सतगुरु के वचन हृदय में उतरकर,जीवन को सँवारते हैं,
भटकी हुई राहों में प्रेम के दीपक,बनकर निखारते हैं।
न क्रोध की अग्नि रहने देते,न मन में कोई विषाद,
शांति और प्रेम रूपी प्रसाद से,भर देते हैं हर साँस।
सतगुरु की मीठी वाणी,मन का अँधियारा हरती है,
टूटे हुए विश्वासों में,आशा की किरणें भरती है।
अहंकार की दीवारें ढहतीं,मिट जाता मन का अभिमान,
वचनों की पावन वर्षा से,खिल उठता अंतर्मन-उपवन।
जहाँ सतगुरु का नाम गूँजे,वहाँ द्वेष ठहर नहीं पाता,
प्रेम की निर्मल गंगा बहती,हर मन को निर्मल कर जाती।
क्षमा,दया और करुणा बनते,जीवन के सुंदर आभूषण,
सतगुरु-वचन दिखाते हमको,सच्चे जीवन का अनुशासन
न धन माँगें,न वैभव माँगें,न दुनियाँ का कोई सम्मान,
बस चरणों में प्रेम मिले और निर्मल हो जाए मन-प्राण।
उनकी कृपा से भीतर जागे,सत्य-धर्म का पावन प्रकाश
शांति मिले हर धड़कन को और प्रेम बने जीवन की साँस।
सतगुरु वचन प्रसाद हैं ऐसे,जो जन्म-जन्म की प्यास बुझाते हैं,
मन के सूने आँगन में,प्रेम के फूल खिलाते हैं।
किशन जो श्रद्धा से अपनाए,उसका जीवन बन जाए आबाद,
सतगुरु शांति और प्रेम बाँटते हैं,यही है उनका अमृत- प्रसाद


