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नई दिल्ली। केंद्र सरकार ने दावा किया है कि आगामी रबी सीजन में यूरिया की कोई कमी नहीं होगी। खरीफ 2025 के दौरान आयात में बढ़ोतरी और घरेलू उत्पादन में सुधार से देश में पर्याप्त भंडार तैयार हो चुका है। किसानों को यूरिया उपलब्धता के लिए राज्य सरकारों को भी आवश्यक निर्देश जारी किये गये हैं। केंद्रीय कृषि मंत्रालय के अनुसार समयबद्ध रणनीति, बढ़ते हुए आयात और बेहतर वितरण प्रणाली के कारण किसानों को रबी के दौरान किसी तरह की दिक्कत नहीं होगी। खरीफ की अधिक मांग के बावजूद किसानों को पर्याप्त खाद उपलब्ध कराई गई थी और अब रबी के लिए भी पर्याप्त भंडारण किया गया है। यानी देश में अक्टूबर तक 68.85 लाख टन यूरिया का बफर स्टॉक मौजूद है, जो पिछले महीने से 20 लाख टन अधिक है। मंत्रालय के अनुसार देश में घरेलू उत्पादन और आयात दोनों में सुधार से यूरिया आपूर्ति का ढांचा मजबूत हुआ है। सरकार का कहना है कि इस साल अप्रैल से अक्टूबर के बीच भारत ने 58.62 लाख टन कृषि-ग्रेड यूरिया आयात किया, जबकि पिछले वर्ष इसी अवधि में यह मात्रा 24.76 लाख टन थी। आयात में यह बढ़ोतरी खरीफ की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ रबी के लिए बफर स्टॉक तैयार करने में मददगार साबित हुई है। अक्टूबर में घरेलू उत्पादन 26.88 लाख टन रहा, जो पिछले साल से 1.05 लाख टन अधिक है। अप्रैल से अक्टूबर के बीच औसतन हर महीने करीब 25 लाख टन यूरिया का उत्पादन हुआ। नवंबर-दिसंबर के लिए 17.5 लाख टन का आयात पहले ही तय कर लिया गया है। मंत्रालय का कहना है कि इससे रबी के दौरान आपूर्ति में कोई दबाव नहीं रहेगा।
केंद्र सरकार के उर्वरक विभाग के अनुसार खरीफ सीजन में किसानों को पर्याप्त मात्रा में यूरिया उपलब्ध कराया गया था। खरीफ के लिए 185.39 लाख टन यूरिया की आवश्यकता थी, जबकि इसके विरुद्ध 230.53 लाख टन की आपूर्ति की गई। बेहतर मानसून और खेती के रकबे में बढ़ोतरी से यूरिया की बिक्री पिछले वर्ष की तुलना में 4.08 लाख टन अधिक अर्थात 193.20 लाख टन तक पहुंच गई है। केंद्र सरकार ने राज्यों को निर्देश दिया है कि यूरिया वितरण में पारदर्शिता और निगरानी बढ़ाई जाए। डाइवर्जन, जमाखोरी, तस्करी और काले बाजार पर सख्त कार्रवाई की जाए। कई राज्यों ने सब्सिडी वाले यूरिया की ट्रैकिंग के लिए डिजिटल मॉनिटरिंग सिस्टम और तकनीकी उपकरणों का उपयोग शुरू किया है। वहीं नमरूप और तलचर में दो नए यूरिया संयंत्रों का निर्माण चल रहा है, जिनकी वार्षिक उत्पादन क्षमता 12.7 लाख टन होगी। इनके शुरू होने से आने वाले वर्षों में देश की आयात निर्भरता घटेगी और आत्मनिर्भरता की दिशा में अहम कदम होगा।
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