मैं सब कुछ हूँ,तुम कुछ भी नहीं,
इस सोच से बड़ा कोई भ्रम नहीं।
जहाँ अहंकार ने दिल में घर बनाया,
वहाँ इंसानियत ने दम तोड़ पाया।
कोई दौलत के नशे में चूर हुआ,
कोई अपने पद के गुरूर में चूर हुआ।
खुद को ऊँचा,दूजों को छोटा समझा,
इसी सोच में इंसान,इंसान से दूर हुआ।
न कोई छोटा है,न कोई बड़ा,
सबकी साँसों का एक ही सिलसिला।
जो दूसरों के मान को ठुकराता है,
वह अपने ही व्यक्तित्व को गिराता है।
किस बात का इतना अभिमान करें,
क्यों दूजों का अपमान करें?
कल वक्त बदलते देर नहीं लगती,
क्यों रिश्तों को अहंकार के नाम करें?
बनना है इंसान,तो इंसानियत जगाइए,
दूसरों को भी अपने जैसा समझिए।
किशन मैं ही सब कुछ की दीवार गिराइए,
हम सब एक हैं का दीप जलाइए।


