84 लाख जीवों में मानव की निराली कहानी है,
धन की चाह में उलझी उसकी सारी ज़िंदगानी है।
प्रकृति ने सबको दिया है जीवन का अपना विधान,
मनुष्य की तृष्णा ने छीन लिया उसका सुकून और सम्मान
पशु-पक्षी श्रम करके अपनी भूख मिटा लेते हैं,
जितना मिलता है प्रकृति से,उसी में मुस्कुराते हैं।
न कल की चिंता,न धन का कोई अभिमान,
फिर भी उनके जीवन में है संतोष का सुंदर जहान।
मनुष्य ने धन कमाया,महल बनाए,संसार सजाया,
सुख की तलाश में दौड़कर अपना चैन गंवाया।
रोटी से शुरू हुई चाह,महलों तक जा पहुँची,
मुट्ठी भर पाने की इच्छा, समंदर तक जा पहुँची।
जिसके पास नहीं,वह पाने की आस लगाता है,
जिसके पास बहुत है,वह और अधिक चाहता है।
धन की गठरी बढ़ती जाती,मन की प्यास नहीं बुझती,
इच्छाओं की आग में जीवन की हर खुशी सुलगती।
जीवन का सार धन नहीं,संतोष की पहचान है,
सीमित आवश्यकताओं में सुख का वास्तविक स्थान है।
किशन जो मिला उसे पर्याप्त समझो,यही बुद्धिमानी है,
पेट रोटी से भरता है,लालच से नहीं यही सच्ची कहानी है
