पतंग कभी आसमान में हारती नहीं,
डोर टूटे तो ऊँचाइयाँ रहती नहीं,
दुनियाँ कहती है कि पतंग कट गई,
पर सच यह है कि उसकी डोर थम गई।
इंसान भी परिस्थितियों से हारता है,
वक्त के थपेड़ों में बिखरता-सँवरता है,
लोग उसके गिरने को गलती बताते हैं,
उसके संघर्ष को कहाँ समझ पाते हैं?
न इंसान हर बार ग़लत होता है,
कभी वक्त भी उसके विरुद्ध होता है,
जिसे दुनियाँ उसकी नाकामी कहती है,
वही घड़ी उसके अनुभवों को गढ़ती है।
आज जो गिरा है,कल उड़ भी जाएगा,
वक्त का पहिया फ़िर करवट बदल जाएगा,
जो आज उसे दोषों के तराजू में तौलते हैं,
कल वही उसकी कामयाबी के किस्से बोलते हैं।
न पतंग को कोसो,न इंसान को दोष दो,
टूटी हुई डोर को फिर से जोड़ दो,
किशन हार का फैसला चेहरा नहीं,वक्त करता है,
और वक्त ही टूटे हौसलों को फिर पंख देता है।
