आर पी तोमर
दिल्ली। देश के सबसे व्यस्त हवाई अड्डे, दिल्ली के इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय एयरपोर्ट से संचालित 800 से अधिक विमान सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हुईं। इसके पीछे फिलहाल एटीसी की तरफ से ऑटोमैटिक मैसेज स्विचिंग सिस्टम में खराबी बताया गया है। हालांकि, कुछ मीडिया रिपोर्ट में इस गड़बड़ी के पीछे जीपीएस स्पूफिंग जैसे साइबर अपराध की भूमिका को भी रेखांकित किया गया है। इस कारण दिल्ली, जयपुर, लखनऊ मुंबई समेत कई हवाई अड्डों से संचालित उड़ानों पर असर पड़ा है। आइए जानते क्या है जीपीएस स्पूफिंग और सरकार ने इसे लेकर अब तक कौन-सी जानकारी साझा की है। जीपीएस स्पूफिंग को साइबर हमला भी कहा जाता है, इस हमले में नकली सैटेलाइट सिग्नल भेजे जाते हैं ताकि विमान के नेविगेशन सिस्टम को गुमराह किया जा सके। इससे विमान को अपनी वास्तविक स्थिति की गलत जानकारी मिलती है, जिसके चलते कई उड़ानें प्रभावित हुईं है। पिछले कुछ दिनों में दिल्ली एयरपोर्ट पर कई उड़ानों के रास्ते भटकने समेत कई की शिकायतें मिलीं। मंगलवार को दिल्ली एयरपोर्ट दुनिया में दूसरे स्थान पर सबसे ज्यादा उड़ान में व्यवधान वाला एयरपोर्ट रहा। कम से कम सात उड़ानों को जयपुर और लखनऊ जैसे नजदीकी हवाई अड्डों की ओर मोड़ना पड़ा। शुक्रवार को भी 800 से ज्यादा उड़ानें देरी से चलीं, जिन्हें आधिकारिक तौर पर एटीसी की तकनीकी खराबी बताया गया था।हालांकि शुक्रवार की देरी को एटीसी सिस्टम की समस्या बताया गया, लेकिन जांच में यह बात सामने आ रही है कि जीपीएस सिग्नल की गड़बड़ी भी एक बड़ा कारण हो सकता है। नेविगेशन इंटीग्रिटी कैटेगरी वैल्यू, जो विमान की स्थिति की सटीकता मापती है, सामान्य स्तर 8 से गिरकर 0 पर आ गई थी। यह स्थिति बेहद असामान्य मानी जाती है। नागरिक उड्डयन महानिदेशालय ने इन घटनाओं का संज्ञान लेते हुए जांच शुरू कर दी है। इस मामले में पायलटों ने बताया कि यह गड़बड़ी दिल्ली से 60 नॉटिकल मील (लगभग 110 किमी) की सीमा में ज्यादा दिखाई दी।

दिल्ली एयरपोर्ट के मुख्य रनवे का इंस्ट्रूमेंट लैंडिंग सिस्टम फिलहाल अपग्रेड के लिए बंद है। इसे कैटेगरी-तृतीय सिस्टम में बदला जा रहा है, जिससे सर्दियों में घने कोहरे के बीच भी दोनों दिशाओं से लैंडिंग संभव हो सकेगी। इस सिस्टम के अस्थायी रूप से बंद रहने के कारण विमान अब सैटेलाइट-आधारित नेविगेशन पर निर्भर हैं, जो उन्हें स्पूफिंग के लिए अधिक संवेदनशील बनाता है। जीपीएस स्पूफिंग एक साइबर हमला है, जिसमें नकली सिग्नल भेजकर किसी भी डिवाइस को गलत लोकेशन दिखाई जाती है। जैसे आपके फोन की लोकेशन अचानक 4 किमी दूर दिखने लगे, वैसा ही विमानों के साथ होता है। जब यह विमान के साथ होता है, तो उसका नेविगेशन सिस्टम गलत दिशा में जा सकता है, जिससे दुर्घटना का खतरा काफी बढ़ जाता है। इससे पहले भारत सरकार ने लोकसभा में बताया था कि नवंबर 2023 से फरवरी 2025 के बीच 465 जीपीएस स्पूफिंग की घटनाएं भारत-पाकिस्तान सीमा क्षेत्र (अमृतसर और जम्मू) में दर्ज की गईं। वहीं अंतरराष्ट्रीय वायु परिवहन संघ (आईएटीए) की रिपोर्ट के अनुसार, साल 2024 में 4.3 लाख जीपीएस जैमिंग और स्पूफिंग घटनाएं दर्ज की गईं, जो 2023 की तुलना में 62% अधिक हैं। जीपीएस स्पूफिंग की घटना दुनिया के तमाम देशों में भी देखने को मिली है। दिसंबर 2024 में कजाकिस्तान में अजरबैजान एयरलाइंस का विमान दुर्घटनाग्रस्त हुआ, जिसमें 38 लोग मारे गए। इस हादसे के लिए यह माना जाता है कि यह जीपीएस स्पूफिंग और जैमिंग के कारण रूसी रक्षा प्रणाली की गलती से हुआ। वहीं मार्च 2025 में म्यांमार में राहत सामग्री लेकर जा रहे भारतीय वायुसेना के विमान को भी चीन समर्थित सिस्टम से जीपीएस स्पूफिंग का सामना करना पड़ा। हालांकि कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि भारत-पाकिस्तान सीमा पर तैनात जीपीएस जैमर्स, जो पाकिस्तान की सैन्य गतिविधियों को रोकने के लिए लगाए गए हैं, कभी-कभी उत्तर भारत के भीतर उड़ान भरने वाले विमानों को भी प्रभावित करते हैं।