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विद्युत (संशोधन) विधेयक 2025 और समय- आधारित (टाइम-ऑफ़-डे) टैरिफ-नियम, नीति और राष्ट्रीय ऊर्जा सुधार की नई दिशा-एक समग्र अंतरराष्ट्रीय- स्तरीय विश्लेषण

by Page 3 News International Desk
December 14, 2025
in Hindi Editorials
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आज की दुनियाँ में पैसा अतिआवश्यक है। लेकीन मन का संतोष, प्रसन्नता उससे भी अधिक आवश्यक है,

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विकसित भारत 2047 और सुशासन का संकट: -निर्धारित ड्रेसकोड पहचान पत्र नदारद- अनुशासन,जवाबदेही और प्रशासनिक संस्कृति का वैश्विक परिप्रेक्ष्य -एक समग्र विश्लेषण

टाइम-ऑफ-डे टैरिफ वह व्यवस्था है जिसमें बिजली की कीमत इस बात पर निर्भर करती है कि बिजली किस समय उपयोग की जा रही है

विज़न 2047 में टाइम-ऑफ-डे टैरिफ व्यवस्था भारत को न केवल ऊर्जा दक्ष बनाएगी, बल्कि उसे वैश्विक ऊर्जा संक्रमण की मुख्यधारा में भी स्थापित करेगी- एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत का बिजली क्षेत्र अब एक ऐतिहासिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है।दशकों तक देश में बिजली बिलिंग की प्रणाली मुख्यतःयूनिट-आधारित रही, जहाँ उपभोक्ता द्वारा खपत की गई कुल बिजली के आधार पर शुल्क तय होता था,समय का कोई विशेष महत्व नहीं होता था। किंतु बदलती ऊर्जा आवश्यकताओं बढ़ती मांग, नवीकरणीय ऊर्जा केविस्तार और ग्रिड प्रबंधन की जटिलताओं ने इस परंपरागत मॉडल को अप्रासंगिक बना दिया है।इसी पृष्ठभूमि में भारत सरकार और विद्युत नियामक संस्थाओं ने समय आधारित बिजली टैरिफ (टाइम ऑफ़ डे टैरिफ़) को लागू करने का संभावित निर्णय की और अग्रसर है, जिसके तहत दिन, रात, सुबह और शाम अलग -अलग दरों पर बिजली बिल लगेगा। यह प्रणाली अगले 3 से 6 महीनों में चरणबद्ध तरीके से पूरे देश में लागू की जा रही है।यह परिवर्तन कोई तात्कालिक प्रशासनिक निर्णय नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक सुदृढ़ कानूनी ढांचा, राष्ट्रीय ऊर्जा नीति, टैरिफ नीति संशोधन,और अंतरराष्ट्रीय अनुभवों पर आधारित रणनीति है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि विद्युत (संशोधन) विधेयक, 2025 को आधुनिक बिजली व्यवस्था की आवश्यकता और ऊर्जा संक्रमण की राष्ट्रीय रणनीति के अनुरूप तैयार किया गया एक प्रमुख सुधारात्मक प्रस्ताव है। इसका उद्देश्य वितरण क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ाना,नियामकीय ओवरसाइट सुदृढ़ करना और उपभोक्ताओं को उनकी वास्तविक खपत के अनुसार भुगतान के लिए प्रेरित करना है।विधेयक की यह नींव पारंपरिक यूनिफ़ॉर्म-टैरिफ मॉडल से हटकर मांग-आधारित समय- संवेदी कीमत निर्धारण की ओर ले जाने का एक महत्त्वपूर्ण कदम है,जिसका सबसे निर्णायक उपकरण समय-आधारित टैरिफ है।विधेयक की प्रमुख धारणाएँ, टीओडी टैरिफ का वैज्ञानिक व आर्थिक तर्क, कार्यान्वयन चुनौतियाँ स्मार्ट मीटरिंग और ग्रिड-समर्थन तकनीकों की भूमिका, उपभोक्ता-प्रभाव (वंचित वर्गों सहित) मीडिया में उपलब्ध जानकारी के सहयोग से इस आर्टिकल के माध्यम से हम इसका विश्लेषण करेंगे।
साथियों बात अगर हम टाइम- ऑफ-डे टैरिफ क्या है और इसकी आवश्यकता क्यों पड़ी? इसको समझने की करें तो, टाइम -ऑफ-डे टैरिफ वह व्यवस्था है जिसमें बिजली की कीमत इस बात पर निर्भर करती है कि बिजली किस समय उपयोग की जा रही है। उदाहरण के लिए,जब बिजली की मांग अत्यधिक होती है,जैसे शाम 6 बजे से रात 10 बजे तक,उस समय दरें अधिक होंगी। वहीं जब मांग कम होती है,जैसे देर रात या दोपहर,तब बिजली सस्ती होगी। भारत में बिजली की मांग दिन के अलग- अलग समय पर अत्यंत असमान रहती है। पीक आवर्स में ग्रिड पर भारी दबाव पड़ता है,महंगे पावर प्लांट चालूकरने पड़ते हैं और कभी-कभी बिजली कटौती तक करनी पड़ती है। इसके विपरीत ऑफ-पीक समय में उत्पादन क्षमता का बड़ा हिस्सा निष्क्रिय रहता है।टीओडी टैरिफ का उद्देश्य मांग को संतुलित करना, ग्रिड स्थिरता बढ़ाना,और उपभोक्ताओं को समय के अनुसार खपत बदलने के लिए प्रेरित करना है।भारत में बिजली क्षेत्र का मूल कानूनी ढांचा विद्युत अधिनियम, 2003 (इलेक्ट्रिसिटी एक्ट,2003) है। यह अधिनियम केंद्र और राज्य दोनों सरकारों को बिजली उत्पादन, वितरण और टैरिफ निर्धारण के लिए व्यापक अधिकार देता है। अधिनियम की धारा 61 और 62 विशेष रूप से टैरिफ निर्धारण से संबंधित हैं, जिनमें कहा गया है कि टैरिफ आर्थिक दक्षता, उपभोक्ता हित, और संसाधनों के कुशल उपयोग को ध्यान में रखते हुए तय किया जाएगा।समय आधारित टैरिफ इसी अधिनियम की भावना के अनुरूप है, क्योंकि यह बिजली संसाधनों के बेहतर उपयोग और लागत-आधारित मूल्य निर्धारण को प्रोत्साहित करता है।अधिनियम किसी एक समान दर की बाध्यता नहीं लगाता, बल्कि नियामक आयोगों को नवाचार की स्वतंत्रता देता है।
साथियों बात अगर हम राष्ट्रीय टैरिफ नीति 2016 और 2023 संशोधन की भूमिका इसको समझने की करें तो, टाइम -ऑफ-डे टैरिफ को वास्तविक रूप से अनिवार्य बनाने का कार्य राष्ट्रीय टैरिफ नीति (टैरिफ़ पालिसी ) के माध्यम से किया गया। 2016 की टैरिफ नीति में पहली बार संकेत दिया गया कि बड़े उपभोक्ताओं के लिए समय आधारित टैरिफ अपनाया जाना चाहिए। किंतु यह प्रावधान सीमित और वैकल्पिक था।वास्तविक परिवर्तन 2023 में किए गए टैरिफ नीति संशोधन से आया। इस संशोधन में स्पष्ट रूप से कहा गया कि,डिस्कॉम को सभी उपभोक्ताओं के लिए चरणबद्ध तरीके से टाइम ऑफ़ डे टैरिफ़ लागू करना होगा।(1) स्मार्ट मीटर वाले उपभोक्ताओं के लिए यह व्यवस्था प्राथमिकता से लागू की जाएगी।(2)राज्य विद्युत नियामक आयोगों को पीक और ऑफ-पीक घंटों की अधिसूचना करनी होगी।यह संशोधन ही वह प्रत्यक्ष नीति आधार है जिसके तहत अब देशभर में दिन-रात के हिसाब से बिजली दरें तय की जा रही हैं।
साथियों बात अगर हम राष्ट्रीय विद्युत नीति और ऊर्जा संक्रमण का संदर्भ,राज्य विद्युत नियामक आयोगों की भूमिका,इसको समझने की करें तो,भारत की राष्ट्रीय विद्युत नीति का मूल उद्देश्य सस्ती, विश्वसनीय और सतत बिजली उपलब्ध कराना है।नीति यह स्वीकार करती है कि भविष्य की ऊर्जा व्यवस्था में सौर और पवन ऊर्जा की हिस्सेदारी लगातार बढ़ेगी। चूंकि ये स्रोत समय-निर्भर होते हैं, इसलिए पारंपरिक फ्लैट टैरिफ उनके अनुकूल नहीं है।दिन में जब सौर ऊर्जा प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती है, उस समय बिजली सस्ती होनी चाहिए। वहीं रात में, जब सौर उत्पादन नहीं होता, दरें स्वाभाविक रूप से अधिक होंगी। टीओडी टैरिफ इसी तार्किक ऊर्जा संतुलन को लागू करता है।टाइम-ऑफ-डे टैरिफ बिना स्मार्ट मीटर के संभव नहीं है। इसी कारण भारत सरकार ने रीवैंप्ड डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर स्कीम (आरडीएसएस) के तहत करोड़ों स्मार्ट मीटर लगाने का लक्ष्य रखा है। स्मार्ट मीटर उपभोक्ता की बिजली खपत को रियल-टाइम में रिकॉर्ड करते हैं और यह बताने में सक्षम होते हैं कि किस समय कितनी बिजली उपयोग हुई।आरडीएसएस योजना का एक प्रमुख उद्देश्य ही यह है कि टैरिफ को डायनेमिक, पारदर्शी और तकनीक-आधारित बनाया जाए।टीओडी टैरिफ इसी योजना का स्वाभाविक परिणाम है।राज्य विद्युत नियामक आयोगों की भूमिका-हालाँकि नीति और दिशा -निर्देश केंद्र सरकार तय करती है, लेकिन वास्तविक टैरिफ निर्धारण का अधिकार राज्य विद्युत नियामक आयोगों के पास होता है। प्रत्येक राज्य अपने भौगोलिक, आर्थिक और खपत पैटर्न के अनुसार पीक और ऑफ-पीक समय निर्धारित करेगा।इसका अर्थ यह है कि दिल्ली, महाराष्ट्र, तमिलनाडु या उत्तर प्रदेश में पीक आवर्स अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन मूल सिद्धांत समान रहेगा -भीड़ वाले समय में महंगी बिजली और खाली समय में सस्ती बिजली।
साथियों बात अगर हम अंतरराष्ट्रीय अनुभव और भारत की स्थिति इसको समझने की करें तो,टाइम-ऑफ-डे टैरिफ कोई भारतीय प्रयोग नहीं है। अमेरिका,यूरोप,ऑस्ट्रेलिया,जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में यह प्रणाली वर्षों से लागू है। इन देशों के अनुभव बताते हैं कि टीओडी टैरिफ से(1)पीक डिमांड में 10-20प्रतिशत तक कमी आई (2) ग्रिड फेल्योर और ब्लैकआउट की घटनाएँ घटीं (3) उपभोक्ताओं की ऊर्जा दक्षता बढ़ी,भारत अब उसी वैश्विक ऊर्जा सुधार पथ पर आगे बढ़ रहा है, लेकिन अपने सामाजिक- आर्थिक संदर्भ को ध्यान में रखते हुए।उपभोक्ताओं पर प्रभाव, अवसर और चुनौतियाँ,इस नई प्रणाली से उपभोक्ताओं को यह समझना होगा कि बिजली अब केवल कितनी नहीं, बल्कि कब उपयोग की जा रही है। जो उपभोक्ता वॉशिंग मशीन, पानी की मोटर, चार्जिंग और अन्य भारी उपकरण ऑफ-पीक समय में चलाएंगे, उनके बिल कम होंगे।हालाँकि शुरुआती दौर में जागरूकता की कमी, तकनीकी समझ और व्यवहारिक बदलाव चुनौती बन सकते हैं। इसलिए नीति में स्पष्ट किया गया है कि टीओडी टैरिफ क्रमिक रूप से लागू किया जाएगा, न कि एक झटके में।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि नियम आधारित सुधार,न कि तात्कालिक निर्णय,भारत में समय आधारित बिजली टैरिफ किसी एक आदेश या घोषणा का परिणाम नहीं है। यह विद्युत अधिनियम, 2003, राष्ट्रीय टैरिफ नीति (संशोधित 2023), राष्ट्रीय विद्युत नीति, और आरडीएसएस जैसी योजनाओं के संयुक्त प्रभाव से उभरा एक संरचनात्मक सुधार है।यह प्रणाली भारत को न केवल ऊर्जा दक्ष बनाएगी, बल्कि उसे वैश्विक ऊर्जा संक्रमण की मुख्यधारा में भी स्थापित करेगी। आने वाले वर्षों में बिजली केवल उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि समय-संवेदी आर्थिक संसाधन बन जाएगी—और यही इस ऐतिहासिक बदलाव का मूल उद्देश्य है।

kishan2
संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425

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