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नई दिल्ली, 8 दिसंबर।
सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक मामलों में चार्जशीट दाखिल करने और आरोप तय करने की उस प्रवृत्ति पर नाराजगी जताई है, जिसमें पहली नजर में कोई मामला नहीं बनता। कोर्ट ने कहा कि इससे न्यायिक व्यवस्था पर बोझ बढ़ रहा है। कोर्ट ने पुलिस और निचली अदालतों से कहा है कि वे फिल्टर की तरह काम करें और यह सुनिश्चित करें कि केवल उन्हीं मामलों को मुकदमे के स्तर तक ले जाया जाए जिनमें मजबूत स्थिति हो। जस्टिस एनके सिंह और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने कहा कि सरकार को बिना किसी ठोस उम्मीद के नागरिकों पर मुकदमा नहीं चलाना चाहिए। कोर्ट ने कोलकाता में संपत्ति को लेकर हुए एक सिविल विवाद से जुड़े आपराधिक मामले को रद्द कर दिया। बेंच ने कहा कि पुलिस और निचली अदालत को इस बात का ध्यान रखना चाहिए था कि संपत्ति को लेकर एक सिविल विवाद चल रहा था और शिकायतकर्ता ने कोई न्यायिक बयान देने से भी इनकार कर दिया था। बेंच ने कहा कि इस मामले में मुकदमा चलाने की अनुमति देने के लिए कानूनी रूप से मान्य सामग्री/सबूतों पर आधारित मजबूत शक मौजूद नहीं था। शीर्ष कोर्ट ने कहा कि यह अदालत इस बात पर जोर देना चाहेगी कि जब पार्टियों के बीच कोई सिविल विवाद चल रहा हो, तो पुलिस और आपराधिक अदालतों को चार्जशीट दाखिल करने और आरोप तय करने में सतर्क रहना चाहिए। अदालत ने कहा कि कानून के शासन वाले समाज में, चार्जशीट दाखिल करने का निर्णय जांच अधिकारी की ओर से इस निर्धारण पर आधारित होना चाहिए कि क्या एकत्र किए गए सबूत सजा की उचित संभावना प्रदान करते हैं। चार्जशीट दाखिल करने के चरण में पुलिस और आरोप तय करने के फेज में आपराधिक अदालत को प्रारंभिक फिल्टर के रूप में कार्य करना चाहिए। यह सुनिश्चित करते हुए कि केवल मजबूत शक वाले मामलों को ही न्यायिक प्रणाली की दक्षता और अखंडता बनाए रखने के लिए औपचारिक मुकदमे के स्तर तक ले जाया जाए। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि पुलिस और अदालतों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि केवल उन्हीं मामलों में आगे की कार्रवाई हो जिनमें वाकई कोई अपराध हुआ हो और जिसके सबूत मजबूत हों। अगर कोई मामला सिर्फ सिविल विवाद का है या उसमें सबूत कमजोर हैं, तो उसे बेवजह आगे बढ़ाने से न्याय व्यवस्था पर बोझ पड़ता है। इससे उन मामलों को भी देर होती है जिनमें वाकई गंभीर अपराध हुए हों। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि आरोप तय करने के समय यह तय नहीं किया जा सकता कि अंत में सजा होगी या नहीं, लेकिन यह जरूर देखा जाना चाहिए कि क्या मुकदमा चलाने लायक कोई मजबूत शक है। अगर ऐसा नहीं है, तो केस को वहीं रोक देना चाहिए।
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महेंद्र त्रिपाठीअयोध्याकमिश्नर के निरीक्षण में अनियमितता उजागर, पेशकार निलंबित,कमिश्नर राजेश कुमार के रुदौली तहसील निरीक्षण के दौरान तहसील न्यायिक में...
