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ईज़ ऑफ़ लिविंग तभी संभव है जब ईज़ ऑफ़ जस्टिस सुनिश्चित हो -भारत की न्यायिक क्रांति का नया अध्याय

by Page 3 News International Desk
November 11, 2025
in Hindi Editorials
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आज की दुनियाँ में पैसा अतिआवश्यक है। लेकीन मन का संतोष, प्रसन्नता उससे भी अधिक आवश्यक है,

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विकसित भारत 2047 और सुशासन का संकट: -निर्धारित ड्रेसकोड पहचान पत्र नदारद- अनुशासन,जवाबदेही और प्रशासनिक संस्कृति का वैश्विक परिप्रेक्ष्य -एक समग्र विश्लेषण

किसी भी देश का ‘ईज़ी ऑफ़ जस्टिस इंडेक्स उसके लोकतंत्र की गुणवत्ता का सबसे प्रामाणिक संकेतक होता है

न्यायिक सुधार अब केवल जजों या वकीलों का विषय नहीं रहा, बल्कि यह राष्ट्रीय विकास की रणनीति का केन्द्रीय अंग बन चुका है, पीएम के सराहनीय विचार – एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर किसी भी राष्ट्र की विकास यात्रा केवल आर्थिक सूचकांकों या बुनियादी ढाँचों से नहीं मापी जाती, बल्कि इस बात से तय होती है कि वहां कानागरिक कितना सुरक्षित, समान अवसरों से संपन्न और न्याय प्राप्त करने में सक्षम है।भारतीय पीएम ने नई दिल्ली में ‘कानूनी सहायता वितरण तंत्र को मजबूत करने पर राष्ट्रीय सम्मेलन में जो बात कही,ईज़ ऑफ़लिविंग तभी संभव है,जब ईज़ ऑफ़ जस्टिस सुनिश्चित हो वह न केवल भारत की न्यायिक नीतियों का नारा है,बल्कि एक लोकतांत्रिक दर्शन का सार भी है।बता दें भारत दुनियाँ का  सबसे बड़ा लोकतंत्र है,भारत  का संविधान प्रत्येक नागरिकको समानअधिकार और कानूनके तहत समान सुरक्षा की गारंटी दे ता है। फिर भी कई  लोग अशिक्षा गरीबी प्राकृतिक आपदाओं अपराध या आर्थिक  तंगी व अन्य बाधाओं के कारण  कानूनीसेवाओं तक पहुंच पाने में असमर्थ हैं।विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम,1987 के तहत विधिक सेवा प्राधिकरणों की स्थापना समाज के हाशिए पर पड़े और वंचित वर्गों को निःशुल्क और सक्षम विधिक सेवाएं प्रदान करने के लिए की गई थी।चूंकि यह अधिनियम 9 नवंबर, 1995 को लागू हुआ था, इसलिए इसके कार्यान्वयन के उपलक्ष्य में इस दिन को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय विधिक सेवा दिवस के रूप में मनाया जाता हैँ विधिक सेवा प्राधिकरणों  द्वारा प्रदान की जाने वाली निः शुल्क कानूनी सहायता और अन्य सेवाओं की उपलब्धता के क्रम में,इस दिन, देश भर में राज्य विधिक सेवा प्राधिकरणों  द्वारा  कानूनी जागरूकता शिविर आयोजित किए जाते हैं।
साथियों बात अगर हम ईज़ ऑफ़ जस्टिस का अर्थ गूढ़ विस्तृत भाषा में समझने की करें तो, यह केवल अदालतों की संख्या बढ़ाने या नए कानून बनाने से नहीं है, बल्कि यह उस सामाजिक और संस्थागत परिवर्तन से जुड़ा है जो हर नागरिक को यह भरोसा देता है कि न्याय उसके द्वार तक पहुँचेगा, न कि उसे न्याय तक पहुंचने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा। यह विचार आज के 21वीं सदी के ग्लोबल डेमोक्रेसी फ्रेमवर्क में इसलिए और भी अहम है क्योंकि दुनिया भर में “जस्टिस एक्सेससिबिलिटी” और “लीगल एपावरमेंट” को सतत विकास (एसडीजी-16) के एक प्रमुख लक्ष्य के रूप में देखा जा रहा है।भारत की न्याय प्रणाली की यह नई दिशा ईज़ी ऑफ़ लिविंग के समानांतर खड़ी है,जहां सरकार नागरिकों के जीवन में सुगमता, पारदर्शिता और सम्मान सुनिश्चित करने के लिए प्रशासनिक तंत्र में सुधार कर रही है, वहीं न्यायिक सुधार उसकी सबसे संवेदनशील कड़ी है। जैसे आर्थिक उदारीकरण ने उद्योगों को मुक्त किया था, वैसे ही न्यायिक सशक्तिकरण नागरिकों को स्वतंत्र और आत्मविश्वासी बनाता है।संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय न्याय आयोग की रिपोर्टें लगातार यह दर्शाती रही हैं कि किसी भी देश का ‘ईज़ी ऑफ़ जस्टिस इंडेक्स उसके लोकतंत्र की गुणवत्ता का सबसे प्रामाणिक संकेतक होता है। भारत इस दिशा में “डिजिटल जस्टिस ”, “लीगल ऐड डिलीवरी मैकेनिज्म ” और “जस्टिस एट डोरस्टेप ” जैसे अभियानों के माध्यम से एक ऐसे मॉडल का निर्माण कर रहा है जो न केवल विकासशील राष्ट्रों बल्कि विकसित देशों के लिए भी प्रेरक बन रहा है।
साथियों बात अगर हम जब भारत स्वयं को एक विकसित देश के रूप में देखेगा,तब हमारी न्याय व्यवस्थाकैसी होनी चाहिए इसको समझने की करें तो,“जब हम स्वयं को एक विकसित राष्ट्र कहेंगे,तो हमारा जस्टिस डिलिवरी सिस्टम कैसा होगा?”वास्तव में भारत की विज़न 2047 की दृष्टि का सबसे मूल प्रश्न है। विकसित राष्ट्र केवल जीडीपी, तकनीकी प्रगति या वैश्विक प्रभाव से नहीं बनता; बल्कि वह तब विकसित कहलाता है जब उसका नागरिक भरोसे से कह सके कि उसे समय पर, निष्पक्ष और सुलभ न्याय मिलेगा।भारत के न्यायिक तंत्र की आज जो चुनौतियाँ हैं,लंबित मामलों का बोझ, जटिल प्रक्रिया, कमजोर कानूनी सहायता तंत्र, और डिजिटल असमानता उन्हें दूर किए बिना “डेवलपड इंडिया” की परिकल्पना अधूरी है। इसी पृष्ठभूमि में “इज़ ऑफ़ जस्टिस ” का नारा एक नीतिगत क्रांति का संकेत देता है।पहला स्तंभ, न्याय का डिजिटलीकरण-सुप्रीम कोर्ट से लेकर जिला अदालतों तक “ई-कोर्ट परियोजना” ने भारत की न्याय प्रणाली को तकनीकी रूप से नया स्वरूप दिया है। आज 18 करोड़ से अधिक केस रिकॉर्ड डिजिटाइज़ हो चुके हैं और वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से सुनवाई की सुविधा ने दूरस्थ इलाकों के नागरिकों को न्यायिक प्रक्रिया से जोड़ा है। “नेशनल जुडीशल डेटा ग्रिड”विश्व का सबसे बड़ा केस- डेटा प्लेटफॉर्म है, जिसे संयुक्त राष्ट्र की न्याय सुधार रिपोर्टों में मॉडल के रूप में उद्धृत किया जा चुका है।दूसरा स्तंभ-कानूनी सहायता का सार्वभौमिकरण-भारत का नेशनल लीगल सर्विसेज अथॉरिटी अब केवल गरीबों के लिए नहीं, बल्कि कमजोर वर्गों महिलाओं, श्रमिकों, दिव्यांगों, आदिवासियों और प्रवासी मजदूरों, तक कानूनी सहायता पहुंचाने का मिशन लेकर चल रहा है।भारतीय पीएम द्वारा इस तंत्र को “लीगल ऐड डिलीवरी मैकेनिज्म ” के रूप में सुदृढ़ करने का आह्वान यह संकेत है कि न्याय अब एक सेवा है, विशेषाधिकार नहीं।तीसरा स्तंभ-पारदर्शी व जवाबदेह न्यायिक ढांचा- विकसित भारत में न्याय केवल “कानूनी व्याख्या” का विषय नहीं रहेगा, बल्कि यह “नागरिक अनुभव” का हिस्सा बनेगा। जैसे ‘इज़ डूइंग बिज़नेस ’ ने व्यापारिक नीतियों को सरल बनाया, वैसे ही ‘ईज़ ऑफ़ जस्टिस ’ न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता, समयबद्धता और नागरिक संवाद को प्राथमिकता देगा।इसलिए भविष्य का डेवलपड इंडिया जस्टिस मॉडल ऐसा होगा जहाँ—एफ़आईआर से लेकर फैसले तक की प्रक्रिया पूरी तरह ट्रैक की जा सके, वकील, जज और पीड़ित एक ही डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर संवाद कर सकें,और न्यायालयों में “मानवीय संवेदना” को कानूनी प्रक्रिया से ऊपर स्थान दिया जाए।यह वही परिवर्तन है जिसे अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ “ह्यूमन सेंट्रक जस्टिस ”कहती हैं,जहाँ कानून केवल नियंत्रण का नहीं, बल्कि संरक्षण का माध्यम होता है।
साथियों बात अगर हम कानूनी सहायता वितरण तंत्र की मजबूती ,लीगल सर्विसेज़ डे और न्यायिक व्यवस्था का नया सामाजिक मिशन क़ो समझने की करें तो,भारत में हर वर्ष 9 नवंबर को ‘लीगल सर्विसेज़ डे मनाया जाता है, जो 1987 के ‘लीगल सर्विसेज अथॉरिटीज एक्ट ’ की वर्षगांठ है। यह दिन इस बात की याद दिलाता है कि न्याय तक पहुंच प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है, और राज्य की जिम्मेदारी है कि वह इस अधिकार को हर व्यक्ति तक पहुंचाए। भारतीय पीएम का यह कथन लीगल एड डिलिवरी मेकैनिज़्म की मजबूती और लीगल सर्विसेज़ डे से जुड़ा कार्यक्रम, हमारी न्यायिक व्यवस्था को नई मजबूती देगा”वास्तव में भारत की सामाजिक न्याय यात्रा का घोषणापत्र है।भारत का लीगल एड मिशन:-भारत में 15 लाख से अधिक लोगों को हर वर्ष मुफ्त कानूनी सहायता दी जाती है। ‘टेली-लॉ’ जैसी डिजिटल योजनाओं ने 15 हज़ार से अधिक पंचायतों तक कानूनी सलाह की पहुँच बनाई है। इन प्रयासों से भारत एक ऐसा मॉडल तैयार कर रहा है जिसे “जस्टिस डिलीवरी एट लास्ट माइल” कहा जा सकता है।ग्रामीण भारत में न्यायिक जागरूकता का विस्तार:- पीएम के विज़न के अनुरूप अब न्याय केवल अदालतों तक सीमित नहीं रहेगा। पंचायत, ब्लॉक और जिला स्तर पर ‘लीगल एड क्लीनिक’ और ‘न्याय सखी’ जैसी पहलें ग्रामीण स्तर पर न्यायिक साक्षरता का विस्तार कर रही हैं। यह पहल संयुक्त राष्ट्र की “एक्सेस to जस्टिस फॉर आल ” नीति के अनुरूप है, जो कहती है कि न्याय तभी प्रभावी है जब वह स्थानीय स्तर पर सुलभ हो।
साथियों बात अगर हम अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण से भारत की पहल को समझने की करें तो विश्व बैंक की 2024 की रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत का लीगल एपावरमेंट फ्रेमवर्कदक्षिण एशिया में सबसे उन्नत है।टेली-लॉ’, ई- कोर्ट्स’, ‘ई-परिसंस और ‘लीगल ऐड चाटबोट्स ’ जैसी योजनाएँ वैश्विक न्यायिक सुधार एजेंडा में उदाहरण के रूप में शामिल की गई हैं।इस संदर्भ में, लीगल सर्विसेज़ डे केवल एक स्मृति दिवस नहीं, बल्कि यह उस दिशा में राष्ट्रीय संकल्प का प्रतीक है जहाँ न्यायिक प्रक्रिया एक सामाजिक आंदोलन बन चुकी है। जब न्याय गरीब तक पहुँचता है, तब लोकतंत्र मजबूत होता है;जब न्याय सरल होता है, तब नागरिक जिम्मेदार बनता है; और जब न्याय समय पर होता है, तब राष्ट्र वास्तव में विकसित कहलाता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विशेषण करें तो हम पाएंगे कि न्याय की सहजता ही विकसित भारत की आत्मा,भारत की न्यायिक यात्रा अब पारंपरिक संरचना से आगे बढ़ चुकी है। “ईज़ of लिविंग ”और “ईज़ ऑफ़ जस्टिस ”अब एक ही सिक्के के दो पहलू हैं,जहाँ एक नागरिक के जीवन की गुणवत्ता बढ़ाता है, वहीं दूसरा उसके अधिकारों की सुरक्षा करता है। प्रधानमंत्री के हालिया संबोधन ने यह स्पष्ट कर दिया है किन्यायिक सुधार अब केवल जजों या वकीलों का विषय नहीं रहा, बल्कि यह राष्ट्रीय विकास की रणनीति का केन्द्रीय अंग बन चुका है।ईज़ ऑफ़ जस्टिस की दिशा में भारत ने जो कदम उठाए हैं,चाहे वह डिजिटल कोर्ट्स, लीगल एड मिशन,पारदर्शी सुनवाई, या सामाजिक न्याय की पहलें हों,वे यह संदेश देते हैं कि 2047 का “विकसित भारत” केवल आर्थिक रूप से नहीं, बल्कि न्यायिक रूप से भी आत्मनिर्भर, समानतामूलक और संवेदनशील होगा।जब हर नागरिक को यह विश्वास होगा कि न्याय उसके द्वार तक पहुंचेगा, तब ही भारत का ईज़ ऑफ़ लिविंग वास्तव में साकार होगा,और यही उस नए भारत की आत्मा है, जहाँ “न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व” केवल संविधान की प्रस्तावना नहीं, बल्कि रोज़मर्रा का जीवन बन जाए।

kishan2 1
संकलनकर्ता लेखक – कर विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

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