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ट्रंप की आर्थिक शक्तियों पर सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक सुनवाई-अमेरिकी संवैधानिकता, वैश्विक व्यापार और राजनीतिक शक्ति का निर्णायक मोड़

by Page 3 News International Desk
November 6, 2025
in Hindi Editorials
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आज की दुनियाँ में पैसा अतिआवश्यक है। लेकीन मन का संतोष, प्रसन्नता उससे भी अधिक आवश्यक है,

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यदि कोर्ट इस शक्ति को सीमित करता है, तो यह संकेत होगा कि लोकतंत्र में कोई भी व्यक्ति चाहे वह राष्ट्रपति ही क्यों न हो कानून से ऊपर नहीं है।

यह सुनवाई इतिहास की उस रेखा पर खड़ी है जहाँ से तय होगा आर्थिक शक्ति का उपयोग राष्ट्रहित के लिए होगा या राजनीतिक प्रभुत्व के लिए है- एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर 5 नवंबर 2025 का दिनअमेरिकी लोकतंत्र और वैश्विक अर्थव्यवस्था दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण तारीख बन गया है।आज,संयुक्त राज्यअमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय में एक ऐसा मामला सुना गया जिसने न केवल अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड जे. ट्रंप की आर्थिक नीतियों की संवैधानिकता पर प्रश्न उठाया, बल्कि विश्व व्यापार की संरचना, आपातकालीन शक्तियों की सीमाओं और कार्यपालिका बनाम विधायिका के संतुलन को भी गहराई से परखा। इस केस की सुनवाई 80 मिनट तक चली, जबकि सामान्य मामलों में 60 मिनट ही मिलते हैं,अदालत में जगह खचाखच भरी रही,पूरी दुनियाँ की नजरें इस बात पर टिकी है कि क्या राष्ट्रपति की आर्थिक शक्तियां सीमित की जाएंगी या उन्हें और अधिक अधिकार मिलेंगे।बता दें इस केस की सुनवाई में भारतीय मूल के जाने-माने वकील नील कत्याल मुख्य वकील के तौर पर याचिका कर्ताओं की ओर से व ट्रंप की नीतियों के विरुद्ध दलीलें दिए,इस सुनवाई का केंद्र था इंटरनेशनलइमरजेंसी इकोनॉमिक्स पावर्स एक्ट (आईईईपीए) ,1977 का वह कानून जिसने राष्ट्रपति को आर्थिक आपातकाल की स्थिति में विशेष शक्तियाँ प्रदान की थीं। परन्तु प्रश्न यह था कि क्या इन शक्तियोंका प्रयोग ट्रंपने अपने राजनीतिक – व्यापारिक हितों के लिए अत्यधिक सीमा तक कर लिया है? मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि यह सुनवाई इतिहास की उस रेखा पर खड़ी है जहाँ से तय होगा आर्थिक शक्ति का उपयोग राष्ट्रहित के लिए होगा या राजनीतिक प्रभुत्व के लिए है,लोकतंत्र में कोई भी व्यक्ति चाहे वह राष्ट्रपति ही क्यों न हो कानून से ऊपर नहीं है।दुनियाँ भर के देशों की निगाहें अब सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय पर हैं, जो आने वाले महीनों में आएगा। यह फैसला तय करेगा कि क्या “इकोनॉमिक पावर एक्ट” के नाम पर राष्ट्रपति को असीमित शक्ति मिल सकती है,या संविधान की मर्यादा अब भी सर्वोच्च है। इस जानकारी का कलेक्शन मीडिया के माध्यम से किया गया है।
साथियों बात अगर हम इकोनॉमिक इमरजेंसी एक्ट और राष्ट्रपति की शक्ति को समझने की करें तो आईईईपीए की रचना अमेरिकी कांग्रेस ने 1977 में इस उद्देश्य से की थी कि राष्ट्रपति को राष्ट्रीय सुरक्षा से संबंधित आर्थिक आपातकालीन स्थितियों में त्वरित कदम उठाने की शक्ति मिल सके। इसका मूल लक्ष्य था शत्रु देशों या आतंकवादी संगठनों से निपटना, व्यापारिक प्रतिबंध लगाना, और विदेशी संपत्तियों को नियंत्रित करना। परंतु 2018 से 2024 के बीच, ट्रंप प्रशासन ने इस कानून का उपयोग चीन, मेक्सिको, कनाडा, यूरोपीय संघ और यहाँ तक कि भारत के विरुद्ध भी टैरिफ (इम्पोर्ट डूटीज) लगाने के लिए किया,यह कहते हुए कि“विदेशी व्यापारअमेरिकी सुरक्षा के लिए खतरा बन गया है।” इसने न केवल कांग्रेस के सदस्यों बल्कि न्यायविदों को भी चिंतित कर दिया कि कहीं राष्ट्रपति इस कानून का उपयोग “व्यापारिक हथियार” के रूप में तो नहीं कर रहे।इस मामले में ट्रंप का तर्कसरल किंतु विवादास्पद है। उनका कहना है कि “अमेरिका की आर्थिक शक्ति ही उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा है। यदि कोई देश अमेरिकी उद्योग या रोज़गार को नुकसान पहुँचाता है,तो यह युद्ध का एक रूप है। ”इस दृष्टिकोण के अनुसार, चीन या अन्य देशों से आने वाले उत्पादों पर भारी टैरिफलगाना “राष्ट्र की रक्षा” का एक हिस्सा है।उन्होंने इसे“इकोनॉमिक् नेशनलीस्म” कहा और आईईईपीए की धारा 1702 का हवाला दिया,जो राष्ट्रपति को विदेशी व्यापार पर प्रतिबंध लगाने की अनुमति देती है। ट्रंप के समर्थक इसे“अमेरिका फर्स्ट ”नीति की स्वाभाविक परिणति मानते हैं, जबकि आलोचक इसे संवैधानिक अतिरेक और कार्यपालिका के दुरुपयोग की परिभाषा बताते हैं।अमेरिकी कांग्रेस का एक बड़ा वर्ग मानता है कि ट्रंप ने आईईईपीए के उद्देश्य को मोड़कर अपनी व्यापारिक नीतियों को लागू करने का औजार बना लिया है। कांग्रेस के कई सदस्यों ने कहा कि इस कानून की आड़ मेंराष्ट्रपति ने न केवल संवैधानिक ‘चेकस एंड बैलेंसस’ को तोड़ा,बल्कि अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक समझौतों को भी नष्ट किया। पिछले वर्ष लर्निंग रिसोर्सस बनाम ट्रम्प नामक मामले में कई उद्योग समूहों ने दावा किया कि ट्रंप के टैरिफ अवैध हैं, क्योंकि उन्होंने कोई “वास्तविक आपातकाल” घोषित नहीं किया था। इसी मामले की सुनवाई अब सुप्रीम कोर्ट में पहुंची है, जिसने आज इस पर मौखिक दलीलें सुनीं।
साथियों बात अगर हम आज की सुनवाई,कोर्ट रूम में लोकतंत्र की परीक्षा को समझने की करें तो 5 नवंबर 2025 को सुबह वाशिंगटन डी.सी. के सर्वोच्च न्यायालय में माहौल असाधारण था।बता दें इस केस में याचिकाकर्ता की ओर से यानें डोनाल्ड ट्रंप के विरुद्ध भारतीय मूल के बहुत बड़े वकील पैरवी कर रहे हैं,कोर्ट रूम में मीडिया, व्यापारिक प्रतिनिधि,संवैधानिक विशेषज्ञ औरअंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षक मौजूद थे। ट्रंप स्वयं उपस्थित नहीं हुए; उन्होंने कहा कि “मेरी मौजूदगी से मुद्दे का राजनीतिकरण हो सकता है।”उनकी जगह उनके ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट ने तर्क प्रस्तुत किया कि “विश्व व्यापार की स्थिति ऐसी है कि आर्थिक कदम उठाना अमेरिकी सुरक्षा के लिए आवश्यक है।”दूसरी ओर, याचिकाकर्ताओं की ओर से वकीलों ने कहा“आईईईपीए को इस तरह व्याख्यायित करना कि राष्ट्रपति किसी भी देश पर व्यापारिक युद्ध छेड़ सके, संविधान के विरुद्ध है। यदि यह मान लिया गया तो कोई भी राष्ट्रपति आर्थिक तानाशाही की स्थिति में आ सकता है।”जस्टिसों के सवाल,संविधान बनाम शक्ति- सुनवाई के दौरान कई जस्टिसों ने कठोर प्रश्न पूछे। मुख्य न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्सगंज ने कहा,“यदि हर व्यापारिक असंतुलन एक राष्ट्रीय आपातकाल है,तो फिर कांग्रेस की भूमिका क्या रह जाएगी? ”जस्टिस सोनिआ सोटोमेयर ने पूछा,“क्या यह ‘एग्जीक्यूटिव ओवररेच ’ नहीं है कि राष्ट्रपति कांग्रेस की मंज़ूरी के बिना कर नीति तय करें?”वहीं, कुछ जस्टिस जैसे नील गोरसूच ने यह तर्क दिया कि “राष्ट्रपति को अंतरराष्ट्रीय परिस्थिति के अनुसार लचीलापन मिलना चाहिए।” इससे यह स्पष्ट था कि कोर्ट इस मामले को केवल कानून की दृष्टि से नहीं, बल्कि संवैधानिक शक्ति-विभाजन के दृष्टिकोण से भी देख रही है।
साथियों बात अगर हम अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएँ, विश्व व्यापार में चिंता को समझने की करें तो,इस सुनवाई ने केवल अमेरिकी राजनीति में नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में हलचल मचा दी है। यूरोपीय संघ ने कहा है कि अगर सुप्रीम कोर्ट ट्रंप की शक्तियों को वैध मानता है,तो “अंतरराष्ट्रीय व्यापार व्यवस्था पर गहरा प्रभाव पड़ेगा।” चीन ने इसे “संरक्षणवाद की न्यायिक स्वीकृति”कहा। भारत, जो अमेरिका-भारत व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहा है, उसने संयमित प्रतिक्रिया दी है लेकिन आंतरिक विश्लेषणों में चिंता जताई है कि “यदि अमेरिकी राष्ट्रपति किसी भी समय आईईईपीए के नाम पर टैरिफ बढ़ा सकते हैं, तो कोई भी दीर्घकालिक समझौता स्थायी नहीं रह सकता।” ब्रिटेन, जो इस समय अमेरिका के साथ एक पोस्ट-ब्रेक्सिट एफटीए पर बातचीत में है, इस फैसले को अपनी रणनीति के लिए महत्वपूर्ण मान रहा है।आर्थिक प्रभाव,डॉलर, मार्केट और ग्लोबल सप्लाई चेन पर असर-सुनवाई के दिन ही वॉल स्ट्रीट और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में हल्की अस्थिरता देखी गई। डॉलर इंडेक्स में गिरावट और एशियाई बाज़ारों में संदेह देखा गया कि कहीं सुप्रीम कोर्ट अगर ट्रंप को असीमित शक्तियाँ दे देता है तो व्यापारिक टकरावों का नया दौर न शुरू हो जाए। अमेरिकी चैंबर ऑफ कॉमर्स ने बयान जारी किया कि “आईईईपीए के तहत टैरिफ नीतियों को न्यायालय द्वारा वैध ठहराया गया तो निवेशक- विश्वास डगमगा सकता है।” वैश्विक स्तर पर यह चिंता जताई जा रही है कि यदि हर देश अपने राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री को इस प्रकार की आर्थिकआपातकालीन शक्तियाँ’ देने लगे तो डब्लूयुटी ओ जैसी संस्थाएँ निष्प्रभावी हो जाएँगी।
साथियों बात अगर हम संविधान बनाम कार्यपालिका, अमेरिकी लोकतंत्र की असली परीक्षा को समझने की करें तो,यह मामला केवल एक आर्थिक विवाद नहीं, बल्कि अमेरिकी संविधान की आत्मा की परीक्षा है। संविधान की रचना इस सोच के साथ हुई थी कि कोई भी शक्ति निरंकुश न हो;न कार्यपालिका, न विधायिका और न ही न्यायपालिका। ट्रंप की व्याख्या यह संकेत देती है कि राष्ट्रपति आर्थिक नीति को “राष्ट्रीय सुरक्षा” का विषय बताकर बिना कांग्रेस की मंज़ूरी के फैसले कर सकते हैं। यदि सुप्रीम कोर्ट इसे वैध ठहरा दे, तो यह भविष्य में किसी भी राष्ट्रपति (डेमोक्रेट या रिपब्लिकन) के लिए ऐसा मार्ग खोल देगा जिसमें वे संसद की अनुमति के बिना वैश्विक व्यापारिक निर्णय ले सकेंगे। यही कारण है कि अमेरिकी मीडिया इस मामले को “पावर बनाम कंस्टीटूशन” कह रही है।
साथियों बात अगर हम राजनीतिक दृष्टिकोण,ट्रंप के लिए चुनावी संदेश को समझने की करें तो,राजनीतिक रूप से यह मामला ट्रंप के लिए दोधारी तलवार है। उनके समर्थक इसे “मजबूत नेतृत्व” और “अमेरिका फ़र्स्ट” नीति की जीत मान रहे हैं।वहीं विरोधी इसे “आर्थिक अधिनायकवाद की शुरुआत बता रहे हैं। 2026 के मध्यावधि चुनावों को देखते हुए ट्रंप इस मुद्दे को जनता के बीच “अमेरिका की स्वतंत्र आर्थिक नीति” के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत करेंगे। लेकिन अगर कोर्ट का फैसला उनके खिलाफ गया, तो विपक्ष इसे इस दावे के साथ पेश करेगा कि“ट्रंप ने संविधान को ताक पर रख दिया था।”
साथियों बात अगर हम इस मामले में भारत और वैश्विक दक्षिण का दृष्टिकोण को समझने की करें तो,भारत के लिए यह मामला केवल एक अमेरिकी कानूनी प्रकरण नहीं, बल्कि वैश्विक आर्थिक नीति का संकेत है। यदि अमेरिकी राष्ट्रपति को आईईईपीए के तहत टैरिफ लगाने की असीमित शक्ति मिल जाती है, तो भारत जैसे उभरते बाज़ारों को अपने निर्यात पर अस्थिरता का सामना करना पड़ेगा। उदाहरण के लिए, फार्मा, टेक्सटाइल और आईटी सर्विस सेक्टर पर अमेरिकी कर नीति का गहरा असर पड़ सकता है। इसके अलावा, चीन-विरोधी आर्थिक नीति के बहाने ट्रंप “फ्रेंड-शोरिंग” की नीति अपनाते हैं, जिसमें भारत लाभ उठा सकता है। लेकिन कानूनी अनिश्चितता का वातावरण निवेशकों के लिए चिंता का विषय रहेगा।अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे देशों के लिए यह मामला “वैश्विक उत्तर बनाम वैश्विक दक्षिण” के शक्ति-संतुलन का प्रतीक है। यदि अमेरिका को यह स्वतंत्रता मिलती है कि वह किसी भी देश के खिलाफ आर्थिक आपात घोषित कर दे, तो यह अंतरराष्ट्रीय आर्थिक समानता के सिद्धांत को कमजोर करेगा।
साथियों बात कर हम कानूनी विश्लेषण व सुप्रीम कोर्ट की संभावित दिशा को समझने की करें तो,कानूनी विशेषज्ञों का अनुमान है कि कोर्ट तीन संभावित दिशाओं में जा सकता है ,(1) पूर्ण समर्थन:कोर्ट कहे कि आईईईपीए राष्ट्रपति को व्यापक शक्ति देता है,और यह वैध है।(2) सीमित समर्थन: कोर्ट यह मान सकता है कि राष्ट्रपति को केवल “वास्तविक आपातकालीन स्थिति” में यह शक्ति है, सामान्य व्यापारिक विवादों में नहीं। (3) अमान्यता:कोर्ट आईईईपीए की व्याख्या को सीमित करते हुए कह सकता है कि ट्रंप का प्रयोग असंवैधानिक था।विशेषज्ञों का अनुमान है कि कोर्ट “सीमित समर्थन” वाला मार्ग अपनाएगा, ताकि न तो राष्ट्रपति की शक्ति पूरी तरह कम हो, न लोकतांत्रिक संतुलन टूटे।यह सुनवाई इस बात का प्रतीक है कि 21वीं सदी की वैश्विक राजनीति में “आर्थिक निर्णय” अब केवल आर्थिक नहीं रहे; वे राजनीतिक, रणनीतिक और संवैधानिक अर्थों में भी महत्वपूर्ण हो गए हैं। अमेरिका में यह बहस “इकोनॉमिक कंस्यूटिटूशनलीस्म ” के नाम से चल रही है यानी क्या आर्थिक निर्णयों पर भी वही संवैधानिक सीमाएँ लागू होनी चाहिए जो राजनीतिक निर्णयों पर लागू होती हैं? यदि हाँ, तो यह वैश्विक लोकतंत्रों के लिए एक नया युग हो सकता है, जिसमें आर्थिक शक्ति पर भी नागरिक निगरानी सुनिश्चित होगी।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि 5 नवंबर 2025 की सुनवाई केवल डोनाल्ड ट्रंप की व्यक्तिगत नीति पर निर्णय नहीं है, बल्कि यह उस प्रश्न का उत्तर खोजने का प्रयास है कि “क्या लोकतंत्र में शक्ति की कोई सीमा है?” अमेरिका जैसे देश में यह सवाल अत्यंत गूढ़ है, क्योंकि वही विश्व को लोकतंत्र और पारदर्शिता का आदर्श बताता है। यदि सुप्रीम कोर्ट ट्रंप के पक्ष में निर्णय देता है,तो यह न केवल अमेरिकी संविधान,बल्कि पूरे विश्व में कार्यपालिका की भूमिका को पुनर्परिभाषित करेगा। और यदि कोर्ट इस शक्ति को सीमित करता है, तो यह संकेत होगा कि लोकतंत्र में कोई भी व्यक्ति चाहे वह राष्ट्रपति ही क्यों न हो कानून से ऊपर नहीं है।दुनिया भर के देशों की निगाहें अब सुप्रीम कोर्ट के अंतिम निर्णय पर हैं, जो आने वाले महीनों में आएगा। यह फैसला तय करेगा कि क्या “इकोनॉमिक पावर एक्ट” के नाम पर राष्ट्रपति को असीमित शक्ति मिल सकती है, या संविधान की मर्यादा अब भी सर्वोच्च है।यह सुनवाई इतिहास की उस रेखा पर खड़ी है जहाँ से तय होगा आर्थिक शक्ति का उपयोग राष्ट्रहित के लिए होगा या राजनीतिक प्रभुत्व के लिए। लोकतंत्र की असली पहचान इसी संतुलन में निहित है।

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संकलनकर्ता लेखक – कर विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

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