भारतीय न्यायिक इतिहास में महिलाओं के अवैतनिक घरेलू श्रम को कानूनी, आर्थिक और सामाजिक मान्यता देने वाला एक मील का पत्थर है
गृहिणियों को केवल होममेकर नहीं बल्कि नेशन बिल्डर अर्थात राष्ट्र निर्माता की संज्ञा देकर भारतीय न्यायिक इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारतीय समाज में सदियों से गृहिणी को परिवार की धुरी माना जाता रहा है,किंतु विडंबना यह है कि जिस महिला के श्रम पर पूरा परिवार, समाज और अंततः राष्ट्र की सामाजिक संरचना टिकी होती है,उसी के कार्य को आर्थिक दृष्टि से कभी उचित मान्यता नहीं मिल सकी। घर की सफाई,भोजन बनाना, बच्चों का पालन-पोषण, बुजुर्गों की देखभाल,परिवार के स्वास्थ्य और भावनात्मक संतुलन को बनाए रखना,घरेलू वित्तीय प्रबंधन करना तथा परिवार के प्रत्येक सदस्य की आवश्यकताओं का ध्यान रखना ऐसे कार्य हैं जो किसी भी पेशेवर सेवा से कम नहीं हैं। इसके बावजूद इन कार्यों को काम के बजाय कर्तव्य या पारिवारिक जिम्मेदारी मान लिया गया। परिणामस्वरूप करोड़ों महिलाओं द्वारा प्रतिदिन किए जाने वाले अवैतनिक घरेलू श्रम को राष्ट्रीय आय,सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) तथा आर्थिक उत्पादकता के पारंपरिक मापदंडों में स्थान नहीं मिल पाया।आधुनिक डिजिटल और बाजार आधारित अर्थव्यवस्था में भी किसी व्यक्ति के योगदान कामूल्यांकन प्रायः उसके वेतन,आयकर या बैंक खाते में आने वाली आय से किया जाता है,जबकि गृहिणी का श्रम अदृश्य रह जाता है।यही कारण है कि लंबे समय से महिला अधिकार संगठनों, अर्थशास्त्रियों और समाज शास्त्रियों द्वारा यह मांग उठाई जाती रही है कि घरेलू कार्य को आर्थिक मूल्य दिया जाए और गृहिणियों के योगदान को औपचारिक मान्यता प्रदान की जाए। इसी व्यापक सामाजिक और संवैधानिक पृष्ठभूमि में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 11 जून 2026 को, यह निर्णय एसएलपी (सिविल ) नंबर 33915 of 2025 से उत्पन्न 2026 आईएनएससी 634 के रूपमें एक ऐसा ऐतिहासिक निर्णय दिया है जिसने गृहिणियों को केवल होममेकर नहीं बल्कि नेशन बिल्डरअर्थात राष्ट्रनिर्माता की संज्ञा देकर भारतीय न्यायिक इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि यह निर्णय केवल मोटर दुर्घटना मुआवजा मामले तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज की उस सोच को चुनौती देता है जो महिलाओं के घरेलू श्रम को कमतर आंकती रही है।
साथियों यह ऐतिहासिक निर्णय शिशुपाल @ शिशराम & अदर्स वर्सेज सुरजीत एंड अदर्स मामलेमें 11 जून 2026 को सुनाया गया। यह मामला वर्ष 2001 में पंजाब में हुई एक सड़क दुर्घटना से संबंधित था, जिसमें एक गृहिणी की मृत्यु हो गई थी। मृतका के परिवार ने मुआवजे की राशि को अपर्याप्त बताते हुए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और अंततः मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा। मामले की सुनवाई जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन . कोटिश्वर सिंह की द्वि-न्यायाधीशीय पीठ ने की। यह निर्णय एसएलपी (सिविल ) नंबर . 33915 of 2025 से उत्पन्न 2026 आईएनएससी 634 के रूप में दर्ज है। न्यायालय ने न केवल मुआवजे को बढ़ाकर लगभग 62.77 लाख रूपए कर दिया बल्कि गृहिणियों के आर्थिक योगदान पर भी व्यापक टिप्पणियां कीं।अपने निर्णय में न्यायालय ने अत्यंत महत्वपूर्ण शब्दों में कहा कि गृहिणियां परिवार मेंयोगदान देती हैं। वे राष्ट्र निर्माता हैं। वे राष्ट्र का निर्माण करती हैं। उनके योगदान का मूल्यांकन और मौद्रिक आकलन कैसे किया जाए, यही चुनौती है। न्यायालय ने यह भी आशा व्यक्त की कि अब होममेकर शब्द को नेशन बिल्डरके रूप में देखा जाएगा। यह टिप्पणी केवल एक भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं थी, बल्कि इसके पीछे एक गहरी संवैधानिक और सामाजिक सोच थी। न्यायालय ने स्वीकार किया कि जिस महिला के श्रम के कारण परिवार का प्रत्येक सदस्य अपनी शिक्षा, रोजगार और सामाजिक दायित्वों का निर्वहन कर पाता है, उसका योगदान राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा है।
साथियों इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि सर्वोच्च न्यायालय ने गृहिणी के अवैतनिक घरेलू श्रम कान्यूनतम आर्थिक मूल्य निर्धारित करते हुए कहा कि मोटर दुर्घटना दावों में मुआवजा निर्धारित करने के लिए गृहिणी की काल्पनिक मासिक आय (नोशनल मंथली इन्कम ) कम से कम 30,000 रूपए प्रति माह मानी जाएगी। भारतीय न्यायिक इतिहास में पहली बार सर्वोच्च न्यायालय ने इतनी स्पष्टता के साथ गृहिणी के श्रम को मौद्रिक मूल्य प्रदान किया है। न्यायालय ने माना कि यदि वही कार्य बाजार से खरीदे जाएं तो उनके लिए रसोइया, देखभालकर्ता, शिक्षक, घरेलू प्रबंधक और परामर्शदाता जैसी अनेक सेवाओं का भुगतान करना पड़ेगा। इसलिए यह कहना कि गृहिणी आय अर्जित नहीं करती,वास्तविकता के विपरीत है।
साथियों, न्यायालय ने एक और ऐतिहासिक कदम उठाते हुए लॉस ऑफ़ डोमेस्टिक केयर अर्थात घरेलू देखभाल की हानि को मुआवजे की एक स्वतंत्र श्रेणी के रूप में मान्यता दी। पहले मोटर दुर्घटना मामलों में मुख्य रूप से आय की हानि, आश्रितों की हानि, चिकित्सा व्यय और अन्य पारंपरिक मदों के आधार पर मुआवजा निर्धारित किया जाता था।लेकिन गृहिणियों के मामले में यह व्यवस्था अपर्याप्त थी क्योंकि उनकी कोई प्रत्यक्ष वेतन आय नहीं होती। न्यायालय ने कहा कि परिवार को मिलने वाली घरेलू देखभाल, बच्चों की परवरिश, पति-पत्नी के पारस्परिक सहयोग तथा परिवार के भावनात्मक और सामाजिक प्रबंधन का भी आर्थिक मूल्य है। इसलिए इसे अलग श्रेणी में शामिल किया जाना चाहिए।
साथियों, निर्णय की सबसे प्रभावशाली टिप्पणियों में से एक यह थी कि गृहिणी को डिपेंडेंट अर्थात आश्रित कहना विडंबनापूर्ण है। न्यायालय ने कहा कि वास्तव में पूरा परिवार गृहिणी पर निर्भर रहता है। भारतीय न्यायिक विमर्श में यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण दृष्टिकोण परिवर्तन है। पारंपरिक रूप से आय अर्जित करने वाले व्यक्ति को परिवार का मुख्य आधार माना जाता रहा है, जबकि न्यायालय ने स्पष्ट किया कि घर की व्यवस्था,बच्चों का पालन- पोषण, बुजुर्गों की देखभाल और सामाजिक स्थिरता का वास्तविक आधार गृहिणी होती है। इसलिए उसे केवल आश्रित के रूप में देखना उसकी भूमिका को कम करके आंकना है।सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में यह भी माना कि महिलाओं का अवैतनिक श्रम भारतीय अर्थव्यवस्था की अदृश्य नींव है। न्यायालय ने पितृसत्तात्मक सोच की आलोचना करते हुए कहा कि लंबे समय से घरेलू कार्य को वास्तविक काम नहीं माना गया, जबकि यह समाज के पुनरुत्पादन और मानव संसाधन निर्माण की मूल प्रक्रिया है।बच्चे का पालन- पोषण, बुजुर्गों की देखभाल,भोजन तैयार करना,परिवार का भावनात्मक संतुलन बनाए रखना और सामाजिक मूल्यों का हस्तांतरण, ये सभी कार्य आर्थिक विकास के लिए आवश्यक हैं। यदि ये कार्य न हों तो श्रम बाजार, शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक संरचना गंभीर रूप से सटीकता से प्रभावित हो जाएगी।
साथियों, इस निर्णय का महत्व केवल मुआवजा कानून तक सीमित नहीं है। यह भारतीय समाज को यह संदेश देता है कि महिलाओं का घरेलू श्रम किसी वेतनभोगी नौकरी से कम नहीं है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी वर्षों से अनपेड केयर इकॉनमी और केयर वर्क को मान्यता देने की मांग उठती रही है। संयुक्त राष्ट्र और अनेक अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने बार-बार कहा है कि महिलाओं का अवैतनिक श्रम आर्थिक विकास का आधार है, लेकिन राष्ट्रीय लेखांकन प्रणालियों में इसे पर्याप्त स्थान नहीं मिला है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय उसी वैश्विक विमर्श के अनुरूप दिखाई देता है। इस फैसले का एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रभाव यह होगा कि भविष्य में मोटर वाहन दुर्घटना मामलों में गृहिणियों के लिए दिए जाने वाले मुआवजे की गणना का तरीका बदल जाएगा। अब बीमा कंपनियां और न्यायाधिकरण गृहिणी के योगदान को केवल सांकेतिक रूप से नहीं आंक सकेंगे। उन्हें न्यायालय द्वारा निर्धारित सिद्धांतों का पालन करना होगा। इससे हजारों परिवारों को अधिक न्यायसंगत मुआवजा मिलने की संभावना है।
साथियों, सामाजिक दृष्टि से भी यह निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण है। लंबे समय से यह धारणा बनी हुई थी कि परिवार का आर्थिक योगदान केवल वही व्यक्ति करता है जो घर से बाहर जाकर वेतन अर्जित करता है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस सोच को चुनौती देते हुए स्पष्ट कर दिया कि घरेलू श्रम भी आर्थिक मूल्य रखता है। यह निर्णय महिलाओं के सम्मान, आत्मसम्मान और सामाजिक प्रतिष्ठा को बढ़ाने वाला है। यह संदेश देता है कि राष्ट्र निर्माण केवल कारखानों, कार्यालयों और संस्थानों में नहीं होता, बल्कि घरों में भी होता है जहां गृहिणियां आने वाली पीढ़ियों का निर्माण करती हैं।
अतः अगर हम उपयोग पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि 11 जून 2026 का यह निर्णय एसएलपी (सिविल ) नंबर .33915 of 2025 से उत्पन्न 2026 आईएनएससी 634 के रूपमें एक ऐसा ऐतिहासिक निर्णय दिया है जिसने गृहिणियों को केवल होममेकर नहीं बल्कि नेशन बिल्डरअर्थात राष्ट्र निर्माता की संज्ञा देकर भारतीय न्यायिक इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ दिया है।भारतीय न्यायिक इतिहास में महिलाओं के अवैतनिक घरेलू श्रम को कानूनी,आर्थिक और सामाजिक मान्यता देने वाला एक मील का पत्थर है। शिशुपाल @ शिशराम वर्सेज सुरजीत मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि गृहिणियां राष्ट्र निर्माता हैं, उनकी सेवाओं का आर्थिक मूल्य है, उन्हें आश्रित नहीं माना जा सकता और उनके घरेलू श्रम की न्यूनतम कीमत 30,000 रूपए प्रतिमाह आंकी जानी चाहिए। यह फैसला केवल एक मुआवजा विवाद का निपटारा नहीं है; यह भारतीय समाज को महिलाओं की भूमिका को नए दृष्टिकोण से देखने का संदेश देता है। आने वाले वर्षों में यह निर्णय संपत्ति अधिकार, भरण-पोषण, सामाजिक सुरक्षा, लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण से जुड़े अनेक मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक संदर्भ के रूप में उद्धृत किया जा सकता है। वास्तव में यह फैसला गृहिणी को घर संभालने वाली महिला से आगे बढ़ाकर राष्ट्र निर्माण की साझेदार के रूप में स्थापित करता है।
