मतदाता सूची से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मचा चुनावी घमासान! -मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग, एसआईआर पर कानूनी चुनौती, ईसीआईनेट के फॉरेंसिक ऑडिट की मांग और देशव्यापी विरोध प्रदर्शन!
मतदाता सूची से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक मचा चुनावी घमासान! -एसआईआर की पारदर्शिता और मताधिकार की सुरक्षा पर छिड़ी राष्ट्रीय बहस! -क़्या मतदाता का अधिकार बनाम चुनाव आयोग की जवाबदेही बनेगा 2026 का सबसे बड़ा संवैधानिक प्रश्न? -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत में 2 अक्टूबर का दिन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की जयंती के रूप में सत्य, अहिंसा,सादगी, लोकतांत्रिक मूल्यों और सार्वजनिक जीवन में नैतिकता की याद दिलाता है। किंतु 2 अक्टूबर 2026 को देश के राजनीतिक एवं संवैधानिक परिदृश्य में एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है,जिसने भारतीय चुनाव व्यवस्था की पारदर्शिता, निर्वाचन आयोग की संस्थागत स्वतंत्रता और करोड़ों मतदाताओं के मताधिकार को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है।देश के मुख्य चुनाव आयुक्त के विरुद्ध इस्तीफे,जवाबदेही और विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर ) प्रक्रिया की जांच की मांग को लेकर विभिन्न राजनीतिक दलों,युवा संगठनों और नागरिक समूहों ने विरोध प्रदर्शन आयोजित किए हैं। इस घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि विवाद अब केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रहाबल्कि सर्वोच्च न्यायालय में भी पहुंच चुका है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनाना गोंदिया महाराष्ट्र मीडिया के हवाला से रिसर्च कर इस आर्टिकल के माध्यम से यह बताना चाहूंगा क़ि आखिर क्या है ज्ञानेश कुमार से जुड़ा पूरा विवाद? विवाद का मूल चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण अर्थात एसआईआर की प्रक्रिया और इस दौरान लिए गए निर्णयों को लेकर है। इस प्रक्रिया का घोषित प्रशासनिक उद्देश्य मतदाता सूची को अद्यतन करना,मृत एवं स्थानांतरित मतदाताओं की प्रविष्टियों की जांच करना, डुप्लीकेट नामों को हटाना और पात्र नए मतदाताओं को शामिल करना है।लेकिन आलोचकों का आरोप है कि प्रक्रिया के दौरान दस्तावेजों की आवश्यकताओं,नाम हटाने की पद्धति,फॉर्म-6 में बदलाव और डिजिटल प्रणालियों के संचालन को लेकर गंभीर सवाल उत्पन्न हुए हैं।
साथियों,याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि लगभग 13 करोड़ नाम मतदाता सूचियों से हटाए गए हैं।यह आंकड़ा याचिकाओं और रिपोर्टों में उठाया गया दावा है,इसे स्वतः13 करोड़ पात्र मतदाताओं के मताधिकार से वंचित होने का प्रमाण नहीं माना जा सकताविवाद को और गंभीरता तब मिली जब मीडिया रिपोर्टों में सामने आया कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले लगभग दस महीनों में आयोग की कुछ प्रक्रियाओं और निर्णयों पर कम से कम 14 अवसरों पर आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्टों में फॉर्म-6, मतदाता सूची में नाम जोड़ने-हटाने तथा एसआईआर से संबंधित प्रक्रियाओं का उल्लेख किया गया। हालांकि चुनाव आयोग ने अपने निर्णयों को संस्थागत प्रक्रिया के अनुरूप बताया है। इसलिए इन आपत्तियों को स्थापित अनियमितता के बजाय जांच और स्पष्टीकरण की आवश्यकता वाले तथ्यों के रूप में देखना सटीकता से उचित होगा।
साथियों बात अगर हम सर्वोच्च न्यायालय में 5 अक्टूबर की सुनवाई क्यों महत्वपूर्ण? इसको समझने की करें तो इस विवाद में 5 अक्टूबर 2026 को प्रस्तावित सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई विशेष महत्व रखती है। मीडिया में उपलब्ध समाचार रिपोर्टों के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश सहित तीन सदस्यों की पीठ के समक्ष संबंधित याचिकाओं पर सुनवाई निर्धारित है। याचिकाओं में यह प्रश्न उठाया गया है कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त ने आयोग के अन्य सदस्यों की आवश्यक सहमति के बिना एसआईआर संबंधी महत्वपूर्ण निर्णय लिए और क्या ऐसे निर्णय संवैधानिक तथा वैधानिक प्रक्रियाओं के अनुरूप थे।याचिकाकर्ताओं ने कथित एकतरफा निर्देशों, दिशानिर्देशों और सॉफ्टवेयर में किए गए बदलावों को अवैध घोषित करने की मांग की है।इसके साथ ही मुख्य चुनाव आयुक्त तथा संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई, सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में स्वतंत्र न्यायिक जांच अथवा विशेष जांच दल गठित करने और ईसीआईनेट तथा ईआरओनेट प्रणालियों का तकनीकी एवं फॉरेंसिक ऑडिट कराने की मांग भी उठाई गई है। आयोग के मूल अभिलेख, फाइल टिप्पणियां और बैठकों के कार्यवृत्त न्यायालय में प्रस्तुत कराने का आग्रह किया गया है। सबसे महत्वपूर्ण अंतरिम मांग यह है कि न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने तक ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में कार्य करने से रोका जाए। यह याचिकाकर्ताओं की प्रार्थना है,न्यायालय द्वारा स्वीकार किया गया आदेश नहीं। सुनवाई का वास्तविक महत्व इस बात में होगा किन्यायालय निर्णय प्रक्रिया, आयोग की सामूहिक शक्ति और मतदाता सूची पुनरीक्षण कीवैधानिकता से जुड़े प्रश्नों पर क्या निर्देश देता है।
साथियों बात अगर हम गांधी जयंती पर मुंबई से देशव्यापी आंदोलन की शुरुआत को समझने की करें तो 2 अक्टूबर के विरोध प्रदर्शनों में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी ) के संस्थापक की घोषणा विशेष चर्चा में रही है। संगठन ने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग को लेकर मुंबई से देशव्यापी आंदोलन शुरू करने की योजना घोषित की थी। इसके बाद विभिन्न शहरों में विरोध कार्यक्रमों और आगे आंदोलन को विस्तारित करने की बात सामने आई। मुंबई में प्रस्तावित प्रदर्शन के लिए शिवाजी पार्क क्षेत्र का उल्लेख किया गया था। हालांकि पुलिस अनुमति को लेकर प्रशासन और आयोजकों के बीच मतभेद की खबरें भी सामने आईं। दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर भी पुलिस अनुमति नहीं मिलने और सुरक्षा व्यवस्था कड़ी किए जाने की रिपोर्टें प्रकाशित हुईं।अतः सभी स्थानों पर एक समान रूप से आंदोलन आयोजित होने अथवा इंटरनेट बंद किए जाने का दावा बिना स्थान-विशिष्ट आधिकारिक पुष्टि के नहीं किया जाना चाहिए। आंदोलन की प्रमुख मांगों में मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा अथवा संवैधानिक प्रक्रिया के तहत हटाने की पहल,मतदाता सूची पुनरीक्षण की स्वतंत्र जांच, हटाए गए पात्र मतदाताओं के नामों की बहाली,चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया का खुलासा और डिजिटल चुनावी प्रणालियों की जवाबदेही शामिल हैं।विपक्षी दलों की ओर से मतपत्र आधारित मतदान,एसआईआर से पूर्व की मतदाता सूचियों को लेकर पुनर्विचार और प्रभावी अपील व्यवस्था जैसी मांगें भी सामने आई हैं। यहां यह समझना आवश्यक है कि इस्तीफा, महाभियोग अथवा पद से हटाने की मांगें राजनीतिक और संवैधानिक रूप से अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए संविधान में निर्धारित प्रक्रिया लागू होती है; किसी राजनीतिक प्रदर्शन की मांग अपने आप पद से हटाने का कानूनी आदेश नहीं बन जाती।
साथियों बात अगर हम फॉर्म-6 और चुनाव आयोग की आंतरिक आपत्तियों का प्रश्न इसको समझने की करें तो मतदाता सूची में नए पात्र मतदाता का नाम जोड़ने के लिए फॉर्म-6 महत्वपूर्ण माध्यम है। इस फॉर्म और उससे जुड़ी प्रक्रिया में बदलाव को लेकर भी विवाद उठा है। याचिकाकर्ताओं ने मूल फॉर्म- 6 व्यवस्था बहाल करने तथा निर्णयों की वैधानिकता की जांच करने की मांग की है। दूसरी ओर आयोग का पक्ष है कि एसआईआर संबंधी निर्णय निर्धारित संस्थागत प्रक्रिया के अंतर्गत लिए गए।
इस प्रकरण में वास्तविक संवैधानिक प्रश्न यह है कि बहुसदस्यीय निर्वाचन आयोग की शक्तियों का प्रयोग किस प्रकार किया जाना चाहिए। यदि किसी निर्णय पर आयोग के सदस्यों के बीच असहमति दर्ज हुई है,तो संबंधित फाइलों अनुमोदनों और बैठक के अभिलेखों से स्थिति स्पष्ट हो सकती है। पारदर्शिता का अर्थ केवल आरोपों को स्वीकार करना नहीं, बल्कि प्रमाणों के आधार पर उनका निष्पक्ष सटीकता से परीक्षण करना भी है।
साथियों बात अगर हम एसआईआर पूरा कर चुके राज्यों में फिर चलेगा विशेष अभियान को समझने की करें तो विवाद के बीच चुनाव आयोग द्वारा एसआईआर प्रक्रिया पूरी कर चुके राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता सूची अद्यतन करने के लिए विशेष अभियान की तैयारी का समाचार भी महत्वपूर्ण है। 29 सितंबर को राज्यों को भेजे गए निर्देशों तथा मुख्य निर्वाचन अधिकारियों के साथ चर्चा के अनुसार अभियान का उद्देश्य उन पात्र नागरिकों की पहचान करना है, जिनके नाम पुनरीक्षण के दौरान सूची में शामिल नहीं हो सके। 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके नए मतदाताओं को जोड़ने पर भी ध्यान दिया जाएगा। इस प्रक्रिया में एसआईआर से पहले और बाद की मतदाता सूचियों का मिलान किया जाना है,ताकि पात्रमतदाताओं के नाम गलती से हटने की स्थिति का पता चल सके। संदिग्ध मामलों में संबंधित व्यक्ति की वास्तविक स्थिति, मृत्यु अथवा स्थानांतरण तथा डुप्लीकेट प्रविष्टियों की जांच की जाएगी। पात्र पाए जाने पर फॉर्म-6 के माध्यम से नाम पुनः जोड़ने की प्रक्रिया सटीकता से अपनाई जा सकती है।
साथियों यहां बूथ लेवल अधिकारियों के साथ राजनीतिक दलों के बूथ लेवल एजेंटोंकी भूमिका भी महत्वपूर्ण है। मतदाता सूची की शुद्धता के लिए प्रशासनिक जांच और राजनीतिक दलों की निगरानी के बीच समन्वय आवश्यक है।बीएलओ घर जाकर ले सकेंगे दस्तावेज, ईसीआईनेट की भी होगी समीक्षा एसआईआर के दौरान अनमैप्ड अथवा तार्किक विसंगतियों के कारण नोटिस प्राप्त करने वाले मतदाताओं के लिए दस्तावेज जमा करने की प्रक्रिया को सरल बनाने के निर्देश भी चर्चा में हैं। इसके अंतर्गत बीएलओ संबंधित मतदाता के घर जाकर दस्तावेज प्राप्त कर सकते हैं और उन्हें ऑनलाइन प्रणाली में अपलोड कर सकते हैं। इसके बाद निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी दस्तावेजों की जांच करेंगे। यदि अतिरिक्त जानकारी की आवश्यकता होगी तो मतदाता को उसे प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाएगा। नाम हटाने की कार्रवाई जांच और सुनवाई की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही की जानी चाहिए।इसी क्रम में ईसीआईनेट की समीक्षा के लिए स्वतंत्र तकनीकी विशेषज्ञों, जिनमें आईआईटी अथवा आईआईआईटी से जुड़े विशेषज्ञ शामिल हो सकते हैं, वाली समिति गठित करने की योजना का उल्लेख किया गया है।आवश्यकता नुसार सॉफ्टवेयर में सुधार किए जाने की बात भी सामने आई है। डिजिटल चुनावी व्यवस्था में तकनीकी पारदर्शिता अभिलेखों की सुरक्षा, बदलावों का लेखा-परीक्षण और नागरिकों के लिए शिकायत निवारण की सुविधा लोकतांत्रिक विश्वास के महत्वपूर्ण आधार हैं।
-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

