मोह इतना भी न हो कि दोष दिखाई न दें,
प्रेम इतना अंधा न हो कि सत्य सुनाई न दे,
और घृणा इतनी भी न हो किसी के व्यक्तित्व से,
कि उसके भीतर छिपे सद्गुण दिखाई न दें।
मोह की चादर में सच को कभी ढकने न देना,
किसी अपने के दोषों को पुण्य समझने न देना,
क्योंकि प्रेम वही है जो सुधार का साहस दे,
न कि अंधा समर्थन देकर पतन का रास्ता दे।
घृणा के अंधकार में विवेक को खोने न देना,
किसी की बुराई में उसकी अच्छाई को मिटने न देना,
हर इंसान में कुछ कमियां, कुछ खूबियां होती हैं,
नफरत की दृष्टि अक्सर इंसानियत से दूर होती है।
न मोह में न्याय मरे,न घृणा में सत्य हार जाए,
न अपना होने का अहंकार किसी का अपराध छिपाए,
न पराया होने का द्वेष किसी की अच्छाई मिटाए,
मनुष्य वही जो हर व्यक्ति को निष्पक्ष होकर अपनाए।
न प्रेम में अंधापन हो,न विरोध में प्रतिशोध हो,
न निर्णय में पक्षपात हो,न विचारों में अवरोध हो,
किशन चरित्र की पहचान रिश्तों से नहीं,कर्मों से होती है, इंसानियत की असली जीत निष्पक्ष दृष्टि में होती है।
