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नशा मुक्त भारत @ 2029 -औषधीय (अदरक, इलायची और पुदीने के टिंचर) क़ी आड़ में छिपतें नशे पर कानून का डंडा -औषधि नियम,1945 में ऐतिहासिक संशोधन -व्यापक विश्लेषण

by Page 3 News International Desk
July 11, 2026
in Hindi News, Hindi Editorials
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नशाखोरों पर कानून का शिकंजा -भारत सरकार का ऐतिहासिक नीतिगत प्रहार, कानूनी लीक़ेजेस बंद कर नशाखोरों पर चारों तरफ से घेराबंदी

देश में कफ सिरप,टॉनिक, पाचक द्रव्यों और अन्य सुगंधित औषधीय मिश्रणों के रूप में धड़ल्ले से किए जा रहे गैर- चिकित्सीय नशे और फार्मास्युटिकल दुरुपयोग की जड़ों पर ऐतिहासिक प्रहार -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर दवा और मादक पदार्थों के बीच की धुंधली होती लकीर वर्तमान समय में वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक अभूतपूर्व चुनौती बन चुकी है। पारंपरिक रूप से समाज जिन रसायनों को चिकित्सा,शारीरिक रिकवरी और उपचार का माध्यम मानता आया है,आज वही रसायन एक छिपे हुए वैश्विक महामारी के रूप में युवा पीढ़ी को अपनी गिरफ्त में ले रहे हैं। इस गंभीर संकट को भांपते हुए,भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने एक युगांतकारी कदम उठाते हुए औषधि नियम,1945 में ऐतिहासिक संशोधन किया है।भारत सरकार के स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा आधिकारिक गज़ट नोटिफिकेशन 8 जुलाई 2026 (ज़ी.एस.आर.607(ई) को जारी किया गया,आधिकारिक गज़ट में प्रकाशित होने के बाद, इन नए सख्त नियमों को देश भर में पूरी तरह प्रभावी होने के लिए छह महीने का समय दिया गया है। इस प्रकार, दवा निर्माताओं और फार्मेसियों के लिए यह संशोधन जनवरी 2027 से अनिवार्य रूप से लागू माना जाएगा ताकि तब तक उद्योग जगत पैकेजिंग और फॉर्मूलेशन में आवश्यक बदलाव कर सके इस नए कानून के तहत अब ऐसी सभी ओरल लिक्विड (तरल) दवाएं, जिनमें एथिल अल्कोहल की मात्रा 12 प्रतिशत वी /वी से अधिक है और जिनकी पैकिंग 30 मिलीलीटर से बड़ी है,उन्हें पूरी तरह से नियंत्रित करते हुए शेड्यूल एच1 के दायरे में ला दिया गया है। इस कठोर विनियामक हस्तक्षेप का प्राथमिक और मूल उद्देश्य देश में कफ सिरप, टॉनिक, पाचक द्रव्यों और अन्य सुगंधित औषधीय मिश्रणों के रूप में धड़ल्ले से किए जा रहे गैर- चिकित्सीय नशे और फार्मास्युटिकल दुरुपयोग की जड़ों पर प्रहार करना है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र अधिवक्ता होने के नाते बता दूं क़ि नशे के आदी लोगों और विशेषकर किशोरों द्वारा कानून की कमियों का फायदा उठाकर किया जाने वाला यह दुरुपयोग केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक वैश्विक विनियामक चिंता का विषय रहा है। लंबे समय से कुछ विशिष्ट औषधीय फॉर्मूलेशन,जैसे कि अदरक, इलायची और पुदीने के टिंचर तथा कई पारंपरिक स्वास्थ्य टॉनिक, औषधि नियम,1945 के शेड्यूल क़े, के तहत लाइसेंसिंग आवश्यकताओं से पूरी तरह मुक्त थे।इस छूट कापरिणाम यह हुआ कि जिन दवाओं में अल्कोहल की सांद्रता 80 प्रतिशत से 90 प्रतिशत तक थी,वे भी बाजार में बिना किसी सख्त निगरानी के ओवर-द- काउंटर यानी बिना पर्ची के आसानी से उपलब्ध थीं। कई राज्य सरकारों द्वारा इस पर गहरी चिंता जताए जाने के बाद केंद्र सरकार ने शेड्यूल क़े से इस छूट को तत्काल प्रभाव से समाप्त कर दिया है, जिससे अब इन दवाओं के निर्माण, भंडारण और वितरण के लिए औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 के तहत अनिवार्य रूप से लाइसेंस लेना होगा। यह संशोधन सीधे तौर पर उस छिपे हुए और सामाजिक रूप से स्वीकृत नशे की आपूर्ति श्रृंखला को तोड़ता है, जो बिना किसी रोक-टोक के समाज में सटीकता से जहर घोल रही थी।
साथियों बात अगर हम विशिष्ट विनियामक कानूनीधाराएं और दंडात्मक प्रावधानइस कानून को जमीन पर सख्ती से लागू करने के लिए सरकार ने इसे औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम,1940 ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट ,1940 के दंडात्मक प्रावधानों से जोड़ा है। अधिनियम की धारा 18(सी) के तहत बिना वैध निर्माण या बिक्री लाइसेंस के इन दवाओं का भंडारण या वितरण करना एक संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध माना जाएगा। नए संशोधनों के तहत:शेड्यूल एच1 नियमों के प्रथम उल्लंघन पर: यदि कोई केमिस्ट या फार्मासिस्ट पहली बार बिना डॉक्टर के पर्चे के 12 प्रतिशत से अधिक अल्कोहल वाली दवा बेचते या बिक्री का 3 वर्ष का रिकॉर्ड न मेंटेन करते हुए पकड़ा जाता है, तो राज्य दवा नियामक प्राधिकरण द्वारा उसका लाइसेंस 15 से 30 दिनों के लिए निलंबित किया जा सकता है।बार-बार नियमों का उल्लंघन करने पर: यदि कोई रिटेलर जानबूझकर नियमों की अवहेलना जारी रखता है, तो अधिनियम की धारा 27(डी) के तहत उसका दुकान लाइसेंस स्थायी रूप से रद्द किया जा सकता है। इसके साथ ही उसे न्यूनतम 3 वर्ष से लेकर अधिकतम 5 वर्ष तक की जेल की सजा और कम से कम 1 लाख रुपये का भारी वित्तीय जुर्माना भी भुगतना पड़ सकता है।सिंडिकेट या थोक डायवर्जन के मामले में: यदि जांच में यह साबित होता है कि किसी डिस्ट्रीब्यूटर या मैन्युफैक्चरर ने जानबूझकर नशे के सिंडिकेट को लाभ पहुंचाने के लिए थोक स्तर पर इन दवाओं की काला बाजारी की है, तो अपराध की गंभीरता को देखते हुए धारा 27(ए ) के तहत आजीवन कारावास तक की कड़ी सजा का प्रावधान सटीकता से लागू हो सकता है।
साथियों, समकालीन विश्व में मादक पदार्थों के सेवन के तरीकों में एक बड़ा पैराडाइम शिफ्ट या संरचनात्मक बदलाव देखा गया है। अब पारंपरिक अवैध ड्रग्स जैसे हेरोइन, चरस या कोकीन के बजाय, युवा वर्ग कानूनी रूप से उपलब्ध फार्मास्युटिकल दवाओं के दुरुपयोग की ओर तेजी से आकर्षित हो रहा है। इसके पीछे मुख्य कारण इन दवाओं का अत्यंत सस्ता होना, आसानी से मेडिकल स्टोर पर मिल जाना, गंधहीन होना और पारंपरिक नशीले पदार्थों की तरह पकड़े जाने का सामाजिक कलंक या कानूनी डर न होना है। कफ सिरप (जैसे कोडीन आधारित या उच्च अल्कोहल युक्त सिरप) और रिस्टोरेटिव टॉनिक का अत्यधिक मात्रा में सेवन कर तत्काल हाई प्राप्त करना एक वैश्विक फैशन बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस प्रवृत्ति को फार्मा-विंडिंग या औषधीय नशे के रूप में वर्गीकृत किया गया है, जहां लोग मानसिक तनाव,अकेलेपन या तात्कालिक आनंद के लिए दवाओं की पूरी की पूरी बोतलें एक बार में पी जाते हैं।
साथियो,नशे के इस नए चलन ने चिकित्सा विज्ञान, समाज शास्त्रियों और नीति निर्माताओं को समान रूप से गहराई से चिंतित किया है। उच्च अल्कोहल सांद्रता वाली ये दवाएं, जब बिना किसी चिकित्सीय आवश्यकता के अत्यधिक मात्रा में शरीर में जाती हैं, तो यह सीधे केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करती हैं और व्यक्ति की निर्णय क्षमता को शून्य कर देती हैं। लंबे समय तक इस तरह का सेवन करने से लीवर सिरोसिस, किडनी का फेल होना, क्रोनिक गैस्ट्राइटिस, हृदय संबंधी विसंगतियां और गंभीर मानसिक विकार जैसे अपरिवर्तनीय स्वास्थ्य जोखिम उत्पन्न होते हैं। कई मामलों में, किशोर इन कफ सिरप और टॉनिकों को अन्य सिंथेटिक दवाओं, अवसादरोधी गोलियों या नशीली गोलियों के साथ मिलाकर एक जानलेवा कॉकटेल तैयार करते हैं। यह प्रवृत्ति न केवल किसी एक देश की सीमा तक सीमित है, बल्कि दक्षिण एशिया, अफ्रीका और अमेरिकी महाद्वीपों में भी इसी तरह के फार्मास्युटिकल उत्पादों के डायवर्जन (गलत इस्तेमाल के लिए वितरण) की गंभीर घटनाएं लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सटीकता से रिपोर्ट की गई हैं।
साथियों, सार्वजनिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से देखा जाए तो सरकार का यह संशोधन एक अभेद्य सुरक्षा कवच की तरह काम करेगा। चिकित्सा जगत में दवाओं का उपयोग हमेशा तर्कसंगत,नियंत्रित और साक्ष्य- आधारित होना चाहिए, न कि उपभोक्ता की सनक पर आधारित।जब सामान्य नागरिक सर्दी-खांसी, सामान्य थकान या मामूली कमजोरी के लिए खुद ही मेडिकल स्टोर से जाकर उच्च अल्कोहल युक्त हैवी टॉनिक खरीदकर पीने लगते हैं, तो वे अनजाने में ही अपनी शारीरिक प्रणालियों को गंभीर खतरे में डाल रहे होते हैं। स्व- दव की इस घातक आदत के कारण वास्तविक बीमारी के लक्षण तो कुछ समय के लिए छिप जाते हैं, लेकिन अंदर ही अंदर शरीर को अल्कोहल और अन्य रसायनों की गंभीर लत लग जाती है।इस संशोधन के माध्यम से सरकार ने एक बेहद स्पष्ट और कड़ा संदेश दिया है कि जन स्वास्थ्य की रक्षा किसी भी व्यावसायिक लाभ या औद्योगिक सुगमता से बहुत ऊपर है, इन दवाओं को ‘शेड्यूल एच 1 में स्थानांतरित करने से यह सुनिश्चित होगा कि कोई भी व्यक्ति केवल और केवल डॉक्टर की लिखित सलाह पर ही इनका उपभोग कर सकेगा। यह कदम अंततः समाज में दवाओं के प्रति एक जिम्मेदार और सचेत व्यवहार विकसित करेगा। जब दवाओं की उपलब्धता को वैज्ञानिक आधार पर तर्कसंगत बनाया जाता है, तो इसके दीर्घकालिक परिणाम देश के स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे पर पड़ने वाले वित्तीय, सामाजिक और प्रशासनिक बोझ को कम करने के रूप में सटीकता से सामने आते हैं।
साथियों संशोधन के विनियामक प्रशासनिक और तकनीकी पहलुओं को समझना अत्यंत आवश्यक है क्योंकि यह देश की पूरी दवा वितरण प्रणाली को एक पारदर्शी और जवाबदेह ढांचे में ढालता है। औषधि नियम, 1945 के तहत शेड्यूल एच1 को विशेष रूप से उन दवाओं की सख्त निगरानी के लिए पेश किया गया था, जिनके दुरुपयोग या एंटीबायोटिक प्रतिरोध पैदा करने की संभावना सबसे अधिक होती है। उच्च अल्कोहल वाली ओरल दवाओं को इस श्रेणी में शामिल करने के बाद अब देश के प्रत्येक फार्मासिस्ट या केमिस्ट को एक अलग, विशेष रजिस्टर बनाए रखना होगा। इस रजिस्टर में दवा खरीदने वाले मरीज का नाम, उसका पूरा पता, संपर्क सूत्र, प्रिस्क्रिप्शन लिखने वाले डॉक्टर का नाम, उनकी डिग्री तथा बेची गई दवा की सटीक तारीख व मात्रा दर्ज करनी होगी। इस पूरे भौतिक और डिजिटल रिकॉर्ड को न्यूनतम तीन वर्षों तक ड्रग इंस्पेक्टर्स की औचक जांच के लिए सुरक्षित रखना अनिवार्य है।
साथियों, यह व्यापक डेटा ट्रेल आपूर्ति श्रृंखला में किसी भी प्रकार के लीकेज,ब्लैक मार्केटिंग या थोक डायवर्जन को पूरी तरह से असंभव बना देता है। यदि कोई मेडिकल स्टोर अवैध रूप से इन दवाओं की बड़ी खेप किसी नशे के सिंडिकेट या अवैध वितरकों को बेचता है, तो रिकॉर्ड में विसंगति आते ही वह कानून के शिकंजे में आ जाएगा। इस प्रकार, विनियामक ढांचे में किया गया यह बदलाव केवल कागजी न होकर जमीन पर एक ठोस प्रशासनिक पकड़ सुनिश्चित करता है। इसके साथ ही, इस कानून का उल्लंघन करने वाले फार्मेसियों के खिलाफ भारी जुर्माना, लाइसेंस निलंबन और आपराधिक मुकदमे तक का प्रावधान किया गया है, जो वितरकों के मन में एक विनियामक भय पैदा करेगा।दवाओं के जरिए होने वाले नशे का सबसे दर्दनाक पहलू इसका सामाजिक ताने- बाने और पारिवारिक स्थिरता पर पड़ने वाला विनाशकारी प्रभाव है। पारंपरिक मादक पदार्थों जैसे शराब, गांजा या अफीम के सेवन पर समाज में एक गहरी सामाजिक बंदिश और शर्मिंदगी होती है, जिसके कारण कई लोग इसकी शुरुआत करने से हिचकिचाते हैं। इसके विपरीत, चूंकि कफ सिरप या हेल्थ टॉनिक आकर्षक पैकिंग में दवा की बोतलों में आते हैं, इसलिए कई बार परिवारों को बहुत देर से पता चलता है कि उनका बच्चा किसी गंभीर नशे की गिरफ्त में आ चुका है। यह साइलेंट एडिक्शन मध्यम और निम्न-मध्यम वर्गीय परिवारों को आर्थिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से पूरी तरह तबाह कर देता है, जिससे घरेलू हिंसा और अपराधों में भी वृद्धि होती है।
साथियों, जब सरकार इन उत्पादों की खुदरा बिक्री पर कड़ा पहरा लगाती है, तो इसका सीधा और सकारात्मक प्रभाव पारिवारिक स्थिरता और युवाओं के भविष्य पर पड़ता है। यह कानून उन लाखों माता-पिता के लिए एक बहुत बड़ी राहत है जो अपने बच्चों को इस छिपी हुई लत से बचाने के लिए थका देने वाला संघर्ष कर रहे थे। व्यावसायिक और फार्मास्युटिकल सप्लाई चेन में पारदर्शिता आने से उन असामाजिक तत्वों के हौसले पस्त होंगे जो मोटी कमाई करने के लिए मेडिकल स्टोर्स के माध्यम से समाज में नशे की अनधिकृत आपूर्ति करते थे। सामाजिक जवाबदेही का यह स्तर एक सुरक्षित, स्वस्थ और प्रगतिशील राष्ट्र के निर्माण के लिए अत्यंत अपरिहार्य माना जाता है।किसी भी बड़े नीतिगत या विनियामक बदलाव की तरह, इस संशोधन को भी जमीनी स्तर पर शत-प्रतिशत सफल बनाने के लिए कई व्यावहारिक और परिचालन संबंधी चुनौतियों से पार पाना होगा। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में, जहां ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में स्वास्थ्य साक्षरता अभी भी एक चुनौती है, इन नियमों को पूरी तरह लागू करने में कई प्रशासनिक बाधाएं आ सकती हैं। सबसे बड़ी चुनौती सामान्य बीमारियों जैसे खांसी-जुकाम या कमजोरी के लिए खुद से दवा खरीदने की पुरानी उपभोक्ता आदत को बदलना है। इसके लिए सरकार को व्यापक जन-जागरूकता अभियान चलाने होंगे और क्षेत्रीय भाषाओं में विज्ञापनों के जरिए लोगों को यह समझाना होगा कि यह पाबंदी उनके स्वास्थ्य के हित में है।
अतःअगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि औषधि नियम,1945 में किया गया यह संशोधन केवल एक तकनीकी विधायी परिवर्तन या प्रशासनिक आदेश नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य को सर्वोच्च प्राथमिकता देने की राज्य की संप्रभु प्रतिबद्धता का एक ज्वलंत उदाहरण है।दवाओं में अल्कोहल की सांद्रता और पैकिंग के आकार को कड़े विनियामक नियमों के दायरे में लाकर सरकार ने देश की अमूल्य युवा शक्ति को फार्मास्युटिकल नशे के आत्मघाती चंगुल में फंसने से बचाने के लिए एक मजबूत और अभेद्य सुरक्षा दीवार खड़ी कर दी है। यह कानून आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और मानसिक विकास को सुनिश्चित करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।इस दूरदर्शी नीति की अंतिम सफलता अब इसके त्रिपक्षीय कार्यान्वयन और सामूहिक सहभागिता पर निर्भर करती है—जिसमें सरकार की सख्त और निष्पक्ष निगरानी, फार्मासिस्टों की व्यावसायिक व नैतिक ईमानदारी और आम जनता की सचेत जागरूकता शामिल है जब समाज, चिकित्सक और नियामक संस्थाएं एक साझा लक्ष्य के साथ मिलकर काम करेंगी, तभी हम एक ऐसे सशक्त और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण कर पाएंगे जहां दवाएं केवल जीवन बचाने, पीड़ा कम करने और स्वास्थ्य सुधारने का पवित्र माध्यम होंगी, न कि किसी नशे, अपराध या पारिवारिक बर्बादी का जरिया।

संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

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