सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणीयों, क़े बाद मामला लोकतांत्रिक विरोध,छात्रों के अधिकार, राज्य की सुरक्षा-शक्ति, एसओंपी के पालन,साक्ष्य संरक्षण और कमांड स्तर की जवाबदेही की व्यापक संवैधानिक बहस बन गया है
लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण विरोध, सभा और अभिव्यक्ति नागरिक भागीदारी के महत्वपूर्ण माध्यम हैं, तो राज्य पर सार्वजनिक सुरक्षा बनानें, हिंसा रोकने, नागरिकों की जान-माल की रक्षा करने और सार्वजनिक व्यवस्था कायम रखने का दायित्व भी -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर वैश्विक परिप्रेक्ष्य में लोकतंत्र की गुणवत्ता केवल चुनावों से नहीं,बल्कि इस बात से भी मापी जाती है कि राज्य असहमति,विरोध और सार्वजनिक आंदोलनों के साथ किस प्रकार व्यवहार करता है। अब छात्र आंदोलन पर बल प्रयोग का प्रश्न केवल पुलिस कार्रवाई या कानून- व्यवस्था तक सीमित विषय नहीं रह गया है।यह लोकतांत्रिक विरोध के अधिकार, राज्य की सुरक्षा- ज़िम्मेदारी,बल प्रयोग की वैधानिकता,कमांड की जवाबदेही और न्यायिक निगरानी इन पांचों के बीच संतुलन का गंभीर संवैधानिक प्रश्न बन गया है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि 20 जुलाई 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर क्षेत्र में हुए छात्र प्रदर्शन और उसके दौरान रैपिड एक्शन फोर्स द्वारा कथित रूप से पैलेट गन के इस्तेमाल से जुड़े मामले में 30 जुलाई 2026 को सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों और निर्देशों ने इस बहस को राष्ट्रीय ही नहीं,बल्कि अंतरराष्ट्रीय लोकतांत्रिक मानकों के स्तर पर भी महत्वपूर्ण बना दिया है। न्यायालय ने यह स्पष्ट संकेत दिया कि भीड़ नियंत्रण के नाम पर किसी भी विशेष प्रकार के बल का उपयोग सामान्य प्रशासनिक सुविधा का साधन नहीं हो सकता। बल प्रयोग की वैधानिकता केवल इस आधार पर निर्धारित नहीं होतीकि स्थिति तनावपूर्ण थी, बल्कि यह भी देखा जाता है कि वास्तविक खतरा कितना गंभीर था,क्या कम-हानिकारक विकल्प उपलब्ध थे,क्या कार्रवाई आवश्यक और अनुपातिक थी तथा क्या पूरी प्रक्रिया निर्धारित कानून और मानक संचालन प्रक्रिया के अनुरूप हुई।
साथियों, 30 जुलाई 2026 की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि पुलिस को केवल अत्यंत गंभीर और असाधारण परिस्थितियों में ही पैलेट गन के उपयोग का अधिकार हो सकता है।यह टिप्पणी ग्रेडेड रिस्पांस अर्थात परिस्थितियों की गंभीरता के अनुसार क्रमिक और नियंत्रित प्रतिक्रिया के सिद्धांत को रेखांकित करती है। इसका अर्थ यह है कि भीड़ नियंत्रण में हर परिस्थिति के लिए एक ही प्रकार की शक्ति का प्रयोग उचित नहीं माना जा सकता। लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण विरोध, सभा और अभिव्यक्ति नागरिक भागीदारी के महत्वपूर्ण माध्यम हैं। दूसरी ओर, राज्य पर सार्वजनिक सुरक्षा बनाए रखने, हिंसा रोकने,नागरिकों की जान-माल की रक्षा करने और सार्वजनिक व्यवस्था कायम रखने का दायित्व भी है।इन दोनों दायित्वों के बीच संतुलन स्थापित करना प्रशासन की सबसे कठिन जिम्मेदारियों में से एक है।यदि कोई प्रदर्शन शांतिपूर्ण है,तो उसे केवलअसहमति या राजनीतिक आलोचना के कारण बलपूर्वक समाप्त करना लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप नहीं माना जा सकता।लेकिन यदि किसी प्रदर्शन में गंभीर हिंसा आगजनी जानलेवा हमला या व्यापक सार्वजनिक खतरा उत्पन्न हो,तो राज्य निष्क्रिय भी नहीं रह सकता। इसलिए मूल प्रश्न बल प्रयोग होना चाहिए या नहीं का नहीं, बल्कि कब, क्यों, किस अधिकार के अंतर्गत, किस सीमा तक और किस जवाबदेही के साथ बल प्रयोग किया जा सकता है।
साथियों, सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार को जंतर-मंतर प्रदर्शन के दौरान तैनात रैपिड एक्शन फोर्स के हथियारों और गोला-बारूद से संबंधित लॉग बुक रिकॉर्ड सुरक्षित रखने का निर्देश इस पूरे प्रकरण का अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी पहलू है।यह आदेश किसी जवान, अधिकारी या संस्था को दोषी घोषित नहीं करता। न्यायालय ने किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहलेआवश्यक साक्ष्यों को सुरक्षित रखने की व्यवस्था पर बल दिया है। कानून के शासन में निष्पक्ष जांच का पहला आधार यही है कि तथ्य नष्ट न हों, रिकॉर्ड में परिवर्तन न हो और भविष्य की न्यायिक या स्वतंत्र जांच के लिए आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध रहें।अम्युनिशन लॉग से यह समझने में सहायता मिल सकती है कि संबंधित इकाई को कितना गोला-बारूद जारी किया गया,कितना उपयोग हुआ,किस प्रकार के उपकरण या कारतूस उपलब्ध थे, किस समय किस स्तर पर उनका उपयोग दर्ज किया गया और कार्रवाई की प्रशासनिक श्रृंखला क्या थी। यह रिकॉर्ड घटनाक्रम को केवल आरोपों या प्रत्यारोपों के आधार पर नहीं, बल्कि दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर समझने का अवसर देता है।
साथियों रिकॉर्ड संरक्षण का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि किसी भी विवादित बल-प्रयोग की घटना में अक्सर दो विपरीत कथाएं सामने आती हैं।एक पक्ष यह कह सकता है कि कार्रवाई अनावश्यक या अत्यधिक थी,जबकि दूसरा पक्ष यह तर्क दे सकता है कि सुरक्षा बलों को गंभीर खतरे का सामना करना पड़ा और उन्होंने कानून के अनुसार आवश्यक कार्रवाई की। ऐसी स्थिति में निष्पक्षता केवल किसी एक पक्ष की बात स्वीकार करने से नहीं, बल्कि उपलब्ध साक्ष्यों की जांच से स्थापित होती है।यदि डिजिटल रिकॉर्ड, वीडियो, वायरलेस संचार, ड्यूटी चार्ट, आदेश-पत्र, अम्युनिशन लॉग और अन्य दस्तावेज यह दर्शाते हैं कि बल प्रयोग वास्तविक खतरे के अनुपात में, वैध आदेश के अंतर्गत और निर्धारित एसओपी के अनुसार हुआ, तो वही रिकॉर्ड सुरक्षा बलों की पेशेवर विश्वसनीयता को मजबूत कर सकता है। इसके विपरीत, यदि रिकॉर्ड और वास्तविक घटनाक्रम में असंगति मिलती है, तो जवाबदेही तय करने का आधार तैयार हो सकता है। इसलिए अम्युनिशन लॉग सुरक्षित रखने का अर्थ केवल संभावित जांच नहीं, बल्कि दोनों पक्षों के तथ्यों को निष्पक्ष रूप से संरक्षित करना है। यह न्यायिक प्रक्रिया के साथ-साथ सुरक्षा बलों के लिए भी सटीकता से एक संस्थागत सुरक्षा-कवच हो सकता है।
साथियों, सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार को पैलेट गन के छर्रे लगने से घायल नागरिकों और प्रदर्शनकारियों के सर्वोत्तम तथा उचित उपचार को सुनिश्चित करने का निर्देश देकर राज्य की मानवीय जिम्मेदारी को भी केंद्र में रखा। किसी भी भीड़-नियंत्रण कार्रवाई के बाद प्रशासन का दायित्व केवल कानून-व्यवस्था बहाल होने तक समाप्त नहीं हो जाता। यदि किसी नागरिक को चोट लगी है,तो उसे समय पर चिकित्सा सहायता,विशेषज्ञ उपचार, आवश्यक जांच और पुनर्वास उपलब्ध कराना राज्य की जिम्मेदारी का महत्वपूर्ण हिस्सा है। विशेष रूप से आंख, चेहरे या शरीर के संवेदनशील हिस्सों में लगी चोटें दीर्घकालिक या स्थायी प्रभाव डाल सकती हैं। इसलिए चिकित्सा सहायता को केवल राहत या सहानुभूति के रूप में नहीं, बल्कि सार्वजनिक प्रशासन की जवाबदेही के रूप में देखा जाना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों में भी यह सिद्धांत स्वीकार किया जाता है कि कानून-प्रवर्तन की कार्रवाई के बाद घायल व्यक्तियों को यथाशीघ्र चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराई जानी चाहिए। इस दृष्टि से न्यायालय का निर्देश केवल उपचार संबंधी आदेश नहीं, बल्कि राज्य के कर्तव्य- आधारित मानवीय दायित्व का पुनर्स्मरण है।
साथियों, इस मामले में पूर्व केंद्रीय सूचना आयुक्त और सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी तथा अन्य पीड़ितों द्वारा दाखिल याचिका में नागरिक प्रदर्शनों के दौरान पैलेट गन के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग किए जाने से बहस का एक महत्वपूर्ण आयाम सामने आया याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता ने कथित रूप से धातुयुक्त पैलेट के उपयोग पर गंभीर प्रश्न उठाते हुए कहा कि ऐसे पैलेट शरीर के भीतर गंभीर और स्थायी नुकसान पहुंचा सकते हैं। इस तर्क के पीछे मुख्य चिंता यह है कि किसी भी भीड़-नियंत्रण उपकरण को केवल उसके नाम या घोषित उद्देश्य के आधार पर कम घातक मान लेना पर्याप्त नहीं है। किसी उपकरण के वास्तविक प्रभाव का आकलन उसके तकनीकी स्वरूप,उपयोग की दूरी,लक्ष्य, परिस्थितियों, प्रशिक्षण और इस्तेमाल की पद्धति के आधार पर किया जाना चाहिए। कोई उपकरण अपेक्षाकृत कम घातक हो सकता है, लेकिन उसका गलत, अत्यधिक या अनियंत्रित प्रयोग गंभीर चोटों का कारण बन सकता है। इसलिए उपकरण की प्रकृति के साथ-साथ उसके प्रयोग का तरीका भी कानूनी और नैतिक समीक्षा का विषय होना चाहिए।
साथियों, हालांकि, सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिकाकर्ताओं को पूर्ण प्रतिबंध की मांग के बजाय स्पष्ट और कठोर प्रोटोकॉल अथवा मानक संचालन प्रक्रिया तैयार करने के अनुरोध पर विचार करने की सलाह देना एक व्यावहारिक और संतुलित न्यायिक दृष्टिकोण के रूप में देखा जा सकता है। किसी उपकरण पर पूर्ण प्रतिबंध और उसके अनियंत्रित उपयोग के बीच एक तीसरा रास्ता भी हो सकता है कठोर नियमन,सीमित उपयोग, स्पष्ट अनुमति-प्रक्रिया, अनिवार्य रिकॉर्डिंग, स्वतंत्र समीक्षा और जवाबदेही। न्यायालय द्वारा पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो की एडवाइजरी का संदर्भ इस बात की ओर संकेत करता है कि भीड़-नियंत्रण के लिए स्पष्ट मानक, प्रशिक्षित कमांड संरचना और दस्तावेजी प्रक्रिया आवश्यक हैं। यदि किसी विशेष उपकरण का उपयोग केवल असाधारण परिस्थितियों में किया जाना है, तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि असाधारण परिस्थिति की परिभाषा क्या होगी, खतरे का आकलन कौन करेगा, अनुमति किस स्तर से मिलेगी, क्या पहले चेतावनी दी जाएगी, क्या कम-हानिकारक विकल्पों का उपयोग किया जाएगा और कार्रवाई के बाद समीक्षा किस प्रकार होगी।
साथियों, इसी संदर्भ में सीआरपीएफ महानिदेशक द्वारा जवानों को निर्भय होकर अपने कर्तव्यों का पालन करने और उनके वैध तथा सद्भावनापूर्ण आधिकारिक कार्यों की जिम्मेदारी लेने से संबंधित कथन ने एक नई प्रशासनिक और संवैधानिक बहस को जन्म दिया है। किसी भी सुरक्षा बल में जवानों को यह विश्वास होना चाहिए कि यदि वे वैध आदेशों, प्रशिक्षण, नियमों और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कठिन परिस्थितियों में कार्य करते हैं, तो उन्हें राजनीतिक दबाव, मीडिया ट्रायल या बिना तथ्यात्मक जांच के व्यक्तिगत रूप से बलि का बकरा नहीं बनाया जाएगा। सुरक्षा कर्मी अक्सर तनावपूर्ण, अनिश्चित और तेजी से बदलती परिस्थितियों में निर्णय लेते हैं। ऐसे वातावरण में संस्थागत समर्थन, स्पष्ट आदेश,पर्याप्त प्रशिक्षण और निष्पक्ष जांच की व्यवस्था उनके मनोबल के लिए आवश्यक है। यदि हर विवादित कार्रवाई के बाद केवल मैदान में मौजूद सबसे निचले स्तर के कर्मियों को दोषी ठहराने की प्रवृत्ति विकसित हो, तो इससे कमांड व्यवस्था, पेशेवर निर्णय क्षमता और सुरक्षा तंत्र की कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है।लेकिन इसी कथन का दूसरा और अधिक महत्वपूर्ण पक्ष कमांड जवाबदेही भी है।
साथियों, इस पूरे प्रकरण से भारत के लिए एक व्यापक नीति- बहस भी उभरती है। भीड़ नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय स्तरपर आधुनिक,स्पष्ट और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध प्रोटोकॉल विकसित किए जाने चाहिए। इनमें बल प्रयोग की क्रमिक व्यवस्था, संवाद और चेतावनी की प्रक्रिया, प्रशिक्षित वार्ताकारों की भूमिका, भीड़ की प्रकृति का आकलन, महिलाओं और विद्यार्थियों जैसे संवेदनशील समूहों के लिए विशेष सावधानियां, चिकित्सा सहायता, वीडियो रिकॉर्डिंग, बॉडी कैमरा, कमांड लॉग और घटना के बाद स्वतंत्र समीक्षा जैसे प्रावधान शामिल हो सकते हैं। प्रत्येक गंभीर बल-प्रयोग की घटना के बाद एक समयबद्ध आफ्टर- एक्शन रिव्यू भी उपयोगी हो सकता है, जिसमें यह देखा जाए कि क्या कार्रवाई आवश्यक, वैध और अनुपातिक थी तथा भविष्य में कम नुकसान के साथ स्थिति को संभालने के लिए क्या सुधार किए जा सकते हैं।छात्र आंदोलनों के संदर्भ में संवाद की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। छात्र केवल कानून- व्यवस्था की चुनौती नहीं होते; वे शिक्षा, रोजगार, परीक्षा, अवसर, पारदर्शिता और भविष्य से जुड़े प्रश्नों को सार्वजनिक मंच पर रखते हैं।हर छात्र आंदोलन को स्वतः शांतिपूर्ण या स्वतः हिंसक मानना उचित नहीं है। प्रशासन को वास्तविक स्थिति का तथ्यात्मक आकलन करना चाहिए। यदि प्रदर्शन शांतिपूर्ण है, तो संवाद, सुविधा, सुरक्षा और शांतिपूर्ण सभा के अधिकार को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यदि कुछ तत्व हिंसा करते हैं, तो जिम्मेदारी को व्यक्तिगत और प्रमाण-आधारित बनाया जाना चाहिए;पूरे आंदोलन या सभी प्रदर्शनकारियों को एक समान दृष्टि से देखना न्यायसंगत नहीं होगा। इसी प्रकार, यदि सुरक्षा बलों पर हमला होता है या गंभीर खतरा उत्पन्न होता है, तो उस वास्तविकता की भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।लोकतांत्रिक संतुलन का अर्थ किसी एक पक्ष की कहानी स्वीकार करना नहीं, बल्कि सभी तथ्यों की समान गंभीरता से जांच करना है।
संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318


