
आर पी तोमर
नई दिल्ली, 20 दिसम्बर।
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि हाईकोर्ट, जो समानता और निष्पक्षता की रक्षा के लिए संवैधानिक अदालतें हैं, उन्हें अपने प्रशासनिक कामकाज में भी इन मूल्यों का पालनकरना चाहिए और ‘आदर्श नियोक्ता’ की मिसाल पेश करनी चाहिए। जस्टिस जेके महेश्वरी और विजय बिश्नोई की पीठ ने यह टिप्पणी इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा कुछ कर्मचारियों के नियमितीकरण से इनकार से जुड़े मामलों पर फैसला सुनाते हुए की। अदालत ने कहा कि समान परिस्थितियों में काम कर रहे अन्य कर्मचारियों को नियमित किया गया, जबकि अपीलकर्ताओं को बिन किसी उचित कारण के इससे वंचित रखा गया, जिससे उन्हें गंभीर नुकसान हुआ। पीठ ने कहा कि एक ही संस्थान में समान स्थिति वाले कर्मचारियों के साथ भेदभाव संविधान के अनुच्छेद 14, 16 और 21 में निहित गैर-मनमानी और तर्कसंगतता के सिद्धांतों के लिए गंभीर खतरा है।
अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसे कदम न्याय के मूल उद्देश्य को कमजोर करते हैं।सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि अपीलकर्ताओं को उनके पूर्व पदों पर बहाल किया जाए और नियुक्ति की तारीख से एक वर्ष पूरा होने के बाद उनकी सेवाओं को नियमित किया जाए। हालांकि, जिस अवधि में वे सेवा से बाहर रहे, उसके लिए वेतन नहीं मिलेगा, लेकिन वरिष्ठता, पदोन्नति, वेतन निर्धारण, वेतनवृद्धि और सेवानिवृत्ति लाभ जैसे सभी परिणामी लाभ दिए जाएंगे। अदालत ने हाईकोर्ट प्रशासन को आठ सप्ताह के भीतर आदेश का पालन करने का निर्देश दिया। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि यह फैसला इन मामलों की विशिष्ट परिस्थितियों तक सीमित है और इसे मिसाल के रूप में नहीं लिया जाएगा। मामले में हाईकोर्ट की ओर से यह तर्क दिया गया था कि नियमितीकरण कर्मचारी का अधिकार नहीं है और संबंधित पद अब ‘डेड कैडर’ बन चुका है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कृत्रिम भेद पैदा कर समान कर्मचारियों को अलग-अलग मानना, वही भेदभाव है जिसे न्याय के हित में समाप्त किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने चेक बाउंस से जुड़े एक मामले में अहम फैसला सुनाते हुए पटना हाईकोर्ट के उस आदेश को रद कर दिया, जिसमें आपराधिक कार्यवाही को खारिज कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि मुकदमे से पहले के चरण में हाईकोर्ट ने अनावश्यक और विस्तृत जांच कर गलती की, जबकि शुरुआती स्तर पर अदालत को केवल ये देखना होता है कि शिकायत और उसके समर्थन में दिए गए तथ्यों से पहली नजर में मामला बनता है या नहीं। जस्टिस मनोज मिश्रा और उज्जल भुइयां की पीठ ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 482 के तहत अधिकारों का प्रयोग करते हुए हाईकोर्ट यह जांचने लगा कि चेक किसी कर्ज या देनदारी के भुगतान के लिए जारी किया गया था या नहीं, जो इस स्तर पर उचित नहीं था। पीठ ने नेगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स एक्ट और सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि अगर शिकायत में धारा 138 के आवश्यक तत्व पहली नजर में मौजूद हों, तो न तो समन आदेश और न ही शिकायत को मुकदमे से पहले रद किया जा सकता है। यह फैसला जून 2019 के पटना हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ दायर अपील पर आया है। मामले में शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया था कि सामान की आपूर्ति के बदले दिया गया 20 लाख रुपये का चेक बाउंस हो गया। मजिस्ट्रेट ने इस पर संज्ञान लेते हुए आरोपी को धारा 138 के तहत समन जारी किया था। हालांकि, आरोपी ने समन आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी, जिसके बाद हाईकोर्ट ने यह कहते हुए कार्यवाही रद कर दी कि चेक किसी कर्ज या देनदारी के भुगतान के लिए जारी नहीं किया गया था। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शुरुआती स्तर पर अदालत को केवल यह देखना होता है कि शिकायत और उसके समर्थन में दिए गए तथ्यों से पहली नजर में मामला बनता है या नहीं। केवल असाधारण परिस्थितियों में ही कार्यवाही रद की जा सकती है।
अंतत: अपील स्वीकार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद कर दिया और मामले को संबंधित मजिस्ट्रेट की अदालत में बहाल कर दिया। साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उसने इस मुद्दे पर कोई राय नहीं दी है कि संबंधित चेक वास्तव में कर्ज या देनदारी चुकाने के लिए जारी किया गया था या नहीं।