ईमानदारी को हमने क्यों,मुश्किल का नाम बना डाला है,
भ्रष्टाचार की राह को,सुविधा का काम बना डाला है,
बिना चक्रे काटे काम हो जाए,इसी चाह में बढ़ते जाते हैं,
फिर पूछते हैं,समाज में भ्रष्टाचार क्यों बढ़ते जाते हैं।
रिश्वत देने वाला कहता है,मेरा काम तो जल्दी हो जाएगा
लेने वाला सोचता है,मेरा भी घर इसी से चल जाएगा
दोनों की छोटी-सी सहमति,बड़ी बीमारी बन जाती है,
जेब से निकली रिश्वत,व्यवस्था की जड़ हिला जाती है।
कानून भले ही कठोर बने,जब सोच हमारी बदलती नहीं,
भ्रष्ट हाथों को रोकने वाली,जनचेतना जब चलती नहीं,
हम सुविधा के बदले अपना,ईमान गिरवी रख देते हैं,
भ्रष्टाचार की ऊँची दीवारों पर दोष व्यवस्था का धर देते हैं
जिस दिन काम कराने को रिश्वत,देना हम ठुकराएँगे,
जिस दिन गलत रास्ते की सुविधा पर,सही राह अपनाएँगे
उस दिन कानून अकेला नहीं,जनबल भी रंग दिखाएगा,
ईमानदारी का छोटा कदम,बड़ा बदलाव ले आएगा।
भ्रष्टाचार न केवल कानून की,यह समाज की भी कहानी है
हर रिश्वत के पीछे छिपी,हमारी मजबूरी या मनमानी है
किशन बदलाव वहीं से होगा,जहाँ खुद से सवाल करेंगे
काम सही है तो रिश्वत क्यों?और ईमान से जवाब करेंगे।
