डायबिटीज़ अब भारत में एक मौन महामारी का रूप ले चुकी है, लेकिन विडंबना यह है कि न समाज इसे गंभीरता से ले रहा है, न ही नीतिगत स्तर पर इसे वह प्राथमिकता मिल पा रही है जिसकी यह मांग करती है। यह रोग धीरे-धीरे शरीर को खोखला करता है और अंततः व्यक्ति, परिवार तथा स्वास्थ्य व्यवस्था—तीनों को आर्थिक और सामाजिक संकट में धकेल देता है।
आज देश में लाखों लोग डायबिटीज़ से ग्रस्त हैं, जिनमें एक बड़ा वर्ग कामकाजी उम्र का है। इसका अर्थ है—उत्पादकता में गिरावट, स्वास्थ्य व्यय में वृद्धि और परिवारों पर बढ़ता आर्थिक बोझ। बावजूद इसके, हमारी स्वास्थ्य नीतियाँ आज भी इलाज-केंद्रित हैं, रोकथाम-केंद्रित नहीं।
डायबिटीज़ की जड़ें हमारी जीवनशैली में हैं—असंतुलित आहार, अत्यधिक चीनी और वसा का सेवन, शारीरिक निष्क्रियता, तनाव और नींद की कमी। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या नीति-निर्माण इन कारणों को संबोधित कर रहा है? जंक फूड और मीठे पेय पदार्थों की खुलेआम उपलब्धता, भ्रामक विज्ञापन और स्कूलों तक में अस्वास्थ्यकर खान-पान की पहुँच—यह सब नीतिगत उदासीनता का प्रमाण है।
अब समय आ गया है कि डायबिटीज़ को केवल “व्यक्तिगत लापरवाही” कहकर पल्ला न झाड़ा जाए। यह एक नीतिगत विफलता भी है। आवश्यकता है कि सरकार इस बीमारी को राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राथमिकताओं में शीर्ष पर रखे।
नीतिगत स्तर पर कुछ ठोस कदम अनिवार्य हैं।
पहला, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर नियमित और निःशुल्क ब्लड शुगर जाँच को अनिवार्य किया जाए, विशेषकर 30 वर्ष से अधिक आयु वर्ग के लिए।
दूसरा, जंक फूड और शक्कर युक्त पेय पदार्थों पर कड़ा कर (Tax) लगाया जाए और उनके विज्ञापनों पर सख़्त नियंत्रण हो।
तीसरा, स्कूल पाठ्यक्रम में स्वास्थ्य और पोषण शिक्षा को अनिवार्य किया जाए, ताकि बचपन से ही सही आदतें विकसित हों।
चौथा, शहरी नियोजन में पार्क, पैदल पथ और व्यायाम के सार्वजनिक स्थानों को अनिवार्य किया जाए, ताकि सक्रिय जीवनशैली को बढ़ावा मिले।
पाँचवां, कार्यस्थलों पर निवारक स्वास्थ्य कार्यक्रम और नियमित स्वास्थ्य जाँच को प्रोत्साहित किया जाए।
साथ ही, यह भी आवश्यक है कि डायबिटीज़ से जुड़ी दवाएँ और जाँच आम आदमी की पहुँच में हों। महँगा इलाज और निजी स्वास्थ्य व्यवस्था पर निर्भरता इस समस्या को और गंभीर बना रही है।
डायबिटीज़ को नियंत्रित करना केवल डॉक्टरों की ज़िम्मेदारी नहीं है। यह नीति-निर्माताओं, शैक्षणिक संस्थानों, मीडिया और समाज—सभी की साझा जिम्मेदारी है। यदि आज ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में यह बीमारी देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को भीतर से खोखला कर देगी।
अब भी समय है—चेतने का, बदलने का और नीतियों को जीवन के पक्ष में खड़ा करने का। क्योंकि एक स्वस्थ नागरिक ही सशक्त राष्ट्र की असली पूँजी होता है।
