बचपन में पिता की जेब से हर अरमान निकलता था,
हमारी हर छोटी-बड़ी ज़रूरत का सामान निकलता था।
ख़ुद के सपनों को रोक,वो हम पर ख़ुशियाँ लुटाते थे,
हमारी मुस्कान देखकर ही वो अपना सुख पाते थे।
समय बदला,हम बड़े हुए, दुनियाँ में नाम कमाने लगे,
पिता की उँगली छोड़कर अपने रास्ते बनाने लगे।
मगर उनकी थकी आँखों का हाल पूछना भूल गए,
जिस जेब ने हमें सँवारा,उसी जेब को भूल गए।
जिस जेब में कभी हमारी हर फ़रमाइश पूरी होती थी,
आज उसी जेब में दवाइयों की पर्ची भी अधूरी होती थी।
बुढ़ापे ने हाथ फैलाए,मगर स्वाभिमान नहीं झुकाया,
पिता ने अपनी तंगी का दर्द कभी हमें नहीं बताया।
हमने ही एक दिन पूछ लिया,पैसे कहाँ खर्च कर दिए?
पिता ने चुप रहकर अपने आँसू आँखों में भर लिए।
जिसने हमारी खातिर अपनी पूरी उम्र लुटा दी,
उसी की खाली जेब पर हमने इल्ज़ाम की मुहर लगा दी।
ऐ औलाद!पिता की जेब नहीं,उनका दिल देखा करो,
उनकी ज़रूरत पूछो,सिर्फ हिसाब मत लिया करो।
किशन कल उनकी खाली जेब बहुत कुछ समझाएगी,
आज कद्र करोगे,वही क़ल दुआ बनकर लौट आएगी।


