
सारिमुल लस्कर, सिलचर: काछाड़ जिले के काटीगढ़ से नवनिर्वाचित विधायक कमलाख्य देव पुरकायस्थ ने बदरपुर शहर का नाम बदलकर ‘सिद्धेश्वर धाम’ करने का प्रस्ताव देकर बाराक घाटी में नया राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया है। मुख्यमंत्री हिमंत विश्व शर्मा को लिखे पत्र में उन्होंने बदरपुर नगर बोर्ड का नाम ‘सिद्धेश्वर धाम म्यूनिसिपल बोर्ड’ करने की मांग की है। मुख्यमंत्री ने इस प्रस्ताव पर सकारात्मक प्रतिक्रिया देते हुए शहरी विकास विभाग को प्रक्रिया आगे बढ़ाने का निर्देश दिया है।
सोशल मीडिया पर प्रस्ताव वायरल होते ही तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं। कुछ लोगों ने इसे स्थानीय सिद्धेश्वर शिव मंदिर की परंपरा का सम्मान और पर्यटन बढ़ाने का प्रयास बताया है, लेकिन अधिकांश लोगों ने इसकी कड़ी निंदा की है। कई लोग पूछ रहे हैं कि सड़कों की बदहाली, शिक्षा-स्वास्थ्य की खराब व्यवस्था, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जैसे बुनियादी मुद्दों को हल किए बिना नाम बदलने का यह सिलसिला क्यों चल रहा है?
यह पहली घटना नहीं है। पिछले साल करीमगंज जिले का नाम बदलकर ‘श्रीभूमि’ किया गया था, जिस पर भी व्यापक विवाद और विरोध हुआ था। बदरपुर ऐतिहासिक रूप से बाराक घाटी का प्रवेश द्वार के रूप में जाना जाता है। ब्रिटिश काल से चला आ रहा यह नाम रेलवे जंक्शन और वाणिज्यिक महत्व के कारण प्रसिद्ध है। अब इसे धार्मिक रंग देने की कोशिश को कई लोग भाजपा सरकार की विकास विफलताओं पर पर्दा डालने की योजना मान रहे हैं।
स्थानीय निवासी बताते हैं कि काटीगढ़-बदरपुर क्षेत्र में सड़कों की स्थिति बेहद खराब है, खुलेआम सेंडिगेट राज चल रहा है और बुनियादी सुविधाओं की भारी कमी है। इन मुद्दों पर चर्चा करने के बजाय नाम बदलने की राजनीति से जनता का ध्यान दूसरी ओर मोड़ने की कोशिश की जा रही है।
एक जागरूक नागरिक ने सोशल मीडिया पर विधायक कमलाख्य देव पुरकायस्थ को सीधा चुनौती देते हुए लिखा: “अगर नाम बदलने से विकास होता है, तो जितने भी नाम हैं सब बदल दीजिए। जरूरत पड़े तो लोगों के नाम भी बदल दीजिए, लेकिन काटीगढ़ का विकास कर दीजिए।” यह पोस्ट वायरल होकर व्यापक चर्चा में है।
विधायक कमलाख्य देव पुरकायस्थ का कहना है कि यह बदलाव क्षेत्र की सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान को मजबूत करेगा और विकास के नए आयाम खोलेगा। हालांकि आलोचकों का मानना है कि बाराक घाटी की मिश्रित संस्कृति — हिंदू, मुस्लिम, बंगाली और असमिया परंपराओं के सामंजस्य को ऐसे एकतरफा फैसले नुकसान पहुंचा सकते हैं।
बदरपुर का नाम बदलना अभी अंतिम रूप से तय नहीं हुआ है। सरकार ने कहा है कि स्थानीय जनमत की जांच की जाएगी। लेकिन बाराक घाटी के आम लोग एक सवाल पूछ रहे हैं — क्या विकास सिर्फ नाम बदलने से होता है, या वास्तविक काम से? सड़क, बिजली, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की मांग में लोग अभी भी इंतजार कर रहे हैं। नाम बदलने की राजनीति अब उनकी आकर्षण का केंद्र नहीं रही है।