खाने में कोई ज़हर दे,तो उपचार मिल जाता है,
दवा और दुआ से जीवन फिर सँभल जाता है।
मगर कानों में कोई नफ़रत का ज़हर घोल दे,
तो हँसता-खेलता रिश्ता भी पलभर में बिखर जाता है।
तन के ज़ख्मों पर मरहम लगाकर घाव भरे जाते हैं,
टूटे हुए विश्वास के टुकड़े मुश्किल से जुड़ पाते हैं।
ज़हरीली बातें जब अपनों के कानों में उतर जाती हैं,
तो बरसों की मोहब्बत भी शक की भेंट चढ़ जाती है।
ज़हर देने वाला तो बस एक जीवन मिटाता है,
मगर कान भरने वाला कई रिश्तों को जलाता है।
एक झूठी बात से विश्वास की नींव हिल जाती है,
बिना कसूर मोहब्बत भी अदालत में खड़ी हो जाती है।
हर सुनी हुई बात को सच मान लेना समझदारी नहीं,
बिना परखे किसी पर शक करना वफ़ादारी नहीं।
जो दूसरों की बातों में आकर अपनों से दूर हो जाते हैं,
वे अक्सर अपने ही हाथों खुशियों के दीप बुझाते हैं।
ज़हर से बचना हो तो भोजन पर ध्यान रखिए,
रिश्तों को बचाना हो तो शब्दों का सम्मान रखिए।
किशन कानों में ज़हर घोलने वालों से सावधान रहिए,
सुनी-सुनाई पर नहीं,सत्य पर विश्वास रखिए।


