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विश्व चक्रीय अर्थव्यवस्था मंच सितंबर 2026 -क्या प्लास्टिक, ई-कचरे क़ा कबाड़ बनेगा नई अर्थव्यवस्था की ताकत? -फेंकने की संस्कृति पर ब्रेक,कचरे से कमाई क़े नए चक्र का वैश्विक बिगुल! -समग्र व्यापक विश्लेषण

by Page 3 News International Desk
September 17, 2026
in Hindi News, Hindi Editorials
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चक्रीय अर्थव्यवस्था: जनता और समृद्धि के लिए चक्रीय अर्थव्यवस्था की ओर परिवर्तन कचरे को संसाधन, अपशिष्ट को अवसर और विकास को स्थायित्व में बदलने का वैश्विक अभियान

ई-कचरा,प्लास्टिक,पुराने कपड़े से लेकर बैटरी और निर्माण सामग्री तक,हर बेकार चीज में छिपी है,अरबों की अर्थव्यवस्था! -डब्लूसीईऐफ़ 2026 में भारत का सर्कुलर इकोनॉमी मॉडल दुनियाँ के सामने -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

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भारत मे जनसांख्यिकी परिवर्तन एवं निरंतर घटती हिन्दू जनसंख्या

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर आज दुनियाँ के सामने आर्थिक विकास के साथ-साथ प्राकृतिक संसाधनों की कमी, बढ़ता कचरा, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और कच्चे माल की बढ़ती मांग जैसी अनेक चुनौतियां खड़ी हैं। ऐसे समय में वैश्विक अर्थव्यवस्था को केवल उत्पादन-उपभोग- फेंकनें की रैखिक व्यवस्था से निकालकर ऐसी व्यवस्था की ओर ले जाने की आवश्यकता महसूस की जा रही है जिसमें वस्तुओं और सामग्रियों का जीवन अधिकतम समय तक बढ़ाया जाए। इसी सोच का नाम चक्रीय अर्थव्यवस्था यानी सर्कुलर इकोनॉमी है।इसका मूल मंत्र है,क्षतिग्रस्त वस्तु को बदलने से पहले उसकी मरम्मत करें,फेंकने से पहले उसका पुनःउपयोग करें औरअपशिष्ट को नष्ट करने से पहले उसमें से उपयोगी सामग्री वापस प्राप्त करें।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह बताना चाहूंगा क़ि भारत में यह विचार कोई पूरी तरह नया पश्चिमी आर्थिक सिद्धांत नहीं है;मरम्मत,पुनःउपयोग,पुनर्चक्रण,पुराने कपड़ों का दोबारा इस्तेमाल,कबाड़ से उपयोगी वस्तुएं बनाना और संसाधनों को व्यर्थ न जाने देना भारतीय सामाजिक व्यवहार में आदि अनादि काल से मुझे खुद अपने बुजुर्गों की पीढ़ी से लंबे समय से दिखाई देता रहा है।इसी वैश्विक सोच को नई तकनीक, वित्त और नीतिगत ढांचे से जोड़ने के लिए भारत पहली बार दक्षिण एशिया में वर्ल्ड सर्कुलर इकोनॉमी फोरम (डब्लूसीईऐफ़) 2026 की मेजबानी कर रहा है। गुजरात के गांधीनगर स्थित महात्मा मंदिर में 15 से18 सितंबर 2026 से डब्लूसीईऐफ़ 2026 का आयोजन शुरू है।यह दक्षिण एशिया में इस वैश्विक मंच का पहला आयोजन है।इस वर्ष का विषय है,सर्कुलर इकोनॉमी: ट्रांसिशन फॉर पीपल एंड प्रोस्पेंरिटी यानें जनता और समृद्धि के लिए चक्रीय अर्थव्यवस्था की ओर परिवर्तन।भारत सरकार के अनुसार 65 से अधिक देशों के 2,000 से अधिक हितधारक इसमें भाग ले रहे हैं और अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी में 125 से अधिक प्रदर्शक चक्रीय समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं। मंच का वास्तविक उद्देश्य केवल सम्मेलन करना नहीं,बल्कि सहयोग की नई अर्थव्यवस्था बनाना है।डब्लूसीईऐफ़ 2026 का प्रमुख लक्ष्य भारत की चक्रीय अर्थव्यवस्था संबंधी पहलों को वैश्विक मंच पर सामने लाना, ग्लोबल साउथ के देशों के बीच सहयोग बढ़ाना,चक्रीय वित्त को गति देना, निजी क्षेत्र के निवेश को आकर्षित करना, नीतिगत संवाद को मजबूत करना तथा डिजिटल तकनीक और नवाचार को बढ़ावा देना है। आयोजन में एआई,ऊर्जा,रोजगार,वित्त, शासन,टिकाऊ उत्पाद, औद्योगिक समाधान स्टार्टअप और युवा नेतृत्व जैसे क्षेत्रों पर भी चर्चा हो रही है।
साथियों बात अगर हम चक्रीय अर्थव्यवस्था आखिर है क्या? इसको समझने की करें तो सरल भाषा में कहा जाए तो चक्रीय अर्थव्यवस्था वह आर्थिक मॉडल है जिसमें किसी उत्पाद या सामग्री को इस्तेमाल के बाद कचरा मानकर समाप्त करने के बजाय उसकी उपयोगिता को यथासंभव लंबे समय तक बनाए रखा जाता है। इसमें रिडयूज़,रीयूज़ ,रिपेयर,रिफंरबिश,रेमैन्युफैक्चर,रेपरपोज़ और रिसाइकिल जैसे सिद्धांत महत्वपूर्ण हैं।यानेंमोबाइल फोन खराब हो जाए तो नया खरीदना ही एकमात्र रास्ता नहीं;मरम्मत और पुर्जों का पुनः उपयोग भी विकल्प है। वाहन के पुराने पुर्जों को फिर से इस्तेमाल किया जा सकता है।निर्माण क्षेत्र में पुराने भवनों की सामग्री को पुनःउपयोग किया जा सकता है।कपड़ा उद्योग में पुराने वस्त्रों से नए उत्पाद बनाए जा सकते हैं। इलेक्ट्रॉनिक कचरे से मूल्यवान धातुएं वापस निकाली जा सकती हैं। खाद्य क्षेत्र में जैविक अपशिष्ट से कम्पोस्ट या बायोगैस बनाई जा सकती है।कृषि में फसल अवशेषों को जलाने के बजाय जैव-ऊर्जा, कम्पोस्ट या अन्य उपयोगी उत्पादों में बदला जा सकता है।इस तरह चक्रीय अर्थव्यवस्था केवल कचरा प्रबंधन नहीं बल्कि पूरी उत्पादन और उपभोग व्यवस्था को पुनः डिजाइन करने की शिक्षा क़ी सटीकता से अवधारणा है।
साथियों बात अगर हम भारत के लिए इसका आर्थिक महत्व क्या है? इसको समझने की करें तो चक्रीय अर्थव्यवस्था सीधे तौर पर आयातित कच्चे माल पर निर्भरता कम करने,संसाधनों की उत्पादकता बढ़ाने और उद्योगों के लिए नए व्यापार मॉडल विकसित करने में मदद कर सकती है।यदि किसी देश को हर बार नए लौह अयस्क, तांबा,एल्युमिनियम,प्लास्टिक,इलेक्ट्रॉनिक धातु या अन्य कच्चे माल की आवश्यकता कम करनी पड़े और पुराने उत्पादों से ही कुछ सामग्री वापस अर्थव्यवस्था में आ जाए,तो संसाधनों पर दबाव घटता है।साथ ही रीसाइक्लिंग रिपेयर,रिफर्बिशिंग,री-मैन्युफैक्चरिंग, अपशिष्ट संग्रहण और नई तकनीकों में नए व्यवसाय और रोजगार पैदा हो सकते हैं।एक्सपर्ट के अनुसार डब्लूसीईऐफ़ का उद्देश्य ही ऐसी चक्रीय अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाना है जो नए व्यवसाय और रोजगार के अवसर पैदा करे तथा संसाधन-संकट और पर्यावरणीय दबाव से निपटने में मदद करे।
साथियों,चक्रीय अर्थव्यवस्था में वित्त सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है।किसी विचार को प्रयोगशाला से बाजार तक पहुंचाने के लिए पूंजी चाहिए। इसलिए डब्लूसीईऐफ़ 2026 में सर्कुलर फाइनेंस और प्राइवेट-बसेक्टर इन्वेस्टमेंट को विशेष महत्व दिया जा रहा है।इसका अर्थ है कि बैंक, निवेशक,सरकारें,विकास वित्त संस्थान और निजी कंपनियां ऐसे व्यवसायों में पूंजी लगाएं जिनका मॉडल संसाधनों की बचत,पुनर्चक्रण,पुनः उपयोग और टिकाऊ उत्पादन पर आधारित हो। यदि किसी स्टार्टअप के पास प्लास्टिक को उच्च गुणवत्ता वाले पुनर्चक्रित कच्चे माल में बदलने की तकनीक है, लेकिन उसके पास उत्पादन बढ़ाने के लिए पूंजी नहीं है,तो चक्रीय वित्त उसके समाधान को व्यावसायिक स्तर तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।ज्ञान और तकनीक की सीमाएं भी राष्ट्रीय सीमाओं से आगे जानी होंगी। चक्रीयता स्वभाव से सहयोगात्मक है।किसी देश के पास उन्नत रीसाइक्लिंग तकनीक हो सकती है,दूसरे के पास कच्चा माल, तीसरे के पास निवेश और चौथे के पास नीति बनाने का अनुभव। इसलिए वैश्विक चक्रीय अर्थव्यवस्था के लिए ज्ञान,तकनीक,वित्त और उत्तरदायित्व का देशों तथा क्षेत्रों के बीच प्रवाह जरूरी है। यही कारण है कि डब्लूसीईऐफ़ जैसे मंच केवल
पर्यावरण विशेषज्ञों की बैठक नहीं हैं; इनमें सरकार, उद्योग, स्टार्टअप,निवेशक, शोधकर्ता, शिक्षाविद और अंतरराष्ट्रीय संगठन एक साथ आते हैं।डब्लूसीईऐफ़ को सितरा ने 2017 में शुरू किया था और अब यह वार्षिक वैश्विक मंच बन चुका है।
साथियों,ऊर्जा से लेकर रोजगार तक चक्रीय अर्थव्यवस्था का दायरा बहुत व्यापक है। इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियों का दूसरा उपयोग और अंततः उनमें मौजूद मूल्यवान धातुओं की रिकवरी, सौर पैनलों के जीवन के बाद उनकी सामग्री का पुनर्प्रयोग, निर्माण सामग्री का पुनर्चक्रण, टिकाऊ फैशन,प्लास्टिक का पुनर्चक्रण,औद्योगिक जल का पुनः उपयोग,कृषि अपशिष्ट से जैव-ऊर्जा और खाद्य अपशिष्ट से उपयोगी उत्पाद,ये सभी चक्रीय अर्थव्यवस्था के उदाहरण हैं। इस व्यवस्था में कचरा अंतिम मंजिल नहीं बल्कि अगले उत्पादन चक्र का संभावित कच्चा माल बन जाता है।भारत की भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां विशाल उपभोक्ता बाजार, तेजी से बढ़ता विनिर्माण क्षेत्र और विविध प्रकार के संसाधनों की मांग है। भारत में एक्सटेंडेड प्रोडूसर रिस्पांसिबिलिटी जैसे तंत्रों के माध्यम से उत्पादकों को उनके उत्पादों के जीवन -चक्र के बाद की जिम्मेदारी से जोड़ने का प्रयास किया जा रहा है।डब्लूसीईऐफ़ 2026 में उत्पादों को शुरू से ही अधिक टिकाऊ, लंबे समय तक उपयोग योग्य और कम अपशिष्ट पैदा करने वाला बनाने पर भी जोर दिया जा रहा है। इससे अर्थव्यवस्था में केवल ‘कितना उत्पादन हुआ’ नहीं बल्कि कितना मूल्य बचाया गया यह प्रश्न अधिक सटीकता से महत्वपूर्ण हो सकता है।
साथियों, 10-ईयर फ्रेमवर्क ऑफ़ प्रोग्रामस यानें 10 वायएफपी की बैठक भी महत्वपूर्ण कड़ी है। डब्लूसी ईऐफ़ के साथ 15 सितंबर को गांधीनगर में सस्टेनबल कन्सम्प्शन एंड प्रोडक्शन पैटरनस से संबंधित 10 वायएफपी बोर्ड की बैठक आयोजित हुई।भारत ने हाल में इस बोर्ड के को-चेयर की जिम्मेदारी संभाली है।यह इसलिएमहत्वपूर्ण है क्योंकि चक्रीय अर्थव्यवस्था तभी सफल होगी जब उत्पादन के साथ-साथ उपभोग की आदतों में भी बदलाव आए,कम संसाधन खर्च हों, उत्पादों का जीवन बढ़े और उपभोक्ता टिकाऊ विकल्पों को महत्व दें।15-16 सितंबर के मुख्य कार्यक्रम के बाद 17-18 सितंबर को 80 एक्सेलरेटर सेशनस वैश्विक सहयोगियों द्वारा ऑनलाइन हाइब्रिड और प्रत्यक्ष प्रारूप में आयोजित किए जा रहे हैं। इसका उद्देश्य गांधीनगर की चर्चा को दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों और वास्तविक परियोजनाओं तक पहुंचाना है।उदाहरण के तौर पर यूएनडीपी के कार्यक्रमों में फैशन और निर्माण क्षेत्र की सर्कुलर सप्लाई चैनस,ग्लोबल साउथ में सर्कुलरबिज़नेस इकोसिस्टमस,बांग्लादेश की सर्कुलर ब्लू इकोनॉमी तथा एविडेंस-बेस्ड ट्रांसफार्मेशन जैसे विषय शामिल हैं।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विषय कारण करें तो हम पाएंगे क़ि डब्लूसीईऐफ़ 15-18 सितंबर 2026 का सबसे बड़ा संदेश यह है कि भविष्य की अर्थव्यवस्था केवल अधिक उत्पादन और अधिकउपभोग पर आधारित नहीं हो सकती। संसाधनों का अधिकतम मूल्य बनाए रखना, उत्पादों का जीवन बढ़ाना, कचरे को संसाधन में बदलना, नई तकनीक को वित्त से जोड़ना और देशों के बीच ज्ञान साझा करना अब आर्थिक रणनीति का हिस्सा बनता जा रहा है। गांधीनगर में आयोजित यह मंच भारत के लिए केवल पर्यावरणीय कूटनीति का अवसर नहीं, बल्कि संसाधन दक्षता,निवेश,रोजगार,नवाचार औद्योगिक प्रतिस्पर्धा और टिकाऊ विकास को एक ही आर्थिक ढांचे में जोड़ने का अंतरराष्ट्रीय मंच है।यदि मरम्मत,पुनः उपयोग, पुनर्निर्माण और पुनर्चक्रण को उद्योग, बाजार और उपभोक्ता व्यवहार का सामान्य हिस्सा बनाया जाता है, तो कचरा बोझ न रहकर अर्थव्यवस्था के अगले चक्र का संसाधन बन सकता है। यही चक्रीय अर्थव्यवस्था का मूल दर्शन है,फेंकने की संस्कृति से बचत की संस्कृति, अपशिष्ट से संसाधन और रैखिक विकास से चक्रीय समृद्धि की ओर परिवर्तन।

क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

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