विदेशी निवेश,ब्रिक्स और विज़न 2047 से नए भारत की महागाथा -जब दुनियाँ की बड़ी शक्तियां भारत की ओर देख रही हैं? -2047 के लिए सरकार का आर्थिक- कूटनीतिक रोडमैप
दुनियाँ की बदलती आर्थिक व्यवस्था में भारत की महागति: विदेश दौरों से ब्रिक्स तक, क्या 2047 तक भारत बनेगा विश्व की आर्थिक महाशक्ति? -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर आज दुनियाँ केवल युद्धों सीमाओं और हथियारों से नहीं बदल रही,बल्कि वैश्विक वित्त,निवेश तकनीक,ऊर्जा,व्यापार और कूटनीति के नए समीकरणों से एक नई विश्व व्यवस्था आकार ले रही है। अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा,यूरोप की आर्थिक चुनौतियां, ऊर्जा बाजार में अस्थिरता,सप्लाई चेन का पुनर्गठन, डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार और वैश्विक दक्षिण की बढ़ती भूमिका ने दुनियाँ के सामने एक ऐसा दौर खड़ा किया है जिसमें आर्थिक शक्ति ही रणनीतिक शक्ति का सबसे बड़ा आधार बनती जा रही है। ऐसे समय में भारत के वित्त, वाणिज्य और पीएम स्तर पर हो रही अंतरराष्ट्रीय सक्रियता को केवल सामान्य विदेश यात्राओं के रूप में देखना उचित नहीं होगा।इन यात्राओं के पीछे निवेश आकर्षित करने, बाजारों का विस्तार करने, तकनीकी साझेदारी बढ़ाने,ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने और 2047 तक विकसित भारत के लिए अंतरराष्ट्रीय आर्थिक आधार तैयार करने की व्यापक रणनीति दिखाई देती है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह बताना चाहूंगा क़ि भारत के पीएम का 29 सितंबर 2026 से चार दिवसीय दौरा,केंद्रीय वित्तमंत्री सहित वाणिज्य मंत्री का जापान व विदेश मंत्री की मौजूदा विदेश यात्रा इसका महत्वपूर्ण उदाहरण हैँ। वित्त मंत्री का पूरा कनाडा- अमेरिका आधिकारिक दौरा 25 अगस्त से 2 सितंबर 2026 तक है,जबकि अमेरिका का चरण 28 अगस्त से 2 सितंबर तक है।वित्त मंत्रालय के अनुसार यात्रा का उद्देश्य भारत-कनाडा तथा भारत-अमेरिका आर्थिक और वित्तीय संबंधों कोमजबूत करना, निवेश संपर्क बढ़ाना और वैश्विक आर्थिक प्राथमिकताओं पर सहयोग को आगे बढ़ाना है।अमेरिका में शिकागो, एशविले और न्यूयॉर्क उनके प्रमुख पड़ाव हैं।इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू केवल जी 20 वित्त मंत्रियों की बैठक में भागीदारी नहीं है,बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी पूंजी और तकनीकी कंपनियों के सामने भारत की आर्थिक संभावनाओं को प्रस्तुत करना है।शिकागो में निवेशकों और उद्योग जगत के प्रतिनिधियों के साथ बैठकें इस बात का संकेत हैं कि भारत अब केवल विदेशी पूंजी प्राप्त करने वाला बाजार नहीं,बल्कि वैश्विक कंपनियों के लिए उत्पादन, नवाचार और विश्व बाजारों को निर्यात करने का रणनीतिक केंद्र बनना चाहता है। एआई, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स डेटा सेंटर, स्वच्छ ऊर्जा, ड्रोन, फिनटेक और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में आने वाला निवेश भारत की आर्थिक संरचना को पारंपरिक सेवा अर्थव्यवस्था से आगे ले जाकर हाई-टेकमैन्युफैक्चरिंग पावर में सटीकता से बदल सकता है।
साथियों,न्यूयॉर्क में वित्तीय क्षेत्र के प्रमुख लोगों से संवाद और एनएएसडीएक्यू के बेल- रिंगिंग कार्यक्रम में भागीदारी भी इसी आर्थिक कूटनीति का हिस्सा है।इसका प्रतीकात्मक महत्व यह है कि भारत वैश्विक पूंजी बाजारों के सामने स्वयं को एक विश्वसनीय, दीर्घकालिक और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। यदि भारत विदेशी निवेश को केवल पूंजी के रूप में नहीं,बल्कितकनीक प्रबंधन, रोजगार, अनुसंधान और वैश्विक सप्लाई चेन के प्रवेशद्वार के रूप में इस्तेमाल करता है, तो इसका प्रभाव अगले दो दशकों में अत्यंत व्यापक हो सकता है।एशविले में होने वाली जी 20 वित्त मंत्रियों और केंद्रीय बैंक गवर्नरों की बैठक भारत के लिए दूसरा महत्वपूर्ण मंच है।यहां वैश्विक आर्थिक स्थिरता, डिजिटल अर्थव्यवस्था, कर व्यवस्था, वित्तीय प्रणाली, निवेश और सप्लाई चेन जैसे मुद्दों पर चर्चा भारत को वैश्विक आर्थिक नियमों को प्रभावित करने का अवसर देती है। आज भारत का लक्ष्य केवल विश्व अर्थव्यवस्था में बड़ा हिस्सा प्राप्त करना नहीं, बल्कि उन नियमों और संस्थागत व्यवस्थाओं के निर्माण में भी भूमिका निभाना है जिनसे भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था संचालित होगी। यही आर्थिक कूटनीति आगे चलकर विकसित भारत 2047 के लिए रणनीतिक पूंजी बन सकती है।
साथियों इसी आर्थिक रणनीति का दूसरा महत्वपूर्ण स्तंभ है जापान। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने 24 से 27 अगस्त 2026 तक जापान का दौरा किया और 200 से अधिक कारोबारी प्रतिनिधियों वाले भारत के सबसे बड़े जापानी बिजनेस डेलीगेशन का नेतृत्व किया। प्रतिनिधिमंडल में मैन्युफैक्चरिंग सेमीकंडक्टर, क्लीन एनर्जी, ऑटोमोबाइल, स्टील, वित्तीय सेवाओं, स्वास्थ्य और स्टार्टअप जैसे क्षेत्र शामिल थे।जापान के साथ भारत का संबंध अब केवल बुलेट ट्रेन,इंफ्रास्ट्रक्चर या पारंपरिक निवेश तक सीमित नहीं रह गया है। सेमीकंडक्टर और एआई जैसे क्षेत्रों में सहयोग भविष्य की औद्योगिक शक्ति का आधार बन सकता है। जापानी कंपनियों के लिए भारत एक विशाल उपभोक्ता बाजार होने के साथ-साथ वैश्विक उत्पादन केंद्र भी बन सकता है। टोक्यो में सेमीकंडक्टर और एआई पर हुई इंडस्ट्री राउंडटेबल तथा दोनों देशों द्वारा आर्थिक साझेदारी को आगे बढ़ाने के प्रयास इसी बदलते समीकरण को दर्शाते हैं।
साथियों,भारत की विदेश नीति का तीसरा महत्वपूर्ण मोर्चा मध्य एशिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 29-30 अगस्त को उज्बेकिस्तान और 31 अगस्त-1 सितंबर को किर्गिज गणराज्य की यात्रा पर हैं।ताशकंद में व्यापार, निवेश,रक्षा,डिजिटल कनेक्टिविटी, ऊर्जा और शिक्षा सहित विभिन्न क्षेत्रों में रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाने पर चर्चा होनी है। इसके बाद बिश्केक में 26वें एससीओ शिखर सम्मेलन में भारत सुरक्षा, कनेक्टिविटी और अवसर पर अपना दृष्टिकोण रखेगा।ताशकंद की यात्रा को केवल राजनीतिक मित्रता की यात्रा समझना भारत की रणनीति को छोटा करके देखना होगा। मध्य एशिया भारत के लिए ऊर्जा,खनिज, व्यापार मार्ग, बाजार और भू-राजनीतिक संपर्क की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यदि भारत मध्य एशिया के साथ बेहतर कनेक्टिविटी विकसित करता है और वैकल्पिक व्यापार मार्गों को मजबूत करता है,तो भारत को यूरोप और एशिया के बीच उभरते व्यापार नेटवर्क में अधिक प्रभावशाली भूमिका मिल सकती है। यही कारण है कि उज्बेकिस्तान और किर्गिस्तान जैसे देशों के साथ संबंध भारत की दीर्घकालिक आर्थिक सुरक्षा का हिस्सा बन रहे हैं।
साथियों इसी बीच वैश्विक ऊर्जा राजनीति भी तेजी से बदल रही है। अमेरिका और वेनेजुएला के बीच तेल क्षेत्र को लेकर 28 अगस्त को घोषित अमेरिकी पहल के अनुसार अमेरिका वेनेजुएला के विशाल तेल भंडार के एक बड़े हिस्से पर नियंत्रण स्थापित करने और उत्पादन बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। ट्रंप प्रशासन का दावा है कि इससे अमेरिकी ऊर्जा आपूर्ति बढ़ सकती है और कीमतों पर दबाव कम हो सकता है, हालांकि विश्लेषकों ने उत्पादन बढ़ने में लगने वाले समय और वेनेजुएला के बुनियादी ढांचे जैसी चुनौतियों की ओर भी संकेत किया है।इस घटनाक्रम का भारत के लिए सीधा सबक है,ऊर्जा सुरक्षा जितनी मजबूत होगी, आर्थिक स्वतंत्रता उतनी ही मजबूत होगी। भारत जैसे बड़े ऊर्जा आयातक देश के लिए कच्चे तेल की कीमत वैश्विक महंगाई, परिवहन लागत, व्यापार घाटे और रुपये की स्थिरता को प्रभावित करती है। इसलिए भारत का सौर ऊर्जा, ग्रीन हाइड्रोजन, इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, परमाणु ऊर्जा और वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों पर जोर केवल पर्यावरण नीति नहीं, बल्कि भविष्य की आर्थिक सुरक्षा नीति भी है।
साथियों अमेरिका और कनाडा के बीच हालिया तनाव तथा लेक ओंटंरिओ को अमेरिकी संघीय उपयोग में लेक अमेरिका नाम देने के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश ने भी यह दिखाया है कि आज व्यापार और कूटनीति कितनी तेजी से एक-दूसरे से जुड़ गए हैं। यह आदेश अमेरिकी संघीय नामकरण तक सीमित है और कनाडा को वही नाम स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं करता। कनाडा तथा कुछ स्वदेशी समूहों ने इसका विरोध किया है।भारत के लिए ऐसी परिस्थितियां एक अवसर भी पैदा करती हैं। जब वैश्विक कंपनियां भू-राजनीतिक जोखिमों के कारण अपनी सप्लाई चेन को विविध बनाना चाहती हैं, तब भारत के पास चीन-प्लस-वन रणनीति का बड़ा लाभ उठाने का अवसर है।यदि भारत तेज मंजूरी, विश्वस्तरीय लॉजिस्टिक्स, स्थिर नीतियां, कुशल श्रम, प्रतिस्पर्धी ऊर्जा लागत और मजबूत बुनियादी ढांचा उपलब्ध कराता है, तो आने वाले वर्षों में भारत वैश्विक कंपनियों के लिए केवल बाजार नहीं, बल्कि उत्पादन और निर्यात का केंद्र बन सकता है।
साथियों,अब इस पूरी रणनीति का सबसे बड़ा मंच सितंबर में नई दिल्ली में होने वाला ब्रिक्स शिखर सम्मेलन है। 12-13 सितंबर 2026 को भारत में होने वाला 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन वैश्विक दक्षिण की राजनीति और अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। चीन और रूस जैसे प्रमुख ब्रिक्स देशों के नेताओं की संभावित भागीदारी भारत को विश्व की बड़ी शक्तियों के साथ एक ही मंच पर संवाद का अवसर देगी।विशेष रूप से चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा इस सम्मेलन को असाधारण कूटनीतिक महत्व देती है।एक एजेंसी के अनुसार शी जिनपिंग के 12-13 सितंबर के ब्रिक्स सम्मेलन में आने की संभावना है और उनके साथ लगभग 400 अधिकारियों का बड़ा प्रतिनिधिमंडल हो सकता है। यदि यह यात्रा अंतिम रूप लेती है तो यह सात वर्ष बाद उनका भारत दौरा होगा। हालांकि उनकी यात्रा की अंतिम आधिकारिक पुष्टि और द्विपक्षीय बैठकों का विवरण उस समय तक निश्चित नहीं था।यदि सीमा पर शांति और व्यापारिक स्थिरता के बीच संतुलन बनाया जा सके तो इसका सकारात्मक प्रभाव एशियाई अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।भारत के लिए ब्रिक्स केवल राजनीतिक मंच नहीं, बल्कि बाजार, पूंजी, तकनीक और वैश्विक दक्षिण के बीच आर्थिक पुल बनाने का अवसर है।
साथियों, इन सभी घटनाओं को एक साथ जोड़कर देखें तो तस्वीर बेहद स्पष्ट दिखाई देती है। एक तरफ वित्त मंत्री दुनिया की सबसे बड़ी पूंजी के केंद्रों में भारत के निवेश अवसरों की आवाज उठा रही हैं, दूसरी तरफ वाणिज्य मंत्री जापान जैसे तकनीकी और औद्योगिक महाशक्ति के साथ सेमीकंडक्टर और एआई सहयोग को आगे बढ़ा रहे हैं। प्रधानमंत्री मध्य एशिया में व्यापार, ऊर्जा, सुरक्षा और कनेक्टिविटी के रास्ते मजबूत कर रहे हैं। इसके बाद भारत ब्रिक्स की मेजबानी कर दुनिया की उभरती शक्तियों को नई दिल्ली में एक मंच पर ला रहा है। यह अलग-अलग घटनाएं नहीं, बल्कि एक व्यापक आर्थिक-कूटनीतिक रणनीति के अलग-अलग हिस्से दिखाई देती हैं।
साथियों लेकिन भारत के किंग ऑफ द वर्ल्ड बनने की राह केवल विदेश यात्राओं से पूरी नहीं होगी। वास्तविक आर्थिक महाशक्ति बनने के लिए भारत को घरेलू स्तर पर भी कई मोर्चों पर निर्णायक सफलता हासिल करनी होगी। शिक्षा की गुणवत्ता, कौशल विकास, रोजगार, न्यायिक सुधार, लॉजिस्टिक्स, बिजली की लागत, शहरी आधारभूत ढांचा, विनिर्माण उत्पादकता, अनुसंधान एवं विकास, एमएसएमई की प्रतिस्पर्धात्मकता और नीति की स्थिरता पर निरंतर काम करना होगा। विदेशी निवेश तभी स्थायी आर्थिक शक्ति बनेगा जब वह भारत में उत्पादन, तकनीक और रोजगार पैदा करेगा।भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका विशाल बाजार, युवा मानव संसाधन, डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचा, लोकतांत्रिक संस्थाएं, उद्यमिता और दुनिया के विभिन्न शक्ति केंद्रों के साथ संवाद बनाए रखने की क्षमता है। अमेरिका के साथ तकनीक और पूंजी, जापान के साथ उद्योग और सेमीकंडक्टर, रूस के साथ ऊर्जा और रणनीतिक संबंध, मध्य एशिया के साथ कनेक्टिविटी तथा ब्रिक्स के माध्यम से ग्लोबल साउथ—यदि भारत इन सभी रिश्तों को अपने राष्ट्रीय हित के साथ संतुलित करता है, तो आने वाले वर्षों में उसकी आर्थिक स्थिति आज की तुलना में सटीकता बिल्कुल अलग हो सकती है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि 2047 का विकसित भारत केवल जीडीपी की बड़ी संख्या का नाम नहीं होगा। वास्तविक विकसित भारत वह होगा जो विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में निर्णायक भूमिका निभाए, जिसकी मुद्रा और वित्तीय व्यवस्था विश्वसनीय हो, जिसकी कंपनियां दुनिया में निवेश करें, जिसकी तकनीक वैश्विक बाजारों तक पहुंचे, जिसकी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो, जिसकी सप्लाई चेन विश्व के लिए महत्वपूर्ण हो और जिसकी कूटनीति आर्थिक शक्ति को रणनीतिक शक्ति में बदल सके।आज भारत जिस दिशा में आगे बढ़ रहा है, उसमें विदेश नीति और आर्थिक नीति के बीच की दूरी लगातार कम हो रही है। वित्त मंत्री की निवेश कूटनीति, वाणिज्य मंत्री की औद्योगिक कूटनीति, पीएम की रणनीतिक कूटनीति और ब्रिक्स जैसे मंचों पर भारत की सक्रिय भूमिका,ये सभी मिलकर उस भविष्य की नींव रख सकते हैं जिसमें भारत केवल विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक व्यवस्था को दिशा देने वाली शक्ति बने।
क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318
