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Home Hindi News

स्वामी श्रद्धानन्द के ९९ वें बलिदान वर्ष पर पंजाब में आर्यों व हिन्दुओं की निष्क्रियता पर ईसाई मत की धूम।

by Page 3 News International Desk
December 26, 2025
in Hindi News
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आचार्य राहुलदेवः

प्रत्येक वर्ष आर्यसमाज और हिन्दू संगठन वाले, महान स्वतन्त्रता सेनानी, आर्ष गुरुकुलों के पुनरुद्धार कर्ता, शुद्धि आन्दोलन के पुरोधा, अमर हुतात्मा, बब्बर शेर, स्वामी श्रद्धानन्द का बलिदान वर्ष २३ दिसम्बर को मनाते हैं। इस वर्ष स्वामी श्रद्धानन्द का ९९वाँ बलिदान वर्ष है। हमारे स्वाभिमानी इतिहास पुरुष की जितनी अवहेलना स्वतन्त्रता के परिवर्ती सरकारों ने की उतनी ही अवहेलना हम आर्यों और हिन्दू संगठनों उनके अनुयायियों ने भी की है। स्वामी श्रद्धानन्द को वह प्रतिष्ठा इस देश ने कभी नहीं दी, जिसके वे अधिकारी थे। पराधीन भारत के शिक्षा मन्दिर के सबसे बडे देवता को हमने अपने पाठ्यक्रम में एक पृष्ठ के रुप में भी पढाना गवारा न समझा। हमारे शिक्षा मंत्रालय को तो पता भी नहीं होगा कि मैकाले और उसकी षडयंत्र कारी शिक्षा नीति को पराधीन भारत में चुनौती देने वालों में स्वामी दयानन्द के परम शिष्य स्वामी श्रद्धानन्द थे। स्वामी श्रद्धानन्द ने अंग्रेजों के शासनकाल में सन् १९०२ में हरिद्वार के पास कांगड़ी ग्राम में सर्वप्रथम आर्ष गुरुकुल की स्थापना की थी। वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने मुगलो द्वारा पद्दलित और अंग्रेजो द्वारा नष्ट कर चुके गुरुकुलीय शिक्षा पद्धति को पुनः स्थापित करके भारतीय शिक्षा परम्परा की ज्योति जलाई थी। आज संभवत: भारत का अंग्रेजी जनमानस वाला युवा मैकाले को तो जानता होगा, किंतु हिंदू जन मानस वाला युवा शायद ही स्वामी श्रद्धानन्द को जानता होगा। हम आर्य कहलाने वाले और हिंदू संगठन वालों की सबसे बड़ी कमी रही कि हम स्वामी श्रद्धानन्द को राष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने में विफल रहे। मेरी दृष्टि में स्वामी श्रद्धानन्द की उपेक्षा करने का एकमात्र कारण तुष्टिकरण की नीति थी।

भारत को विभाजित करने के कारण मोहन दास गांधी को गोली खानी पड़ी पर उन्हें गोली के बदौलत स्वतन्त्र भारत में राष्ट्रपिता का दर्जा मिल गया। किन्तु वैसे ही गोली स्वामी श्रद्धानन्द ने भी खाई थी, किसलिए खाई थी? हिंदुओं को हिन्दू बनाए रखने के लिए खाई थी। परन्तु हिन्दू समाज ने या हमारी सरकारों ने उस महामानव को बदले में क्या दिया? उनकी स्मृति में तिनके भर का भी सम्मान आज तक उनको मिला? नहीं मिला। भारत में जो सम्मान मोहन दास गांधी को दिया गया, उसका एक प्रतिशत भी स्वामी श्रद्धानन्द को नहीं दिया गया। उसका परिणाम आज हिंदू भोग रहा है। स्वामी श्रद्धानन्द ने जो चेतावनी सौ वर्ष पहले हिंदू समाज को दी थी। आज वह सच साबित हो रही है। आज ‘हिन्दू’ भारत के कई राज्यों और जिलों में अल्पसंख्यक हो गया है। क्योंकि शुद्धि का जो जिम्मा स्वामी श्रद्धानद ने उठाया था। उसको हमने ठंडे बस्ते में डाल दिया। भारत ने मोहन दास गांधी को चुना और तुष्टिकरण की नीति सफल हो गई और स्वामी श्रद्धानन्द की उपेक्षा की और उसका परिणाम आज प्रत्यक्ष रूप में हमारे सामने है। स्वामी श्रद्धानन्द ने अपनी दूर दृष्टि से यह देख लिया था कि भारत जिस प्रकार से अंग्रेजो से लड रहा है वह आज नहीं तो कल अंग्रेजों से भौगोलिक आधार पर स्वतंत्रता प्राप्त कर ही लेगा। परन्तु जो हिन्दू जनमानस इस्लाम और क्रिश्चियनिटी के द्वारा निरंतर विधर्मी हो रहा है उसे कौन बचायेगा? आखिर स्वामी श्रद्धानन्द की बात सच साबित हुई। वास्तव में हम अंग्रेजों से स्वतंत्र तो हो गए पर धर्मांतरण का खेल निरंतर जारी रहा। हमारा सारा पूर्वोत्तर भारत ईसाइयों ने ले लिया। इस्लाम वालों ने कश्मीर ले लिया केरल ले लिया असम और बंगाल लेने के कगार पर हैं। बाकी राज्यों के हमारे सैकड़ो जिले और हजारों गांव जा चुके हैं।

स्वामी श्रद्धानन्द ने जब शुद्धि आन्दोलन का बिगुल फूँका था तो इस्लामियों के कान खड़े हो गए थे। उनको अंग्रेजों से भी अधिक स्वामी श्रद्धानन्द अपना शत्रु दिखने लगा था। क्योंकि जिस तरह से स्वामी श्रद्धानन्द हिंदू मुस्लिम एकता के साथ-साथ, विधर्मी बन चुके हमारे भाइयों को पुनः वैदिक धर्म में लाने का प्रयास कर रहे थे, उससे सारे मौलानाओं की नींद हराम हो चुकी थी और जब उन्होंने जमा मस्जिद की मीनार से वेद मन्त्रों को पढ़ा और वहाँ से हुँकार भरी तो मानो कट्टर इस्लामियत की नीव हिल गई। उनको लगने लगा यह तो हमारे मीनार से हमें ही समाप्त करने की बात कर रहा है। यदि स्वामी श्रद्धानन्द जीवित रहा तो सारा भारत वैदिक धर्मी हो जाएगा और बाबर से लेकर के बहादुर शाह तक जितनी मेहनत उन्होंने की थी उस पर पानी फिर जाएगा। स्वामी श्रद्धानन्द को हटाने के लिए, आर्य समाज को परास्त करने के लिए तथा शुद्धि हिंदू महासभा को हटाने के लिए उन्होंने १९२६ ई. में तबलीगी जमात की स्थापना की। और मौलानाओं में जो सबसे कट्टर प्रचारक होते हैं, जो मीशनरी भी होते हैं, जो इस्लाम के लिए जीते मरते हैं। जो २४ घंटे इस्लाम का प्रचार कर सकते हैं। ऐसे लोगों को तबलीगी जमात में भर्ती कराया जाने लगा। उसी तबलीगी जमात ने ही स्वामी श्रद्धानन्द की हत्या का षड्यंत्र रचा था। सन् १९२६ ई. में हमारा स्वाभिमानी परम पुरुष शुद्धि आंदोलन का पुरोधा धराशाई कर दिया गया। आज लगभग तबलीगी जमात को भी लगभग सौ वर्ष पूर्ण हो रहे हैं और स्वामी श्रद्धानन्द के बलिदान को भी सौ वर्ष पूर्ण हो रहे हैं। तबलीगी जमात ने सौ वर्ष पूर्ण होने पर भोपाल में ऐतिहासिक कार्यक्रम रखा। जिसमें देश-विदेश से १४ लाख तबलीगी जमात के कार्यकर्ता इकट्ठे हुए थे। उनका वह कार्यक्रम अब आगामी बंगाल में होने जा रहा है। मैं हिंदुओं से पूछना चाहता हूं कि तबलीगी जमात के समकक्ष में आप स्वामी श्रद्धानन्द को श्रद्धांजलि देने के लिए क्या एक लाख लोग इकट्ठे हो पाओगे?

किन्तु मैं इस बलिदान वर्ष पर बात मुस्लिम धर्मान्तरण की नहीं अपितु पंजाब के संदर्भ में ईसाई धर्मान्तरण की करना चाहता हूँ। भारत के सवर्ण और कुलीन समाज वाले लोग जिन ईसाई मिशनरियों को यह कहते थे कि यह तो सिर्फ आदिवासी और दलित समाज को ही अपना शिकार बना पाते हैं और वे केवल दलित अंचलों में ही कार्य कर रहे हैं। तो आज उन्हें आँख खोलकर देखना चाहिए कि वे पंजाब और हरियाणा जैसे राज्य के सबसे संप्रभुता वाले कुलीन और सम्भ्रान्त परिवारों को विशेष कर पगड़ी धारी सिख समाज को खुले आम क्रिप्टो इसाई बना रहे हैं।

२०११ ई. की जनगणना के अनुसार पंजाब में ईसाई आबादी कुल जनसंख्या का १.२६% थी (लगभग ३.५ लाख), लेकिन (२०२४-२५) में किये गये कई सर्वे के अनुसार, ये धर्मांतरण कुल आबादी का १०-१५% या उससे अधिक तक पहुँच सकता है। पूरे पंजाब में आज यदि ईसाई धर्म प्रचारकों की बात करें तो हाल ही में इंडिया टुडे द्वारा प्रकाशित की गई रिपोर्ट में कहा गया है कि अनुमान के मुताबिक यहाँ पादरियों की संख्या ६५,००० के करीब है। ईसाइयों की संस्था “यूनाइटेड क्रिश्चियन फ्रंट” के अनुसार पंजाब के १२,००० गाँवों में से ८००० गाँवों में ईसाई धर्म की मजहबी रजिस्टर्ड समितियाँ कार्य कर रही हैं। वहीं अमृतसर और गुरदासपुर जिलों में 4 ईसाई समुदायों के ६००-७०० चर्च हैं। इनमें से ६०-७०% चर्च पिछले ५ सालों में अस्तित्व में आए हैं। जालंधर जिले के खाँबड़ा नामक गाँव में बने चर्च में प्रत्येक रविवार को प्रार्थना करने के लिए १०-१५ हजार लोग मोटर साइकिल से लेकर कारों और किराए की स्कूली बसों में आते हैं।

इंडिया टुडे की कवर स्टोरी के अनुसार, खाँबडा गाँव में हजारों लोगों के जमा होने के पीछे जो व्यक्ति है उसका नाम है – पादरी अंकुर नरूला। अंकुर का जन्म हिंदू खत्री परिवार में हुआ था। लेकिन, साल २००८ में ईसाई मिशनरियों के संपर्क में आने के बाद उसने धर्मांतरण कर लिया। इसके बाद उसने अंकुर नरूला मिनिस्ट्री की स्थापना की और फिर ‘चर्च ऑफ साइंस एंड वंडर्स’ भी शुरू कर दिया। दावा किया जा रहा है कि यहाँ निर्माणाधीन चर्च का निर्माण पूरा होने के बाद यह एशिया के सबसे बड़ा चर्च होगा। शुरुआत में इस चर्च से जुड़े लोगों की संख्या महज ३ थी। लेकिन, बीते १४ सालों में यह संख्या ३ लाख के आँकड़े को पार कर चुकी है। अंकुर नरूला ने खाँबड़ा गाँव में ६५ एकड़ से अधिक क्षेत्र में धर्मांतरण का साम्राज्य स्थापित किया हुआ है। इसके अलावा पंजाब के नौ जिलों व बिहार और बंगाल के साथ ही अमेरिका, कनाडा, जर्मनी और ग्रेटर लंदन के हैरो में भी उसके ठिकाने हैं। अंकुर नरूला को उसकी मिनिस्ट्री से जुड़े हुए लोग या यह कहें कि धर्मांतरण का शिकार हुए लोग उसे ‘पापा’ बुलाते हैं।

आज यदि मैं इस धर्मान्तरण की आंधी के आगे आर्यसमाज और हिन्दू संगठन के प्रचारकों की बात करूँ तो वह नगण्य हैं। क्योंकि हमारे में वो जुनून नहीं है, अपने भाइयों को बचाने के लिए कोई तड़प नहीं है। और जो जा चुके हैं उसको वापस लाने का कोई योजना भी नहीं है। हमने यह सोच लिया है कि जो महामूर्ख होगा, लोभी होगा, वह ईसाई बन जाएगा और अपने आप फल भोगेगा उसमें हमारी क्या जरूरत है? आज नहीं तो कल उसे जब समझ में आएगा तो वह अपने आप वापस आ जाएगा। बस पूरे भारत भर में हिन्दुओ की यही मनोदशा है और वह मूकदर्शक बनकर देख रहा है। हमारे भाई विधर्मी बनने पर हमें कोई चोट नहीं लगती। हमें सदियों की गुलामी ने मानसिक धरातल पर गुलाम ही रखा हुआ है। क्योंकि हिन्दू जाति आज भी गुलामी के लिए अभिशप्त है। इसे आजतक अपने शत्रु और मित्र की पहचान नहीं है। हिन्दू आज भी शत्रु बोध से शून्य है।

हमें लगता था कि इन सोए हुए हिन्दुओं में कुछ आर्य लोग और एकाध हिन्दू संगठन के लोग जागरूक हैं। पर बात जब धर्मान्तरण को रोकने की आती है तो इनमें भी निन्यानबे प्रतिशत लोग सोए हुए हैं, इन्हें भी कोई मतलब नहीं है। और हिम्मत भी नहीं है, क्योंकि मुस्लिमो से ईसाईयों से नुकसान का खतरा क्यो मोल लें? जब अपने कर्त्तव्य की खाना पूर्ति उत्सव, श्रावणी, सम्मेलन आदि से खूब अच्छा चल रही है, तो श्रद्धानन्द जी जैसी मूर्खता क्यो करें? बिना मतलब “आ बैल मुझे मार” क्यों करें? जो जा रहा है तो जाने दो, विधर्मी बना रहा हैं तो बनने दो। मुझे इससे क्या? मैं आर्य समाज का मंत्री और प्रधान होने के नाते इस विपत्ति में क्यों पडूँ? यह तो आर्य प्रतिनिधि सभा का काम है। एक आर्य प्रतिनिधि सभा का प्रधान और मंत्री होने के नाते मैं यह सोचता हूँ कि हमारा संगठन तो मरा हुआ है, दो-दो सभाएं बन गई है। सभी आर्य समाज हमारा साथ कहाँ देती हैं? सभी आर्य समाजे हमें अपना अनुदान कहाँ देती है? और मैं यहां पर कोई विपत्ति में पडने के लिए थोड़ी आया हूँ? मैं तो लोकेष्णा, मंच, माला की वजह से यहां पर हूँ। जब दूसरे लोगों को कोई चिंता नहीं है तो मैं अकेला चिंता क्यों करूं? सार्वदेशिक के हिसाब से भी यदि देखा जाए तो हमने शुद्धि के लिए क्या किया? इसके लिए हमने कब कमेटी बनाई? कितने प्रचारको और विद्वानों को वैतनिक या अवैतनिक रुप से नियुक्त किया? उनकी वर्ष भर की क्या रिपोर्ट है? क्या इस प्रकार से सोचा जा रहा है‌? या कोई ठोस कार्य किया जा रहा है? आज यदि बात सिर्फ पंजाब की भी की जाए तब भी हम देखते हैं वहाँ हमने सब भगवान के भरोसे सब छोड दिया है। पंजाब में कितनी आर्यसमाजें हैं और कितनी आर्यसंस्थायें गुरुकुल और डी ए वी और आर्य विद्यालय चल रही हैं। क्या वे लोग इस दिशा में कुछ सोच रहें हैं?

यही सवाल मैं भारत भर के सभी आर्य समाज और आर्य संस्थानों, आर्य प्रति निधि सभाओं से पूछना चाहता हूँ? क्या हमने स्वामी श्रद्धानन्द के कार्यों को आज के समय में अप्रासंगिक और महत्वहीन मान लिया है? या यह मान लिया है कि यह किया जाना संभव नहीं है। स्वामी श्रद्धानन्द ने तो दो महत्वपूर्ण कार्यों के लिए अपना जीवन खपा दिया। प्रथम गुरुकुल और दूसरा शुद्धि आंदोलन उन्होंने शिक्षा क्षेत्र में महान कार्य किया फिर जीवन के अंतिम समय में उन्होंने शुद्धि का बहुत बीड़ा उठाया था और उसी के लिए उन्होंने बलिदान दिया था। यदि वर्तमान समय में पूरे भारत भर की आर्य समजों को देखा जाए तो हम शुद्धि के मामले में नगण्य कार्य कर रहे हैं और इसको हमने पूरी तरह से ठंडे बस्ते में डाल दिया है। मैं पूछना चाहता हूँ कि क्या ऐसी ही बेरुखी पूर्ण श्रद्धांजलि हम स्वामी श्रद्धानंद जी को उनके सौवें बलिदान दिवस पर देना चाहते हैं?

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आर्य समाज में शुद्धि का मतलब सिर्फ इतना है कि कोई ईसाई या मुसलमान प्रोफेशनल तरीके से कुछ करने के लिए जैसे विवाह आदि के लिए या कोई अड़चन के कारण यदि हिंदू होना चाहता है तो आर्य समाज में उसे कुछ रुपए लेकर के एक सर्टिफिकेट दे दिया जाता है, बस यही आर्य समाज में शुद्ध का मतलब रह गया है। कई आर्य समाज के लोग तो इतना करने के लिए भी डरते हैं और उन्हें वापस भेज देते हैं सामूहिक रूप से निशुल्क रूप से बड़े-बड़े शुद्धि के आयोजन करने की बात तो बहुत दूर है और जो हिन्दू, ईसाई और मुसलमान बन चुके हैं, उनको वापस लाना तो सपने में भी नहीं सोचा जाता होगा। स्वामी श्रद्धानन्द जी के शुद्धि आंदोलन परम्परा की बस हम आर्यों की यही भूमिका रह गई है। इक्का दुक्का कोई व्यक्ति शुद्धि का कार्य कर रहा है तो बात अलग है, पर उससे कुछ फायदा होता हुआ नहीं दिख रहा है, क्योंकि उससे कोई बड़ा संदेश तो विधर्मियों को पहुंच नहीं पा रहा है। और लड़ाई यदि लड़नी है तो निर्णायक लड़नी पड़ती है। नहीं तो उसका कोई महत्व नहीं है।

कभी पंजाब आर्यप्रतिनिधि सभा के पास दो सौ उपदेशक रहा करते थे। आज कितने है‌? आज इस धर्मान्तरण से लड़ने के लिए सभा के पास क्या योजना है? पंजाब में स्थित कितनी आर्य समाजें है जो धर्मांतरण को रोकने के लिए शुद्धि का चक्र चल रही है? क्या आज हमारे आर्य समाज में इस पर विचार होता है? विगत २०२४-२५ में हमने कितनों की घर वापसी करवाई? कितनों को विधर्मी होने से बचाया? क्या आर्य समाज के अंतरंग बैठक के एजेंडे में धर्मांतरण कभी एजेंडा बन पाता है? मैं सैकड़ो आर्य समाजों से जुड़ा हुआ हूँ और देखता रहता हूँ, मुझे तो कभी भी किसी भी आर्य समाज में शुद्धि से संबंधित एक भी गंभीर कार्यक्रम करते हुए मैंने तो नहीं देखा। इसका स्वाभाविक कारण है डर, मैं समझता हूं कि स्वामी श्रद्धानन्द की हत्या करने वालों ने केवल उनके नश्वर शरीर को नहीं मारा, अपितु उन्होंने उनके उत्तराधिकारियों आर्यों और हिंदुओं के अंदर में सैकड़ो साल के लिए वह डर भी भर दिया है और इसमें उनको सफलता भी मिल रही है, क्योंकि सौ साल के बाद भी आज हम डरे हुए हैं। हाँ कोई व्यक्ति यह कह सकता है कि बात डर की नहीं है बात शिथिलता की है, यह भी हो सकता है। पर मैंने तो जो देखा जो अनुभव किया वही लिख रहा हूँ।

स्वामी श्रद्धानन्द का जन्म २२ फरवरी, १८५६ ई. को पंजाब के जालन्धर जिले के तलवन गाँव में हुआ था। उनकी शुरुआती शिक्षा बनारस और लाहौर (तत्कालीन पंजाब) में हुई। स्वामी दयानन्द सरस्वती से मिलने के बाद उनका जीवन ही बदल गया फिर उनका उद्देश्य और लक्ष्य आर्य समाज के मंतव्य में निहित हो गया, पंजाब में आर्य समाज के विस्तार में उनका महत्वपूर्ण योगदान दिया। आज स्वामी श्रद्धानन्द की जन्मभूमि पंजाब में जिस प्रकार से ईसाई मत का बोलबाला हो रहा है, उसे देख कर मुझे बिल्कुल भी सहन नहीं होता कि पंजाब की जालंधर भूमि ने जो शेर पैदा किया था जिसने शुद्धि की एक बयार चलाई थी। आज उसकी वह भूमि ईसाइयों की गढ़ बन चुकी है। वहाँ पर एशिया का सबसे बड़ा चर्च बन रहा है। आर्यो विचार करना कि कहाँ कमी रह गई है। क्या हम आर्य लोग स्वामी श्रद्धानन्द के सौवें बलिदान दिवस पर धर्मांतरण को रोकने के लिए और शुद्धि अभियान को तेज करने के लिए कुछ ठोस योजना का प्रारंभ करके सच्चे अर्थों में उस बलिदानी, हुतात्मा के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित कर सकते हैं?

श्रद्धानन्द के वीर चल उठ, और भगा इन विधर्मियो को।
तुझे कसम है तेरे पूर्वजों की, तू ललकार इन बुझदिलों को।।

आचार्य राहुलदेवः
आर्यसमाज बडाबाजार
कोलकाता
२३/१२/२०२५ ई.

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