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पश्चिम एशिया की जंग,मध्य-पूर्व संकट- भारत की रसोई तक पहुँचा-एलपीजी संकट के बीच सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 का ब्रह्मास्त्र चलाया-7 साल तक की जेल

by Page 3 News International Desk
March 12, 2026
in Hindi Editorials
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कविता – सच और झूठ का दौर

फनरल ऑफ़ द सेंचुरी: क्या अयातुल्ला अली खामेनेई की 9 जुलाई 2026 को अंतिम विदाई 21वीं सदी का सबसे बड़ा धार्मिक, राजनीतिक और भू-राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन बन रही है? समग्र व्यापक विश्लेषण

सत्य का स्वर,असत्य का शोर

पश्चिम एशिया का मौजूदा संकट यह दिखाता है कि वैश्विक राजनीति और ऊर्जा सुरक्षा एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं

भारत के लिए मौजूदा तेलीय पदार्थ संकट,ऊर्जा आयात पर अत्यधिक निर्भरता देश की आर्थिक स्थिरता के संकट की चेतावनी व ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में अवसर भी प्रदान करता है -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार को एक बार फिर अस्थिर कर दिया है। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच टकराव केवल क्षेत्रीय संघर्ष भर नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।भारत जैसे ऊर्जा आयात पर निर्भर देशों के लिए यह स्थिति विशेष रूप से चुनौतीपूर्ण है।खाड़ी क्षेत्र में युद्ध के कारण दुनियाँ के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक,स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में बाधा उत्पन्न हो गई है। यही मार्ग विश्व के बड़े हिस्से में तेल और गैस की आपूर्ति सुनिश्चित करता है।इस मार्ग में व्यवधान का असर भारत के ईंधन बाजार पर सीधा पड़ा है। एलपीजी टैंकरों के फंस जाने,कच्चे तेल की कीमतों के 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंचने और गैस आपूर्ति में अनिश्चितता के कारण भारत के ऑटो- एलपीजी तथा औद्योगिक गैस बाजार में भारी दबाव पैदा हो गया है,ऐसे में घरेलू और कमर्शियल गैस सिलेंडर की कीमतों में बढ़ोतरी कर दी है. नई दरों के अनुसार घरेलू एलपीजी सिलेंडर 60 रुपए और कमर्शियल सिलेंडर 115 रुपए महंगा हो गया है।स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि सरकार को 5 मार्च 2026 को आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 लागू करना पड़ा।सामान्य परिस्थितियों में यह कानून कम ही इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन मौजूदा संकट ने इसे फिर से सक्रिय करने के लिए सरकार को मजबूर कर दिया। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि दरअसल यह संकट केवल ऊर्जा बाजार का नहीं बल्कि राष्ट्रीय आर्थिक सुरक्षा और आम नागरिकों की दैनिक जरूरतों से जुड़ा हुआहै।भारत में करोड़ों परिवार रसोई गैस पर निर्भर हैं और औद्योगिक उत्पादन भी ऊर्जा आपूर्ति से सीधे जुड़ा हुआ है।ऐसे में पश्चिम एशिया की जंग भारत की रसोई और उद्योग दोनों के लिए सटीक गंभीर चुनौती बनकर सामने आई है।
साथियों बात अगर हम भारत की ऊर्जा निर्भरता:आयात पर आधारित संरचना को समझने की करें तो भारत दुनियाँ की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है और इसके साथ-साथ ऊर्जा की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। लेकिन देश की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि घरेलू स्तर पर तेल और गैस का उत्पादन सीमित है। भारत अपनी कुल तेल जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है।एलपीजी के मामले में भी स्थिति लगभग यही है। देश में हर साल लगभग 3 करोड़ 13 लाख टन एलपीजी की खपत होती है,जबकि घरेलू उत्पादन करीब 1 करोड़ 28 लाख टन ही है। इसका मतलब है कि लगभग 58 प्रतिशत एलपीजी आयात पर निर्भर है।इस आयात का लगभग 85 से 90 प्रतिशत हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते भारत तक पहुंचता है। यह वही समुद्री मार्ग है जो ईरान और ओमान के बीच स्थित है और खाड़ी क्षेत्र से निकलने वाले तेल और गैस का प्रमुख रास्ता माना जाता है।जब इस मार्ग में युद्ध के कारण बाधा आई तो एलपीजी टैंकरों की आवाजाही रुक गई। परिणाम स्वरूप भारत में गैस आपूर्ति की स्थिति अचानक अस्थिर हो गई।सरकार के पास मौजूद बफर स्टॉक के आधार पर देश लगभग 25 से 30 दिन तक एलपीजी की जरूरत पूरी कर सकता है, लेकिन अगर आपूर्ति लंबे समय तक बाधित रहती है तो संकट और भी बहुत गंभीर हो सकता है।
साथियों बात अगर हम कतर की एलएनजी सुविधा पर हमला और आपूर्ति संकट को समझने की करें तो, ऊर्जा संकट को और गहरा करने वाली एक अन्य घटना कतर की एलएनजी सुविधा पर हुए ड्रोन और मिसाइल हमले थे। कतर दुनियाँ के प्रमुख गैस निर्यातकों में से एक हैऔर भारत के लिए भी एलएनजी का महत्वपूर्ण स्रोत है।हमले में कतर की एलएनजी सुविधा को भारी नुकसान पहुंचा, जिसके बाद भारत की कंपनी पेट्रोनेट एलएनजी ने कतर से गैस आपूर्ति पर फोर्स मैजर घोषित कर दिया। इसका मतलब यह हुआ कि अनुबंध होने के बावजूद गैस की आपूर्ति अस्थायी रूप से रोक दी गई।इस घटना ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा के सामने एक नया संकट खड़ा कर दिया।एलएनजी और एलपीजी दोनों की आपूर्ति प्रभावित होने लगी, जिससे ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ गई।ऐसी स्थिति में सरकार के सामने दोहरी चुनौती थी एक ओर घरेलू उपभोक्ताओं के लिए गैस की उपलब्धता सुनिश्चित करना और दूसरी ओर बाजार में जमाखोरी और कालाबाजारी को रोकना।
साथियों बात अगर हम आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955: संकट में सरकार का सबसे बड़ा हथियार इसको समझने की करें तो, ऊर्जा संकट से निपटने के लिए सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम 1955 को लागू किया। यह कानून भारत में आवश्यक वस्तुओं केउत्पादन वितरण और व्यापार को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया था।इस अधिनियम के तहत सरकार को यह अधिकार मिलता है कि वह किसी भी जरूरी वस्तु के उत्पादन,स्टॉक,वितरण और कीमतों पर नियंत्रण स्थापित कर सकती है। इसका मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आम जनता को आवश्यक वस्तुएं उचित कीमत पर और पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हों।इस कानून को अक्सर सरकार का “ब्रह्मास्त्र” कहा जाता है, क्योंकि इसके तहत सरकार को असाधारण अधिकार मिलते हैं। वह कंपनियों और व्यापारियों को निर्देश दे सकती है कि वे कितना उत्पादन करें, कितना स्टॉक रखें और किस कीमत पर बिक्री करें।पेट्रोलियम और पेट्रोलियम उत्पाद इस कानून के तहत शुरू से ही शामिल रहे हैं। हालांकि तेल क्षेत्र में इसका इस्तेमाल बहुत कम होता है। यही कारण है कि 2026 में एलपीजी संकट के दौरान इसका उपयोग एक बड़ा और असामान्य कदम माना जा रहा है।
साथियों बात अगर हम सरकार ने यह कानून क्यों लागू किया? इसको समझने की करें तो सरकार के इस कदम के पीछे कई महत्वपूर्ण कारण हैं।सबसे पहला कारण गैस आपूर्ति में संभावित रुकावट है। खाड़ी देशों से होने वाली गैस आपूर्ति का बड़ा हिस्सा युद्ध के कारण प्रभावित हो गया है। अनुमान है कि भारत को मिलने वाली लगभग 60 प्रतिशत गैस आपूर्ति पर इसका असर पड़ सकता है।दूसरा कारण जमाखोरी और मुनाफाखोरी को रोकना है। जब भी बाजार में किसी आवश्यक वस्तु की कमी की आशंका होती है तो कुछ व्यापारी अधिक लाभ कमाने के लिए उसका स्टॉक जमा करने लगते हैं। इससे कृत्रिम कमी पैदा हो जाती है और कीमतें बढ़ जाती हैं।तीसरा कारण घरेलू उपयोग को प्राथमिकता देना है। सरकार ने रिफाइनरियों को निर्देश दिया है कि वे प्रोपेन और ब्यूटेन जैसे गैस घटकों का इस्तेमाल अन्य उत्पादों के बजाय एलपीजी उत्पादन के लिए करें। इससे घरेलू रसोई गैस की उपलब्धता सुनिश्चित की जा सकेगी। इन सभी कदमों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि देश में गैस की आपूर्ति सामान्य बनी रहे और आम लोगों को संकट का सामना न करना पड़े।
साथियों बात अगर हम एलपीजी उत्पादन और वितरण पर सरकार का नियंत्रण को समझने की करें तोआवश्यक वस्तु अधिनियम लागू होने के बाद सरकार ने एलपीजी उत्पादन और वितरण प्रणाली में कई बदलाव किए हैं।रिफाइनरियों को स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने उत्पादन का बड़ा हिस्सा घरेलू एलपीजी जरूरतों को पूरा करने में लगाएं। इसके अलावा व्यापारियों और वितरकों के लिए स्टॉक लिमिट तय की जा सकती है।अगर कोई व्यापारी या कंपनी तय सीमा से अधिक स्टॉक जमाकरती है तो प्रशासन उसके खिलाफ कार्रवाई कर सकता हैइस कानून के तहत अधिकारियों को यह अधिकार है कि वे गोदामों की जांच करें और जरूरत पड़ने पर स्टॉक जब्त कर लें।इस व्यवस्था का उद्देश्य बाजार में पारदर्शिता बनाए रखना और आपूर्ति श्रृंखला को संतुलित करना है।आवश्यक वस्तु अधिनियम के तहत नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का प्रावधान है।इस कानून की धारा 7 के अनुसार अगर कोई व्यक्ति या संस्था जमाखोरी, कालाबाजारी या अवैध व्यापार में शामिल पाई जाती है तो उसे 3 महीने से लेकर 7 साल तक की जेल हो सकती है। इसके साथ ही भारी जुर्माना भी लगाया जा सकता है।इस सख्त प्रावधान का उद्देश्य यहसुनिश्चित करना है कि बाजार में कोई भी व्यक्ति या संस्था संकट की स्थिति का फायदा उठाकर अनुचित लाभ बिलकुल भी न कमा सके।
साथियों बात अगर हम 2022 के बाद पहली बार इतना बड़ा कदम इसको समझने की करें तो, तेल क्षेत्र में आवश्यक वस्तु अधिनियम का इस्तेमाल बहुत कम होता है। इससे पहले 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान इसे सीमित रूप से लागू किया गया था।उस समय सरकार ने रिफाइनरियों को निर्यात रोककर घरेलू बाजार में आपूर्ति बनाए रखने के निर्देश दिए थे।लेकिन 2026 में एलपीजी उत्पादन के लिए सीधे निर्देश देना एक असाधारण कदम माना जा रहा है।विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम इस बात का संकेत है कि सरकार ऊर्जा संकट को लेकर गंभीर है और घरेलू उपभोक्ताओं की सुरक्षा को प्राथमिकता दे रही है।
साथियों बात अगर हम गैस सिलेंडर बुकिंग नियमों में बदलाव को समझने की करें तो ऊर्जा संकट के बीच सरकार ने गैस सिलेंडर बुकिंग के नियमों में भी बदलाव किया है। पहले उपभोक्ता किसी सिलेंडर की डिलीवरी के 21 दिन बाद नया सिलेंडर बुक कर सकते थे,लेकिन अब इस अवधि को बढ़ाकर 25 दिन कर दिया गया है सरकार का कहना है कि यह बदलाव जमाखोरी को रोकने और वितरण प्रणाली को संतुलित बनाए रखने के लिए किया गया है।हालांकि कुछ परिवारों में गैस की खपत अधिक होती है, इसलिए यह चिंता भी सामने आई है कि अगर सिलेंडर 25 दिन से पहले खत्म हो जाए तो क्या होगा ऐसे में उपभोक्ताओं के लिए उपलब्ध विकल्प अगर किसी परिवार में गैस सिलेंडर जल्दी खत्म हो जाता है तो उपभोक्ता अपनी गैस एजेंसी या डिस्ट्रीब्यूटर से संपर्क कर सकते हैं। कई मामलों में एजेंसी विशेष अनुमति देकर जल्दी बुकिंग की सुविधा प्रदान कर सकती है।
इसके अलावा उपभोक्ता अतिरिक्त शुल्क देकर इमरजेंसी सिलेंडर भी प्राप्त कर सकते हैं। जिन परिवारों में गैस की खपत अधिक है उनके लिए डबल सिलेंडर कनेक्शन लेना एक बेहतर विकल्प हो सकता है।इस व्यवस्था में एक सिलेंडर खत्म होने के बाद दूसरा तुरंत इस्तेमाल किया जा सकता है और इस दौरान नया सिलेंडर बुक करने के लिए पर्याप्त समय मिल जाता है।
साथियों बात अगर हम ऊर्जा संकट और भारत की दीर्घकालिक रणनीति को समझने की करें तो मौजूदा संकट ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत को ऊर्जा सुरक्षा के लिए दीर्घकालिक रणनीति अपनानी होगी।सरकार पहले से ही कई कदम उठा रही है। इनमें रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार का निर्माण, वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों का विकास और इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना शामिल है।भारत सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों पर भी तेजी से काम कर रहा है। इसके अलावा जैव ईंधन और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे विकल्पों को भी बढ़ावा दिया जा रहा है।इन सभी प्रयासों का उद्देश्य तेल और गैस आयात पर निर्भरता को धीरे-धीरे कम करना है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक राजनीति का नया समीकरण बना है,पश्चिम एशिया का मौजूदा संकट यह दिखाता है कि वैश्विक राजनीति और ऊर्जा सुरक्षा एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं। ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं है बल्कि इसका असर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ रहा है।भारत के लिए यह स्थिति एक चेतावनी भी है और एक अवसर भी।चेतावनी इसलिए क्योंकि ऊर्जा आयात पर अत्यधिक निर्भरता देश की आर्थिक स्थिरता को प्रभावित कर सकती है।अवसर इसलिए क्योंकि यह संकट ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में तेज कदम उठाने का मौका भी देता है।आवश्यक वस्तु अधिनियम का उपयोग करके सरकार ने फिलहाल गैस संकट को नियंत्रित करने की कोशिश की है।लेकिन दीर्घकालिक समाधान तभी संभव है जब भारत ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाए और घरेलू उत्पादन तथा नवीकरणीय ऊर्जा को प्राथमिकता दे। यदि ऐसा किया जाता है तो भविष्य में किसी भी वैश्विक संकट का प्रभाव भारत की रसोई और उद्योग पर सीमित रहेगा और देश अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत बना

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संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425

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