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लोकतंत्र में धरना-प्रदर्शन: जनहित का संवैधानिक अधिकार या दलगत टकराव का अखाड़ा? -सड़क से संसद तक बढ़ते राजनीतिक संघर्ष के बीच भारतीय लोकतंत्र के सामने नई चुनौती -समग्र व्यापक विश्लेषण

by Page 3 News International Desk
July 23, 2026
in Hindi News, Hindi Editorials
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क़्या आज आंदोलन जनहित और नीति- सुधार से अधिक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और दलगत हितों के इर्द-गिर्द केंद्रित होते जा रहे हैं?

धरना-प्रदर्शन लोकतंत्र की आत्मा हैं, किंतु उनका उद्देश्य लोकतांत्रिक संवाद को मजबूत करना होना चाहिए, नकि संस्थाओं को कमजोर करना -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत का लोकतंत्र अपनी सबसे बड़ी शक्ति जनता की भागीदारी, असहमति के सम्मान और शांतिपूर्ण विरोध की परंपरा से प्राप्त करता है।किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में धरना,प्रदर्शन, सत्याग्रह और जनआंदोलन केवल विरोध के साधन नहीं होते,बल्कि वे शासन और जनता के बीच संवाद स्थापित करने के संवैधानिक माध्यम भी माने जाते हैं। भारत की सभ्यता में भी अहिंसक प्रतिरोध की परंपरा अत्यंत प्राचीन रही है,जिसे आधुनिक युग में महात्मा गांधी ने सत्याग्रह और अहिंसक आंदोलन के रूप में विश्व के सामने स्थापित किया।स्वतंत्रता संग्राम से लेकर किसानों,मजदूरों,छात्रों, महिलाओं और सामाजिक संगठनों तक,शांतिपूर्ण आंदोलनों ने समय-समय पर सरकारों को जनभावनाओं पर विचार करने के लिए प्रेरित किया।यही लोकतंत्र की आत्मा है कि सरकार और विपक्ष दोनों जनता के प्रति जवाबदेह रहें तथा मतभेदों का समाधान संविधान और संवाद के माध्यम से खोजें। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि समय के साथ-साथ आंदोलन की प्रकृति में उल्लेखनीय परिवर्तन दिखाई देने लगा है। आज अनेक अवसरों पर यह धारणा बनती जा रही है कि कई आंदोलन जनहित और नीति-सुधार से अधिक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और दलगत हितों के इर्द-गिर्द केंद्रित हो गए हैं। जनता के एक वर्ग में यह प्रश्न उठने लगा है कि क्या धरना-प्रदर्शन अब लोकतांत्रिक विमर्श का माध्यम रह गए हैं,अथवा वे राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन का उपकरण बनते जा रहे हैं? यह प्रश्न इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि संसद जैसे सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच के समानांतर सड़क पर संघर्ष की राजनीति बढ़ती दिखाई दे रही है।इसी परिप्रेक्ष्य में वर्ष 2026 का मानसून संसद सत्र विशेष चर्चा का विषय बन गया है। 20 जुलाई से प्रारंभ हुए संसद सत्र के साथ ही विभिन्न विपक्षी दलों ने कई मुद्दों पर सरकार को घेरने की रणनीति अपनाई।यूजीसी-नेट,शिक्षा व्यवस्था,छात्रों के मुद्दे,कथित पुलिस कार्रवाई तथा शिक्षामंत्री से इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्ष ने संसद के भीतर और बाहर दोनों स्थानों पर आक्रामक रुख अपनाया, दिल्ली के जंतर-मंतर पर जारी आंदोलन को व्यापक राजनीतिक समर्थन मिलने लगा,जिसमें विभिन्न विपक्षी दलों के नेताओं की भागीदारी ने इसे केवल एक छात्र या सामाजिक आंदोलन न रहने देकर राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बना दिया।अब धरना स्थल पर भगदड़, पीएम के आवास पर धरना, फिर 22 जुलाई 2026 को सत्ताधारी पार्टी द्वारा भी आंदोलन धरना व तेलंगाना में दोनों पार्टियों क़े कार्यकर्ताओं की झड़प यह सब मीडिया में आ रहा है जिसे जनता, मतदाता व पूरा विश्व देख रहे हैं।
साथियों इसी क्रम में पर्यावरण कार्यकर्ता और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के आंदोलन को भी विपक्ष ने समर्थन दिया। उनके स्वास्थ्य को लेकर चिंता व्यक्त की गई और न्यायालय के सुझाव के बाद उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। इससे आंदोलन को मानवीय और राजनीतिक दोनों दृष्टियों से व्यापक चर्चा मिली। लोकतंत्र में किसी भी नागरिक को अपनी बात रखने का अधिकार है,किंतु जब ऐसे आंदोलनों के साथ राजनीतिक दल खुलकर जुड़ते हैं तो आंदोलन का स्वरूप स्वतः व्यापक राजनीतिक बहस का विषय बन जाता है। सरकार इसे राजनीतिकरण कहती है, जबकि विपक्ष इसे लोकतांत्रिक समर्थन बताता है। दोनों पक्षों के अपने-अपने तर्क हैं, किंतु अंतिम निर्णय जनता की लोकतांत्रिक समझ पर ही सटीकता से निर्भर करता है।
साथियों, इन घटनाओं के समानांतर संसद के भीतर भी लगातार हंगामा, नारेबाजी, स्थगन और बहिर्गमन जैसी स्थितियां देखने को मिलीं।संसद का प्रत्येक मिनट राष्ट्रीय संसाधनों,करदाताओं के धन और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व से जुड़ा होता है। जब 25 दिन के निर्धारित संसदीय सत्र का बड़ा हिस्सा व्यवधानों में व्यतीत होता है,तबस्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि क्या जनहित से जुड़े विधेयक, आर्थिक सुधार, सामाजिक कल्याण और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण विषय पर्याप्त चर्चा प्राप्त कर पाएंगे?लोकतंत्र में विपक्ष का दायित्व सरकार से कठोर प्रश्न पूछना है, वहीं सरकार का दायित्व उत्तर देना और संसद चलाना है। यदि दोनों पक्ष संवाद के स्थान पर केवल टकराव का मार्ग अपनाते हैं तो अंततः नुकसान सटीकता से जनता का होता है।
साथियों, स्थिति तब और अधिक गंभीर दिखाई दी जब संसद के बाहर पीएम के आधिकारिक आवास के निकट प्रमुख विपक्षी पार्टी द्वारा धरना-प्रदर्शन किया गया।प्रदर्शन का मुख्य आधार नीट पेपर लीक,छात्रों के साथ कथित पुलिस कार्रवाई तथा शिक्षा संबंधी मुद्दे बताए गए।विपक्ष का कहना था कि वह छात्रों की आवाज़ को सरकार तक पहुंचाना चाहता है, जबकि सत्तापक्ष ने इसे सुरक्षा व्यवस्था और संवैधानिक मर्यादाओं के विरुद्ध राजनीतिक प्रदर्शन बताया। पीएम आवास जैसे अति- संवेदनशील और उच्च सुरक्षा वाले क्षेत्र में विरोध प्रदर्शन ने स्वाभाविक रूप से सुरक्षा एजेंसियों की चिंता बढ़ाई और राजनीतिक वातावरण और अधिक गर्म हो गया।इसके तुरंत बाद प्रमुख सत्ताधारी पार्टी ने भी प्रमुख विपक्षी पार्टी के विरोध में देशव्यापी प्रदर्शन प्रारंभ कर दिए।अनेक राज्यों में प्रमुख सत्ताधारी पार्टी क़े कार्यकर्ता सड़कों पर उतरे और विपक्ष के आरोपों का प्रतिवाद किया।यह घटनाक्रम लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा का स्वाभाविक हिस्सा माना जा सकता है, किंतु जब जवाबी प्रदर्शन भी समान तीव्रता से शुरू होते हैं तो राजनीतिक तनाव कई गुना बढ़ जाता है। तेलंगाना सहित कुछ स्थानों पर दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच झड़पों की मीडिया में आई खबरों ने चिंता और बढ़ा दी। लोकतंत्र में विचारों का संघर्ष स्वीकार्य है,परंतु यदि वह शारीरिक टकराव का रूप लेने लगे तो लोकतांत्रिक संस्कृति कमजोर पड़ने लगती है।
साथियों,आज सूचना प्रौद्योगिकी और सोशल मीडिया के युग में भारत की प्रत्येक राजनीतिक गतिविधि केवल देश की जनता ही नहीं, बल्कि पूरा विश्व भी देखता है। भारत स्वयं को विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में प्रस्तुत करता है। ऐसे में संसद के भीतर लगातार व्यवधान, सड़क पर राजनीतिक संघर्ष, आरोप-प्रत्यारोप और कार्यकर्ताओं के बीच टकराव अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लोकतांत्रिक परिपक्वता के संदर्भ में चर्चा का विषय बनते हैं। लोकतंत्र की शक्ति केवल चुनावों में नहीं, बल्कि असहमति को गरिमा के साथ संभालने की क्षमता में भी निहित होती है।
साथियों,राजनीतिकविश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि जनता अब केवल भाषणों और नारों के आधार पर निर्णय नहीं करती।मतदाता शिक्षा,रोजगार,महंगाई,कृषि स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचे, कानून-व्यवस्था और आर्थिक अवसरों जैसे ठोस मुद्दों पर सरकार और विपक्ष दोनों का मूल्यांकन करता है। यदि संसद का समय बार-बार हंगामे में व्यतीत होता है और जनहित के प्रश्न पीछे छूट जाते हैं, तो मतदाता दोनों पक्षों के आचरण का आकलन अपने अनुभव और अपेक्षाओं के आधार पर करता है।इसलिए कई विश्लेषक यह संभावना व्यक्त करते हैं कि अंततः जनता अपने मताधिकार के माध्यम से राजनीतिक दलों के व्यवहार पर प्रतिक्रिया देती है। यह प्रतिक्रिया किसके पक्ष में जाएगी, इसका निर्णय केवल चुनाव परिणाम ही करते हैं; इसलिए किसी निश्चित निष्कर्ष पर पहुँचना उचित नहीं होगा।
साथियों,लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। एक सशक्त विपक्ष सरकार को जवाबदेह बनाता है, नीतियों की समीक्षा करता है और वैकल्पिक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है। दूसरी ओर सरकार की भी जिम्मेदारी है कि वह आलोचना को लोकतांत्रिक भावना से सुने, संवाद के अवसर बनाए और आवश्यक होने पर सुधारात्मक कदम उठाए। यदि दोनों पक्ष संवाद छोड़कर केवल राजनीतिक ध्रुवीकरण को प्राथमिकता देंगे, तो लोकतंत्र की गुणवत्ता प्रभावित होगी।जनता पर इन घटनाओं का प्रत्यक्ष प्रभाव भी कम नहीं पड़ता। संसद का कामकाज बाधित होने से अनेक विधेयकों, नीतिगत चर्चाओं और जनहित से जुड़े निर्णयों में विलंब हो सकता है। दूसरी ओर,संवेदनशील क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर धरना- प्रदर्शन होने से आम नागरिकों को यातायात, सुरक्षा जांच और दैनिक जीवन में कठिनाइयों का सामना करनापड़ता है। तीसरा प्रभाव लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति विश्वास पर पड़ता है। यदि नागरिकों को यह महसूस होने लगे कि समस्याओं का समाधान संसद के बजाय केवल सड़क पर संघर्ष से ही संभव है, तो संस्थागत लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग सकता है। भारतीय संविधान ने नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण सभा का अधिकार दिया है। साथ ही यह भी अपेक्षा की गई है कि इन अधिकारों का प्रयोग सार्वजनिक व्यवस्था, सुरक्षा और संवैधानिक मर्यादाओं के अनुरूप हो। इसी प्रकार निर्वाचित जनप्रतिनिधियों से अपेक्षा रहती है कि वे संसद और विधानसभाओं को संवाद, बहस और नीति- निर्माण का सर्वोच्च मंच बनाए रखें। यदि सड़क और संसद दोनों स्थानों पर केवल टकराव ही दिखाई देगा,तो लोकतांत्रिक संस्थाओं की प्रभावशीलता पर स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठेंगे।
साथियों, विश्व के अनेक परिपक्व लोकतंत्रों में भी विरोध प्रदर्शन होते हैं, किंतु अंततः अधिकांश महत्वपूर्ण निर्णय संसदीय समितियों, विधायी बहसों, न्यायिक समीक्षा और संस्थागत संवाद के माध्यम से आगे बढ़ते हैं। भारत के लिए भी यही मार्ग अधिक टिकाऊ और लोकतांत्रिक माना जाता है। आंदोलन लोकतंत्र की शक्ति हैं, परंतु आंदोलन का उद्देश्य समाधान होना चाहिए, स्थायी टकराव नहीं।आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार विपक्ष की चिंताओं को गंभीरता से सुने, विपक्ष संसद की कार्यवाही को प्रभावी ढंग से चलने दे और दोनों पक्ष राष्ट्रीय हित को दलगत हितों से ऊपर रखें। जनता ने जनप्रतिनिधियों को संघर्ष करने के लिए नहीं, बल्कि समस्याओं का समाधान खोजने के लिए चुना है। संसद में बहस जितनी मजबूत होगी, लोकतंत्र उतना ही सशक्त होगा।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विशेषण करें तो हम पाएंगे क़ि भारत का लोकतंत्र आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा दिखाई देता है जहाँ संवैधानिक अधिकार, राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और जनअपेक्षाओं के बीच संतुलन बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती है। धरना-प्रदर्शन लोकतंत्र की आत्मा हैं, किंतु उनका उद्देश्य लोकतांत्रिक संवाद को मजबूत करना होना चाहिए, न कि संस्थाओं को कमजोर करना। संसद का प्रत्येक दिन देश के भविष्य से जुड़ा है; इसलिए उसका अधिकतम उपयोग होना चाहिए। अंततः लोकतंत्र का अंतिम निर्णायक न सरकार होती है,न विपक्ष बल्कि भारत का जागरूक मतदाता होता है,जो समय आने पर अपने मताधिकार के माध्यम से सभी राजनीतिक दलों के आचरण, जवाबदेही और प्राथमिकताओं का मूल्यांकन करता है। यही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है।

संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

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