बचपन में पिता के कंधों पर बैठकर,दुनियाँ को निहारा था,
उनकी उँगली थामकर मैंने हर मुश्किल को संवारा था।
तब मंदिरों में भगवान को देखने की चाहत रहती थी,
आज समझ आया,पिता की गोद में ही मेरी जन्नत रहती थी।
जिन कंधों ने मेरी खातिर हर बोझ हँसकर उठाया था,
जिन हाथों ने गिरते-गिरते भी मुझको संभाला था।
मैंने उम्र बढ़ाई तो एक राज़ समझ में आया,
जिसके कंधे पर बैठा था,वही भगवान नज़र आया।
खुद धूप में जलकर जिसने मेरे लिए छाँव बनाई,
अपनी इच्छाएँ छोड़कर मेरी हर इच्छा सजाई।
मेरी खुशी में मुस्कुराया,मेरे ग़म में रोता रहा,
पिता था वो देवदूत, जो मेरे लिए हर पल जीता रहा।
मंदिर में पत्थर की मूरत को फूल चढ़ाने से पहले,
घर में बैठे पिता के चरणों का मान रखना सीख ले।
उनकी आँखों में छिपे सपनों को पढ़कर पूरा कर दो,
जीते-जी पिता की हर ख्वाहिश को अपना फ़र्ज़ कर दो।
पिता का सम्मान करो,यही जीवन की सच्ची कमाई है,
उनकी सेवा में ही हर दुआ,हर खुशी समाई है।
किशन मंदिर में बैठे भगवान से भी बड़ा है पिता का एहसान,
पिता ही वो भगवान हैं,जो देते हैं जीवन और पहचान।


