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ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 12-13 सितंबर 2026 – भारत की मेजबानी में ग्लोबल साउथ की शक्ति का ऐतिहासिक प्रदर्शन -समिट तय करेगा ग्लोबल इकॉनमी का नया सिकंदर कौन है? -समग्र व्यापक विश्लेषण

by Page 3 News International Desk
September 9, 2026
in Hindi News, Hindi Editorials
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भारत की नई वैश्विक छलांग : पूंजी, तकनीक, अंतरिक्ष, विदेशी मुद्रा और विज़न 2047 के बीच ब्रिक्स की निर्णायक भूमिका

ज़ी-7 बनाम ब्रिक्स 2026: नई दिल्ली से तय होगी 21वीं सदी की वैश्विक आर्थिक सत्ता? -भारत बनेगा नए वर्ल्ड ऑर्डर का निर्णायक केंद्र? -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर दुनियाँ की आर्थिक और कूटनीतिक व्यवस्था एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है,जहाँ शक्ति का अर्थ केवल सैन्य क्षमता या किसी देश की जीडीपी नहीं रह गया है,बल्कि पूंजी, तकनीक, ऊर्जा,डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर,विदेशी मुद्रा, सप्लाई चेन,बाजार और वैश्विक संस्थाओं पर प्रभाव का संयुक्त परिणाम बन गया है। इसी बदलते वैश्विक समीकरण के बीच भारत 12-13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने जा रहा है। भारत की 2026 ब्रिक्स अध्यक्षता का विषय बिल्डिंग फॉर रेसिलिन्स इन्नोवेशन, कोआपरेशन एंड सस्टेनेंबिलिटी है और इसका केंद्रीय दृष्टिकोण ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताओं को अधिक प्रभावी वैश्विक मंच देना तथा सहयोग को व्यावहारिक परिणामों में बदलना है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि इस सम्मेलन को केवल एक सामान्य बहुपक्षीय बैठक के रूप में देखना बड़ी भूल होगी। वर्ष 2026 में ब्रिक्स अपनी स्थापना के 20 वर्ष पूरे कर रहा है और भारत चौथी बार इसकी अध्यक्षता कर रहा है।भारतीय अध्यक्षता के दौरान 25 से अधिक शहरों में350 से अधिक बैठकें और उच्चस्तरीय संवाद आयोजित किए जा चुके हैं।राजनीतिक- सुरक्षा,आर्थिक-वित्तीय और सांस्कृतिक-जनसंपर्क,इन तीनों आयामों में सहयोग को आगे बढ़ाने का प्रयास किया गया है।इसलिए 12-13 सितंबर का शिखर सम्मेलन पूरे वर्ष चले इस व्यापक कूटनीतिक अभियान का निर्णायक राजनीतिक मंच बनने जा रहा है।
साथियों, सबसे बड़ा प्रश्न स्वाभाविक रूप से ज़ी 7 बनाम ब्रिक्स का है।ज़ी 7 आज भी विकसित औद्योगिक लोकतंत्रों वैश्विक वित्त,उच्च तकनीक और संस्थागत प्रभाव की दृष्टि से अत्यंत शक्तिशाली समूह है।दूसरी ओर ब्रिक्स का विस्तार इसे केवल कुछ उभरती अर्थव्यवस्थाओं के समूह से कहीं अधिक व्यापक मंच बना चुका है।इसलिए भविष्य की दुनियाँ को कौन जीतेगा ज़ी 7 या ब्रिक्स ? जैसे सरल प्रश्न से समझना पर्याप्त नहीं होगा।वास्तविक प्रश्न यह है कि कौन वैश्विक आर्थिक नियमों, व्यापारिक नेटवर्क, तकनीकी मानकों और विकास की प्राथमिकताओं को अधिक प्रभावी ढंग से प्रभावित कर पाएगा? यही वह क्षेत्र है जहाँ नई दिल्ली सम्मेलन का महत्व सटीकता से असाधारण हो जाता है।
साथियों ब्रिक्स की सबसे बड़ी शक्ति उसका ग्लोबल साउथ डिमेंशन है। भारत लगातार यह रेखांकित करता रहा है कि विकासशील देशों की आवाज वैश्विक शासन संस्थाओं में उनकी वास्तविक आर्थिक और जनसंख्या शक्ति के अनुरूप दिखाई देनी चाहिए। भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता में आर्थिक सहयोग के साथ- साथ तकनीक, डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, नवाचार स्टार्टअप पर्यावरण साइबर सुरक्षा और सतत विकास जैसे क्षेत्रों को महत्व दिया गया है। अगस्त में ब्रिक्स कम्युनिकेशन्स मिनिस्टर्स मीटिंग में डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, एआई और भविष्य की नेटवर्क तकनीक, साइबर सुरक्षा, डिजिटल स्किलिंग, स्टार्टअप तथा नवाचार को सहयोग के प्रमुख क्षेत्रों में रखा गया था।यहीं भारत की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत ब्रिक्स को किसी पश्चिम- विरोधी सैन्य या राजनीतिक गठबंधन के रूप में स्थापित करने के बजाय बहुध्रुवीय और अधिक प्रतिनिधित्वपूर्ण वैश्विक व्यवस्था के मंच के रूप में प्रस्तुत करना चाहता है। यह दृष्टिकोण भारत की रणनीतिक स्वायत्तता से भी जुड़ा हुआ है। नई दिल्ली के लिए रूस के साथ ऊर्जा और रणनीतिक संबंध, चीन के साथ प्रतिस्पर्धा और सहयोग, पश्चिमी देशों के साथ व्यापार एवं तकनीकी साझेदारी और ग्लोबल साउथ के साथ विकासात्मक जुड़ाव, इन सभी को एक साथ संतुलित करना आवश्यक है। यही भारत की सटीकता से कूटनीतिक चुनौती भी है और अवसर भी।
साथियों सम्मेलन में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की संभावित उपस्थिति विशेष रूप से महत्वपूर्ण होगी उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार चीनी पक्ष ने उनकी संभावित यात्रा के लिए सुरक्षा और प्रोटोकॉल संबंधी तैयारियाँ शुरू की हैं, लेकिन 8 सितंबर तक उनकी यात्रा को लेकर औपचारिक अंतिम कार्यक्रम सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं था। यदि शी जिनपिंग नई दिल्ली आते हैं, तो यह 2019 के बाद उनकी पहली भारत यात्रा होगी और ब्रिक्स मंच पर भारत-चीन संबंधों को नई दिशा देने का अवसर भी बन सकती है। मैं अंदाज लगा सकता हूं कि चीनी राष्ट्रपति बहुत बड़े डेलिगेशन के साथ भारत आने की सटीकता से उम्मीद है।
साथियों रूस के राष्ट्रपति की भारत यात्रा को लेकर स्थिति कहीं अधिक स्पष्ट है।भारतीय पीएम ने ने 31अगस्त को पुतिन से मुलाकात के दौरान उन्हें 12-13 सितंबर के ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में भारत आने का स्वागत करने की बात कही थी।दोनों नेताओं ने ब्रिक्स के तहत सहयोग सहित राजनीतिक, आर्थिक,ऊर्जा,अंतरिक्ष और अन्य क्षेत्रों में द्विपक्षीय संबंधों पर चर्चा की। इससे स्पष्ट है कि नई दिल्ली सम्मेलन भारत-रूस संबंधों और व्यापक ग्लोबल साउथ डिप्लोमेसी के लिए भी महत्वपूर्ण मंच बनने जा रहा है।
साथियों, ब्रिक्स का दूसरा बड़ा आयाम वित्तीय और आर्थिक सहयोग है। आज वैश्विक अर्थव्यवस्था में डॉलर, पश्चिमी वित्तीय संस्थाओं और विकसित देशों के बाजारों का प्रभाव अभी भी अत्यंत मजबूत है। ब्रिक्स के सामने चुनौती यह है कि क्या वह सदस्य देशों के बीच व्यापार, स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन, भुगतान प्रणालियों, विकास वित्त और निवेश सहयोग को इस स्तर तक बढ़ा सकता है कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था में उसका वास्तविक प्रभाव दिखाई देने लगे। यह कार्य आसान नहीं है,क्योंकि ब्रिक्स के भीतर आर्थिक संरचनाएँ, राजनीतिक प्राथमिकताएँ और राष्ट्रीय हित एक-दूसरे से काफी अलग हैं। लेकिन यही विविधता यदि व्यावहारिक सहयोग में बदली गई तो यह समूह की सबसे बड़ी ताकत भी बन सकती है।भारत के लिए इसका महत्व विज़न 2047 से भी जुड़ता है। भारत यदि 2047 तक विकसित और आर्थिक रूप से अधिक शक्तिशाली राष्ट्र बनना चाहता है, तो उसे केवल घरेलू आर्थिक वृद्धि पर्याप्त नहीं होगी। उसे वैश्विक पूंजी आकर्षित करनी होगी, उच्च तकनीक में नेतृत्व विकसित करना होगा, अंतरिक्ष और डिजिटल अर्थव्यवस्था में अपनी क्षमता बढ़ानी होगी, विदेशी मुद्रा की मजबूती बनाए रखनी होगी और वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी हिस्सेदारी बढ़ानी होगी।ब्रिक्स भारत को इन लक्ष्यों के लिए एक अतिरिक्त कूटनीतिक और आर्थिक नेटवर्क उपलब्ध कराता है।
साथियों, दिल्ली में सम्मेलन की तैयारियाँ भी इसी महत्व को दर्शाती हैं।एंनडीएमसी ने प्रमुख सड़कों,बाजारों, होटल क्षेत्रों और वीआईपी मार्गों के सौंदर्यीकरण पर विशेष ध्यान दिया है। राजधानी के कई हिस्सों में लैंडस्केपिंग, फूलों की सजावट, मुरल्स और अन्य सौंदर्यीकरण कार्य किए गए हैं।यह केवल सजावट नहीं, बल्कि भारत की सॉफ्ट पावर और आयोजन क्षमता का प्रदर्शन भी है। 2023 के ज़ी 20 के बाद दिल्ली एक बार फिर दुनियाँ के सामने स्वयं को बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों की मेजबानी करने में सक्षम राजधानी के रूप में प्रस्तुत कर रही है।आम नागरिकों की सुविधा और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए 11 सितंबर को दिल्ली के सभी स्कूल बंद रखने का निर्णय लिया गया है। केंद्र सरकार के दिल्ली स्थित कार्यालयों के लिए भी 11 सितंबर को अवकाश घोषित किया गया है,जबकि 12 और 13 सितंबर सप्ताहांत हैं। इन फैसलों के पीछे सम्मेलन से जुड़ी सुरक्षा, यातायात और लॉजिस्टिक व्यवस्था को सुचारु रखना प्रमुख कारण है।
साथियों, दिल्ली पुलिस ने भी 11 से 13 सितंबर के लिए विशेष ट्रैफिक एडवाइजरी जारी की है।आधिकारिक दिल्ली ट्रैफिक पुलिस वेबसाइट पर इस अवधि के लिए अलग ब्रिक्स ट्रैफिक एडवाइजरी उपलब्ध है। सुरक्षा और वीआईपी मूवमेंट के कारण प्रमुख मार्गों पर डाइवर्शन और ट्रैफिक कंट्रोल की व्यवस्था की जा रही है। पुलिस ने लोगों से अधिकृत स्थानों पर ही पार्किंग करने और किसी संदिग्ध वस्तु की जानकारी तुरंत पुलिस को देने की अपील की है। इस स्तर की तैयारी बताती है कि सम्मेलन केवल भारत मंडपम तक सीमित आयोजन नहीं, बल्कि पूरी राष्ट्रीय राजधानी के लिए एक बड़ा लॉजिस्ट्रीकल एक्सरसाइज है।
साथियों, इस पूरे घटनाक्रम में एक और महत्वपूर्ण संदेश छिपा है,भारत अब केवल वैश्विक व्यवस्था का सहभागी नहीं, बल्कि उसके पुनर्संतुलन में सक्रिय भूमिका निभाने की कोशिश कर रहा है। ब्रिक्स के माध्यम से भारत ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूती देना चाहता है, लेकिन साथ ही पश्चिमी अर्थव्यवस्थाओं से अपने संबंध भी बनाए रखना चाहता है। यही संतुलन भारत की विदेश नीति की विशिष्ट पहचान बन सकता है। भारत के लिए भविष्य का रास्ता ज़ी 7 को हराने की बजाय ज़ी 7 और ब्रिक्स दोनों के साथ अपने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप प्रभावी संबंध बनाने में अधिक है।12-13 सितंबर का नई दिल्ली ब्रिक्स सम्मिट किसी एक संगठन की जीत या हार का फैसला नहीं करेगा।यह उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाएगा,21वीं सदी की वैश्विक अर्थव्यवस्था का नेतृत्व किस प्रकार की व्यवस्था करेगी:कुछ विकसित शक्तियों का केंद्रीकृत प्रभाव या अनेक आर्थिक केंद्रों वाली बहुध्रुवीय दुनिया? ब्रिक्स यदि अपने विशाल बाजार, संसाधनों तकनीकी क्षमता और विकासात्मक आवश्यकताओं को ठोस संस्थागत सहयोग में बदल पाता है, तो उसका वैश्विक प्रभाव और बढ़ सकता है। लेकिन यदि आंतरिक मतभेद, राजनीतिक अविश्वास और अलग-अलग राष्ट्रीय हित हावी रहे, तो उसकी क्षमता सीमित रह सकती है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर उसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि भारत के लिए इसलिए नई दिल्ली सम्मेलन का असली लक्ष्य ज़ी 7 बनाम ब्रिक्स की प्रतियोगिता में किसी एक को विजेता घोषित करना नहीं,बल्कि भारत को उस नई बहुध्रुवीय आर्थिक व्यवस्था के निर्णायक केंद्रों में स्थापित करना है। पूंजी से लेकर तकनीक तक, अंतरिक्ष से लेकर डिजिटल अर्थव्यवस्था तक और विदेशी मुद्रा से लेकर ग्लोबल साउथ डिप्लोमेसी तक,यदि भारत इन सभी मोर्चों पर अपनी क्षमता को एकीकृत कर पाया, तो ब्रिक्स की 2026अध्यक्षता केवल एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन की मेजबानी नहीं रहेगी; यह विज़न 2047 की वैश्विक आर्थिक नींव मजबूत करने की दिशा में भारत की एक महत्वपूर्ण रणनीतिक छलांग साबित हो सकती है।

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