बिहार में रिकॉर्ड वोटिंग नें 1951 से अब तक के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए- जनता क़ा संकेत अब ‘मतदान’ केवल अधिकार नहीं, बल्कि सत्ता परिवर्तन क़ा औजार
यह रिकॉर्ड वोटिंग सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि जनता की वह आवाज़ है जो कहती है “हम जाग चुके हैं,अब निर्णय हमारा होगा – एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – विश्व की सबसे बड़े लोकतंत्र भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में 2025 का बिहार विधानसभा चुनाव अब केवल एक प्रांतीय चुनाव नहीं रह गया, बल्कि यह देश की जनसांख्यिक, सामाजिक और राजनीतिक चेतना का एक नया मील का पत्थर बन गया है। पहले चरण में हुई 64.66 प्रतिशत की रिकॉर्ड वोटिंग ने न केवल 1951 से अब तक के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए, बल्कि यह भी संकेत दिया कि बिहार की जनता अब ‘मतदान’ को केवल अधिकार नहीं, बल्कि परिवर्तन के औजार के रूप में देखने लगी है।बिहार हमेशा से भारतीय लोकतंत्र की राजनीतिक प्रयोगशाला माना गया है। जयप्रकाश नारायण के संपूर्ण क्रांति आंदोलन से लेकर लालू यादव की सामाजिक न्याय की राजनीति और नीतीश कुमार के सुशासन के मॉडल तक बिहार ने देश की राजनीति को दिशा दी है। लेकिन मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि 2025 का यह चुनाव कुछ अलग है।1951 से लेकर आज तक के 17 विधानसभा चुनावों में बिहार ने कभी इतनी बड़ी संख्या में मतदाताओं को मतदान केंद्र तक नहीं देखा। झारखंड के विभाजन के बाद हुए पांच चुनावों का रिकॉर्ड भी ध्वस्त हो गया है। इस बार मतदाता सिर्फ सरकार दोहराने या बदलने के लिए नहीं निकले, बल्कि वे अपने राजनीतिक भविष्य की संरचना में भागीदार बनने के लिए आगे आए हैं।
साथियों बात अगर हम पहले चरण का चित्रण,18 जिलों की 121 सीटों पर जनसैलाब उमड़ने को समझने की करें तो,पहले चरण में 18 जिलों की 121 विधानसभा सीटों पर मतदान हुआ।शाम तक 64.66 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया,जो बिहार के इतिहास में एक अभूतपूर्व आंकड़ा है। निर्वाचन आयोग के अनुसार, यह आंकड़ा अंतिम रूप से थोड़ा और बढ़ सकता है।गांव से लेकर कस्बों और शहरों तक लोगों में एक ही उत्साह था“इस बार वोट देना जरूरी है।” कई जिलों में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों से अधिक रही। यह आंकड़ा बताता है कि अब बिहार की राजनीति केवल जातीय समीकरणों से नहीं, बल्कि सामाजिक भागीदारी के नए मापदंडों से भी तय हो रही है।2000 में झारखंड के अलग होने के बाद बिहार में हुए पांच विधानसभा चुनावों का औसत मतदान 52 से 58 प्रतिशत के बीच रहा। परंतु 2025 के पहले चरण में यह आंकड़ा सीधे 64.66 प्रतिशत तक पहुंच गया,जो एक राजनीतिक जागृति का संकेत है।यह सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि नागरिक चेतना की अभिव्यक्ति है।जहां देश के कई राज्यों में वोटर उदासीनता या ‘वोटिंग थकान’ देखी जा रही है, वहीं बिहार ने उलट प्रवृत्ति दिखाई है,यह दर्शाता है कि जनता अब नीतियों और नेतृत्व दोनों का मूल्यांकन अधिक गहराई से करने लगी है।
साथियों बात अगर हममहिलाओं और युवाओं की निर्णायक भूमिका को समझने की करें तो,इस बार बिहार के मतदाताओं में महिलाएं और युवा वर्ग सबसे अधिक सक्रिय दिखे।महिलाओं की उपस्थिति कई जिलों में पुरुषों से अधिक रही,जैसे सहरसा,भागलपुर, बांका, और गया जिलों में महिलाओं की मतदान प्रतिशतता 66 से 70 के बीच रही।महिलाएं अब “सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार” जैसे मूलभूत मुद्दों को लेकर सजग हैं।युवा मतदाता सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों पर सक्रिय रूप से प्रचार और विमर्श में शामिल रहे।यह नई पीढ़ी बिहार की राजनीति में ‘वंशवाद’ या ‘जातिवाद’ से आगे सोचने लगी है,यही इस चुनाव की सबसे सकारात्मक झलक है।
साथियों बात अगर हम जाति गणित या नया सामाजिक समीकरण? को समझने की करें तो,बिहार की राजनीति का सबसे चर्चित तत्व रहा है जातिगत समीकरण ,यादव, कुर्मी, ब्राह्मण, दलित, मुसलमान और महादलित वोट बैंक के रूप में हमेशा चर्चा में रहे हैं।परंतु इस बार परिदृश्य थोड़ा बदला है।पिछले कुछ वर्षों में बिहार में शहरीकरण, प्रवासन और शिक्षा के प्रसार ने जातिगत सीमाओं को कुछ हद तक धुंधला किया है।हालांकि जाति का प्रभाव अभी समाप्त नहीं हुआ है,परंतु अब जाति के साथ विकास रोजगार, भ्रष्टाचार और शासन की छवि भी चुनावी समीकरणों में समान रूप से महत्वपूर्ण हो गई है।पहले चरण के नतीजों से पहले ही यह संकेत मिल गया कि “जाति अब निर्णायक नहीं,बल्कि सहायक कारक” बन रही है।
साथियों बात अगर हम एनडीए, महागठबंधन और जैन स्वराज पार्टी,तीन ध्रुवों की टक्कर को समझने की करें तो,इस बार चुनाव में तीन प्रमुख राजनीतिक ध्रुव बने (1) एनडीए गठबंधन (मुख्यतः भाजपा और जदयू)(2) महागठबंधन (राजद, कांग्रेस और वाम दल),और(3) जन स्वराज पार्टी, जो एक नए चेहरे के रूप में उभरी है और युवाओं व मध्यम वर्ग के बीच तेजी से लोकप्रिय हुई।तीनों ने पहले चरण की रिकॉर्ड वोटिंग को अपनी जीत का संकेत बताया है।एनडीए का दावा है कि “सुशासन और स्थायित्व” के नाम पर जनता ने विश्वास जताया है,जबकि महागठबंधन कहता है कि “जनता परिवर्तन चाहती है”।वहीं जन स्वराज पार्टी ने कहा कि यह वोटिंग दर बताती है कि जनता ने “तीसरा विकल्प” खोज लिया है।यह चुनावी परिदृश्य संकेत देता है कि बिहार में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अब द्विध्रुवीय नहीं रही, बल्कि त्रिध्रुवीय हो चुकी है।क्या यह ‘कांटे की टक्कर’ है या ‘एकतरफा लहर’? इतिहास बताता है कि जब भी बिहार में मतदान प्रतिशत अधिक हुआ है, सत्ता परिवर्तन की संभावना बढ़ी है।2015 में 56 प्रतिशत मतदान के साथ महागठबंधन की जीत हुई थी,2020 में 57.05 प्रतिशत मतदान के साथ एनडीए ने मामूली बढ़त हासिल की थी।2025 में 64.66 प्रतिशत मतदान इस प्रवृत्ति को और जटिल बना देता है,क्या यह जनता का ‘गुस्सा’ है या विश्वास? क्या यह कांटे की टक्कर का संकेत है या किसी एक पक्ष की ओर बहती ‘मौन लहर’ राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि अधिक मतदान हमेशा स्टेटस क्यूयूओ को चुनौती देता है,यानी सत्ता में बैठे दल के लिए खतरे की घंटी हो सकता है।परंतु यह भी सच है कि बिहार की जनता ‘भावनात्मक मतदान’ से आगे बढ़ चुकी है;अब वे परिणामपरक मतदान कर रही है।बिहार की जनता का यह मतदान केवल राजनीतिक उत्साह नहीं, बल्कि सामाजिक मनोविज्ञान की नई परिभाषा है।लंबे समय तक बेरोजगारी, पलायन, गरीबी और भ्रष्टाचार झेलने वाले समाज में जब मतदान की दर अचानक बढ़ती है, तो इसका अर्थ है कि जनता अब निराशा से आशा की ओर बढ़ रही है।यह वोट किसी नेता के लिए नहीं, बल्कि सिस्टम की पुनर्स्थापना के लिए दिया जा रहा है।बिहार का ग्रामीण वर्ग इस चुनाव में विशेष रूप से सक्रिय दिखा, जिसने संकेत दिया कि लोकतंत्र की जड़ें अब गांवों तक गहराई से फैल चुकी हैं।
साथियों बात अगर हम आर्थिक कारक और मतदाता का दृष्टिकोण को समझने की करें तो,बिहार देश के सबसे गरीब राज्यों में से एक है, जहाँ प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से काफी कम है।ऐसे में मतदाता अब केवल जाति या धर्म नहीं,बल्कि आर्थिक मुद्दों पर भी सोचने लगे हैं। महंगाई, रोजगार, कृषि नीति, सरकारी योजनाओं की पारदर्शिता,ये सारे तत्व मतदाता के दिमाग में थे।2020 से 2025 के बीच केंद्र और राज्य की कल्याणकारी योजनाओं जैसे पीएम आवास योजना,जल जीवन मिशन, उज्ज्वला योजना, और राज्य की मुख्यमंत्रीग्रामीण सडक योजना ने जनता केजीवन में कुछ परिवर्तन किए हैं।परंतु इन योजनाओं के असमान वितरण और भ्रष्टाचार के आरोपों ने जनता में असंतोष भी भरा है।इसलिए यह मतदान संतुलित विरोध और आशा के मेल का प्रतीक है।
साथियों बात अगर हम चुनाव आयोग और तकनीकी सुधार की भूमिका को समझने की करें तो,2025 का यह चुनाव तकनीकी दृष्टि से भी ऐतिहासिक है।ईवींएम्स के साथ वीवीपीएटी की पारदर्शिता, डिजिटल वोटर लिस्ट और सोशल मीडिया निगरानी ने मतदान की विश्वसनीयता को मजबूत किया है।निर्वाचन आयोग ने इस बार ग्रामीण इलाकों में महिला मतदान केंद्र और दिव्यांग-हितैषी बूथ स्थापित किए।यह लोकतांत्रिक व्यवस्था की सहभागी भावना को दर्शाता है, जिससे मतदाताओं में भरोसा बढ़ा।दूसरे चरण की प्रतीक्षा, लोकतंत्र की अगली परीक्षा अब बिहार की नजरें 11 नवंबर पर टिकी हैं, जब दूसरे चरण का मतदान होगा।पहले चरण के रिकॉर्ड वोटिंग ने चुनावी माहौल को गर्मा दिया है।14 नवंबर को मतगणना के दिन यह तय होगा कि बिहार किस दिशा में जाएगा, क्या जनता स्थायित्व को चुनेगी या परिवर्तन को?परंतु एक बात निश्चित है कि 2025 का यह चुनाव बिहार की राजनीतिक संस्कृति में लोकतांत्रिक पुनर्जागरण का प्रतीक बन चुका है।
साथियों बात अगर हम वैश्विक लोकतांत्रिक परिप्रेक्ष्य में बिहार को समझने की करें तो, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यदि देखा जाए, तो इतनी बड़ी जनसंख्या वाले किसी प्रांत में 64.66 प्रतिशत मतदान एक अद्भुत उदाहरण है।जहाँ विकसित देशों में मतदान प्रतिशत लगातार गिर रहा है जैसे अमेरिका में 2024 के चुनाव में मात्र 61.3 प्रतिशत और ब्रिटेन में 2024 के आम चुनाव में 58 प्रतिशत मतदान हुआ,वहीं बिहार का यह आंकड़ा लोकतंत्र के जीवंत और प्रगतिशील स्वरूप का प्रमाण है।यह दुनिया को यह संदेश देता है कि लोकतंत्र की आत्मा अभी भी भारत के गांवों में धड़कती है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि जनता ने लिखी लोकतंत्र की नई कहानी,बिहार ने एक बार फिर साबित किया है कि भारत का लोकतंत्र केवल कागज़ पर नहीं, बल्कि जनमानस की गहराई में जीवित है।1951 के पहले चुनाव से लेकर आज तक लोकतंत्र की यात्रा लंबी रही, परंतु 2025 का यह पहला चरण उस यात्रा का सर्वाधिक सजीव अध्याय बन गया है।यह रिकॉर्ड वोटिंग सिर्फ आंकड़ा नहीं, बल्कि जनता की वह आवाज़ है जो कहती है “हम जाग चुके हैं, अब निर्णय हमारा होगा।”यह चुनाव चाहे किसी भी दल को सत्ता दिलाए, पर इतना तय है कि बिहार ने भारत को लोकतंत्र का सबसे गहरा सबक सिखाया है,लोकतंत्र तभीमजबूत होता है जब जनता स्वयं उसकी रीढ़ बन जाती है।
