नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा की चर्चा तब तक अधूरी है जब तक बच्चों का जीवन और मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षित न हो।
साथियों बात अगर हम छत्तीसगढ़ के एक स्कूल में हाल में हुई घटना को समझने की करें तो,धमतरी जिले के कुरूद स्थित एक सरकारी स्कूल में 7वीं-8वीं कक्षा के 35 बच्चों द्वारा ब्लेड से अपनी कलाई काटने की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया। यह घटना केवल अनुशासन या प्रशासनिक लापरवाही का मामला नहीं है,बल्कि यह बच्चों की मनोवैज्ञानिक स्थिति,स्कूल वातावरण और सामाजिक संवाद की कमी की गंभीर चेतावनी है। जब काउंसलिंग में यह सामने आया कि बच्चों ने देखा-देखी में यह कदम उठाया, तो यह स्पष्ट हो गया कि किशोरावस्था में सामूहिक प्रभाव और आकर्षण की प्रवृत्ति कितनी तीव्र होती है। यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारे स्कूलों में मानसिक स्वास्थ्य पर पर्याप्त ध्यान दिया जा रहा है? क्या बच्चों को अपनी भावनाएँ व्यक्त करने का सुरक्षित मंच मिल रहा है?क्या शिक्षक औरअभिभावक उनके व्यवहार में होने वाले सूक्ष्म बदलावों को समझ पा रहे हैं? यदि इन प्रश्नों का उत्तर नकारात्मक है,तो हमें अपनी शिक्षा व्यवस्था की प्राथमिकताओं को पुनर्संतुलित करना होगा।
साथियों बात अगर हम 2 दिन पूर्व हाईकोर्ट द्वारा चिंता व्यक्त करने की करें तो,राजस्थान में सरकारी स्कूलों की जर्जर इमारतों पर चिंता व्यक्त करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर बेंच ने राज्य सरकार के बजट को ऊंट के मुंह में जीरा बताया। यह टिप्पणी केवल एक राज्य तक सीमित समस्या नहीं दर्शाती, बल्कि देश के अनेक हिस्सों में स्कूल भवनों की दयनीय स्थिति का प्रतीक है। जब भवनों की छतें कमजोर हों, दीवारों में दरारें हों, विद्युत तार खुले हों और शौचालय अनुपयोगी हों, तब बच्चों की सुरक्षा स्वतः खतरे में पड़ जाती है। बजट आवंटन और वास्तविक आवश्यकता के बीच की खाई को पाटना सरकारों की प्राथमिक जिम्मेदारी है। विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार कर मरम्मत, पुनर्निर्माण और बुनियादी सुविधाओं की व्यवस्था करना केवल प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि सटीक जीवन रक्षा का कार्य है।
साथियों बात अगर हम इस मुद्दे को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में समझने की करें तो, विकसित देशों में भी स्कूल सुरक्षा एक गंभीर चुनौती बनी हुई है। संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे तकनीकी और आर्थिक रूप से समृद्ध राष्ट्र में भी विद्यालयों में गोलीबारी की घटनाएँ समय-समय पर होती रही हैं। 2022 में टेक्सास के उवाल्डे स्थित रोब्ब एलिमेंटरी स्कूल में हुई गोलीबारी ने पूरी दुनियाँ को स्तब्ध कर दिया था। इससे पहले 1999 में कोलोराडो के कॉलम्बीने हाई स्कूल में हुई घटना ने स्कूल सुरक्षा पर वैश्विक बहस को जन्म दिया। इन घटनाओं ने यह सिद्ध कर दिया कि आर्थिक समृद्धि और तकनीकी उन्नति अपने आप में सुरक्षा की गारंटी नहीं हैं। सुरक्षा एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें जोखिम मूल्यांकन, निगरानी, प्रशिक्षण और सामुदायिक सहयोग की निरंतर आवश्यकता होती है। भारत को इन अनुभवों से सीख लेकर अपने विद्यालयों के लिए बहु-स्तरीय अति महत्वपूर्ण सुरक्षा मॉडल विकसित करना चाहिए।
साथियों बात अगर हम भारत में शिक्षा का संचालन मुख्यतः राज्यों के अधीन है, इसको समझने की करें तो राष्ट्रीय स्तरपर नीति निर्माण में मिनिस्ट्री ऑफ़ एजुकेशन की केंद्रीय भूमिका है। नेशनल एजुकेशन पालिसी 2020 ने शिक्षा की गुणवत्ता,समावेशिता और नवाचार पर जोर दिया है, परंतु सुरक्षा को एक स्वतंत्र और अनिवार्य स्तंभ के रूपमें संस्थागत रूपसे स्थापित करने कीआवश्यकता अभी शेष है। स्कूल सुरक्षा नीति को स्पष्ट दिशा-निर्देशों के साथ लागू किया जाना चाहिए, जिसमें भवन सुरक्षा, अग्नि सुरक्षा, विद्युत मानक, स्वच्छ पेयजल, स्वच्छ शौचालय, सीसीटीवी निगरानी, प्रशिक्षित सुरक्षा कर्मी और आपातकालीन प्रतिक्रिया प्रणाली शामिल हों। प्रत्येक विद्यालय के लिए अनिवार्य स्कूल सेफ्टी ऑडिट प्रणाली लागू की जानी चाहिए,जिसका वार्षिक नवीनीकरण हो और जिसकी रिपोर्ट सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हो।जिला स्तर पर कलेक्टर या जिला मजिस्ट्रेट प्रशासनिक व्यवस्था के प्रमुख होते हैं। यदि वे नियमित औचक निरीक्षण करें तो जमीनी स्तर की सच्चाई सामने आ सकती है। औचक निरीक्षण केवल औपचारिकता नहीं होना चाहिए, बल्कि उसमें सुरक्षा उपकरणों की कार्यशीलता, अग्निशामक यंत्रों की सर्विसिंग, सीसीटीवी कैमरों की स्थिति, आपातकालीन निकास मार्गों की उपलब्धता और खेल मैदानों की सुरक्षा का वास्तविक मूल्यांकन शामिल होना चाहिए। कई बार स्कूलों में उपकरण तो लगे होते हैं, परंतु वे निष्क्रिय पड़े रहते हैं। ऐसी स्थिति में दुर्घटना होने पर केवल कागजी प्रमाण किसी बच्चे का जीवन नहीं बचा सकते। इसलिए निरीक्षण प्रणाली को परिणामोन्मुख और जवाबदेह बनाना अत्यंत ही आवश्यक है।
साथियों बात अगर हम ग्रामीण और अर्धशहरी क्षेत्रों में स्थित विद्यालयों की स्थिति को समझने की करें तो यह विशेष चिंता का विषय है।कई स्कूल अस्थायी भवनों में संचालित होते हैं या दशकों पुराने ढाँचों में चल रहे हैं। वर्षा, भूकंप या अन्य प्राकृतिक आपदाओं के दौरान ये भवन अतिरिक्त जोखिम उत्पन्न करते हैं।राज्य सरकारों को वार्षिक स्ट्रक्चरल ऑडिट अनिवार्य करना चाहिए और जर्जर भवनों को तुरंत उपयोग से बाहर कर वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए। निजी विद्यालयों के लिए भी समान मानक लागू होने चाहिए। यदि कोई निजी संस्था सुरक्षा मानकों की अनदेखी करती है तो उसके खिलाफ कठोर दंडात्मक कार्रवाई जुर्माना, मान्यता निलंबन या निरस्तीकरण की व्यवस्था होनी चाहिए।भौतिक संरचना के अतिरिक्त मानसिक और भावनात्मक सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। धमतरी की घटना ने यह स्पष्ट किया कि बच्चों के मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य की अनदेखी गंभीर परिणाम दे सकती है।विद्यालयों में प्रशिक्षित काउंसलर नियुक्त किए जाने चाहिए। प्रत्येक स्कूल में ‘बाल संरक्षण समिति’ का गठन हो और शिक्षकों को लैंगिक संवेदनशीलता तथा बाल अधिकारों पर नियमित प्रशिक्षण दिया जाए। बुलिंग, शारीरिक दंड और लैंगिक उत्पीड़न के मामलों के लिए स्पष्ट शिकायत तंत्र हो। बच्चों को यह विश्वास दिलाना आवश्यक है कि उनकी आवाज सुनी जाएगी और उन पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।यह विश्वास ही सुरक्षा की सबसे मजबूत नींव है।
साथियों बात अगर हम स्कूल परिवहन भी सुरक्षा का अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष है इसको समझने की करें तो, ओवरलोडेड बसें, अप्रशिक्षित चालक औरफिटनेस प्रमाणपत्र की अनदेखी अक्सर दुर्घटनाओं का कारण बनती हैं। परिवहन विभाग और शिक्षा विभाग के संयुक्त निरीक्षण अभियान अनिवार्य होने चाहिए। प्रत्येक स्कूल बस में जीपीएस प्रणाली, फर्स्ट एड किट, अग्निशामक यंत्र और प्रशिक्षित परिचारक होना चाहिए। बस चालकों के लिए नियमित स्वास्थ्य परीक्षण और पृष्ठभूमि सत्यापन भी अनिवार्य किया जाना चाहिए। बच्चों की सुरक्षा स्कूल के गेट तक सीमित नहीं रहनी चाहिए; घर से स्कूल और स्कूल से घर तक की पूरी यात्रा सुरक्षित होनी चाहिए,सामाजिक भागीदारी सुरक्षा तंत्र को और मजबूत बना सकती है। अभिभावक-शिक्षक संघ को केवल परीक्षा परिणाम या शुल्क संरचना तक सीमित न रखकर सुरक्षा समीक्षा में सक्रिय भागीदार बनाया जाना चाहिए।स्थानीय पुलिस, प्रशासन और समुदाय के बीच समन्वय सेसंदिग्ध गतिविधियों पर त्वरित कार्रवाई संभव है। स्कूल सेफ्टी कम्युनिटी नेटवर्क जैसे मॉडल विकसित किए जा सकते हैं, जहाँ समुदाय स्वयं निगरानी में सहयोग करे।डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से अभिभावकों को सुरक्षा रिपोर्ट और निरीक्षण निष्कर्ष उपलब्ध कराए जा सकते हैं।
साथियों बात अगर हम स्कूल सुरक्षा को केवल प्रशासनिक जिम्मेदारी के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है;इसको समझने की करें तो यह एक सामाजिक अनुबंध है जिसमें सरकार, शिक्षक,अभिभावक और समुदाय सभी सहभागी हैं। यदि किसी एक कड़ी में कमजोरी आती है तो पूरी व्यवस्था प्रभावित होती है। इसलिए समन्वित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है। नीति निर्माण से लेकर क्रियान्वयन और निगरानी तक हर स्तर पर पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए।यदि मुख्यमंत्री स्वयं समय-समय पर स्कूलों की सुरक्षा संबंधी समीक्षा बैठकें लें, वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से जिला अधिकारियों से रिपोर्ट प्राप्त करें, और आकस्मिक निरीक्षण करें, तो प्रशासनिक तंत्र में गंभीरता स्वतः आ जाती है। जब शीर्ष नेतृत्व संवेदनशील और सक्रिय होता है, तो निचले स्तर पर भी जवाबदेही बढ़ती है। बच्चों की सुरक्षा केवल शिक्षा विभाग का दायित्व नहीं, बल्कि गृह विभाग, लोक निर्माण विभाग, स्वास्थ्य विभाग और महिला एवं बाल विकास विभाग का भी समन्वित उत्तरदायित्व है।
साथियों बात अगर हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई देशों ने स्कूल सुरक्षा को बहु-आयामी दृष्टिकोण से अपनाया है। आपदा प्रबंधन अभ्यास, नियमित मॉक ड्रिल, मनो वैज्ञानिक सहायता कार्यक्रम और सामुदायिक जागरूकता अभियान को शिक्षा प्रणाली का हिस्सा बनाया गया है। भारत में भी राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के दिशा-निर्देशों को विद्यालय स्तर पर प्रभावी ढंग से लागू किया जाना चाहिए। भूकंप, आग या अन्य आपात स्थितियों के लिए छात्रों और शिक्षकों को प्रशिक्षित करना आवश्यक है ताकि संकट की घड़ी में घबराहट के बजाय संगठित प्रतिक्रिया हो।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि बच्चों की सुरक्षा केवल कानूनी या प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि नैतिक दायित्व है। जिस राष्ट्र में बच्चे सुरक्षित नहीं, वहाँ विकास की कोई भी परिकल्पना अधूरी है। धमतरी जैसी घटनाएँ चेतावनी हैं कि हमें शिक्षा के साथ-साथ सुरक्षा को भी सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। अंतरराष्ट्रीय अनुभवों से सीख लेते हुए,स्थानीयआवश्यकताओं के अनुरूप मजबूत नीतियाँ बनाकर और उनका कठोर क्रियान्वयन सुनिश्चित करके ही हम अपने विद्यालयों को वास्तविक अर्थों में सुरक्षित बना सकते हैं।जब प्रत्येक अभिभावक यह विश्वास कर सके कि उसका बच्चा विद्यालय में सुरक्षित है, तभी शिक्षा व्यवस्था पर समाज का भरोसा पूर्ण रूप से स्थापित होगा। यही विश्वास राष्ट्र की प्रगति की सबसे सुदृढ़ आधारशिला है।

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संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425

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