भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने निर्णायक मोड़ ! विदेशी निवेशकों को टैक्स राहत मिलेगी या बिकवाली बढ़ेगी? चावल की कीमतों से वैश्विक व्यापार तक हलचल, जियो का ऐतिहासिक आईपीओ और ट्रंप की नीतियों का महासंग्राम!
क़्या बज़ट 2027 में एलटीसीजी -एसटीटी में राहत देकर वित्तमंत्री पलटेंगी बाज़ी? -बड़ा फ़ैसला लेकर सरकार बचा पाएगी निवेशकों का भरोसा?-चावल की महंगाई जियो आईपीओ और स्टारलिंक से नई आर्थिक जंग ! अर्थव्यवस्था की अग्निपरीक्षा ! -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर आज वैश्विक अर्थव्यवस्था एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है,जहां एक ओर विदेशी निवेशकों की बिकवाली,मुद्रा बाजार की अस्थिरता और व्यापारिक तनाव भारतीय शेयर बाजार की परीक्षा ले रहे हैं,तोदूसरी ओर रिलायंस जियो का प्रस्तावित विशाल आईपीओ, उपग्रह इंटरनेट की प्रतिस्पर्धा और भारत की अंतरराष्ट्रीय चावल व्यापार में बढ़ती भूमिका नए अवसरों के संकेत दे रहे हैं। केंद्रीय वित्तमंत्री के सामने आगामी बजट 2027 में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि राजस्व संग्रह और निवेशकों के भरोसे के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए। विशेष रूप से दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ कर (एलटीसीजी) और प्रतिभूति लेनदेन कर (एसटीटी) की समीक्षा, विदेशी पूंजी के प्रवाह को मजबूत करने तथा आम उपभोक्ता को खाद्य महंगाई से राहत देने की जरूरत अब आर्थिक बहस के केंद्र में है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र, एक अधिवक्ता के रूप में मेरा स्पष्ट मत है कि बजट 2027 में इस विषय को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।भारत को विदेशी निवेशकों से केवल पूंजी नहीं, बल्कि दीर्घकालिक भरोसा,बेहतर बाजार-गहराई,रोजगार और उद्योगों के विस्तार के लिए वित्त भी चाहिए।सरकार एलटीसीजी को समाप्त करने या उसकी दर कम करने, एसटीटी की समीक्षा करने और दीर्घकालिक निवेश को प्रोत्साहित करने वाले विकल्पों पर विचार कर सकती है। हालांकि,करों में कटौती से विदेशी निवेश की वापसी सुनिश्चित नहीं होती,क्योंकि वैश्विक ब्याज दरें,डॉलर की मजबूती, कंपनियों की कमाई और भू-राजनीतिकजोखिम भी निर्णायक होते हैं।इसलिए राजस्व पर प्रभाव,निवेश की अवधि और बाजार की स्थिरता को ध्यान में रखते हुए संतुलित सुधार आवश्यक हैं।मेरा सुझाव है कि बजट 2027 में कम-से-कम स्पष्ट कर-नीति,दीर्घकालिक निवेशकों के लिए प्रोत्साहन और एसटीटी की प्रतिस्पर्धात्मक समीक्षा अवश्य होनी चाहिए।भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने दूसरी बड़ी चुनौती खाद्य महंगाई की है।जिसपर वित्तमंत्री सहित पूरे शासकीय प्रशासकीय तंत्र को तुरंत सजगता से रेखांकित करने की सटीकता से खास ज़रूरत है।
साथियों बात अगर हम एलटीसीजी और एसटीटी पर फैसला: विदेशी निवेशकों को रोकने की चुनौती, बजट 2027 से बड़ी उम्मीदों को समझने की करें तो,भारतीय शेयर बाजार की सबसे बड़ी चिंताओं में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की लगातार बिकवाली शामिल है।तथा एसबीआई रिसर्च की अक्टूबर 2026 में सामने आई रिपोर्ट में सुझाव दिया गया कि इक्विटी पर दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ कर समाप्त करने तथा निवेश की न्यूनतम अवधि दो से तीन वर्ष करने पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। रिपोर्ट का उद्देश्य अल्पकालिक, अस्थिर विदेशी पूंजी के प्रभाव को कम करना और दीर्घकालिक निवेश को प्रोत्साहित करना है। रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर में उस समय तक विदेशी निवेशक लगभग 44,166 करोड़ रूपए की इक्विटी बेच चुके थे और वर्ष 2026 में उनकी कुल निकासी लगभग 3.04 लाख करोड़ रूपए बताई गई।इन आंकड़ों को रिपोर्ट के प्रकाशन-समय के आंकड़ों के रूप में समझना चाहिए, पूरे वर्ष का अंतिम परिणाम नहीं।
साथियों,वर्तमान व्यवस्था में पात्र सूचीबद्ध इक्विटी शेयरों और इक्विटी-केंद्रित म्यूचुअल फंडों की एक वर्ष से अधिक की निर्धारित अवधि के बाद होने वाली बिक्री से प्राप्त कुल पात्र दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ में ₹1.25 लाख से अधिक की राशि पर सामान्यत 12.5 प्रतिशत एलटीसीजी कर लागू होता है। वहीं, प्रतिभूति लेनदेन कर यानी एसटीटी लेनदेन के प्रकार के अनुसार अलग- अलग दरों पर लगता है। एक अप्रैल 2026 से शेयरों की डिलीवरी आधारित खरीद और बिक्री पर 0.1 प्रतिशत प्रति पक्ष, इंट्राडे बिक्री पर 0.025 प्रतिशत, वायदा कारोबार पर 0.05 प्रतिशत और विकल्प कारोबार के प्रीमियम पर 0.15 प्रतिशत की दर लागू है; प्रयोग किए गए विकल्पों पर भी निर्धारित आधार पर 0.15 प्रतिशत एसटीटी लगता है। इसलिए एसटीटी को एक ही दर वाला कर बताना सही नहीं होगा।ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम 2026 में वित्तमंत्री ने एलटीसीजी और एसटीटी में बदलाव का कोई स्पष्ट आश्वासन नहीं दिया।उन्होंने कहा कि बजट की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं और सरकार निवेशकों के विचार सुनने को तैयार है, लेकिन इस स्तर पर संभावित प्रस्तावों पर प्रतिबद्धता जताना जल्दबाजी होगी। इस रुख को करों में बदलाव की स्वीकृति या अस्वीकृति, किसी भी रूप में अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता।
साथियों बात अगर हम चावल की कीमतों में आग: कमजोर फसल,त्योहारों की मांग और वैश्विक खाद्य सुरक्षा की परीक्षा को समझने की करें तो,भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने दूसरी बड़ी चुनौती खाद्य महंगाई की है। चावल केवल एक कृषि उत्पाद नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों की थाली, किसानों की आय, निर्यात कारोबार और वैश्विक खाद्य सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। रॉयटर्स की 17 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, कमजोर मानसून और बुवाई क्षेत्र में कमी के कारण भारत का चावल उत्पादन लगभग 154 मिलियन टन से घटकर 144 मिलियन टन रह सकता है, अर्थात करीब 10 मिलियन टन की गिरावट का अनुमान है। यह गिरावट घरेलू उपलब्धता और निर्यात कीमतों पर दबाव डाल सकती है। भारतीय चावल निर्यातक महासंघ के अनुसार, भारत के पांच प्रतिशत टूटे सफेदचावल का निर्यात मूल्य लगभग 385-390 डॉलर प्रति मीट्रिक टन है, जबकि वियतनाम का भाव 440-450 डॉलर और थाईलैंड का लगभग 480 डॉलर प्रति टन बताया गया है। इस प्रकार भारतीय चावल अभी भी प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति में है। हालांकि, घरेलू खुदरा बाजार में कुछ किस्मों के दाम में कुछ ही दिनों में 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी का दावा अलग-अलग स्थानीय बाजारों के संदर्भ में सत्यापित किए बिना पूरे देश पर सटीकता से लागू नहीं किया जाना चाहिए।
साथियों, सरकारी भंडार को लेकर भी सावधानी जरूरी है। उपलब्ध रिपोर्ट में एक सितंबर को भारत का चावल भंडार लगभग 59.6 मिलियन टन बताया गया था, जो निर्धारित बफर आवश्यकता से अधिक है। इसलिए 38 मिलियन टन के आंकड़े को वर्तमान कुल सरकारी भंडार का अंतिम आंकड़ा मानने से पहले संबंधित तारीख और भंडार की परिभाषा स्पष्ट करना आवश्यक है। पर्याप्त भंडार होने के बावजूद परिवहन लागत, स्थानीय आपूर्ति, व्यापारियों की जमाखोरी और मौसमी मांग के कारण खुदरा कीमतें बढ़ सकती हैं।इसी पृष्ठभूमि में भारत अंतरराष्ट्रीय चावल सम्मेलन 2026 (बीआईआरसी) 23, 24 और 25 अक्टूबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित होने जा रहा है। भारतीय चावल निर्यातक महासंघ सटीकता से इसका आयोजन कर रहा है।
साथियों, सम्मेलन का दूसरा संस्करण व निर्यातकों अंतरराष्ट्रीय खरीदारों, आयातकों, नीति-निर्माताओं, बैंकिंग, बीमा, पैकेजिंग और परिवहन क्षेत्र को एक मंच पर लाएगा। इसमें नौ ज्ञान-सत्र, कारोबारी बैठकें और चावल व्यापार के भविष्य पर चर्चा निर्धारित है। यह सम्मेलन भारतीय निर्यातकों के लिए नए बाजार तलाशने, भुगतान जोखिम घटाने, गुणवत्ता मानकों को समझने और दीर्घकालिक विदेशी खरीदारों से संबंध बनाने का अवसर है। लेकिन इसका वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब बढ़ती उत्पादन लागत और घरेलू उपभोक्ता की जरूरतों के बीच संतुलन बनाया जाए। सरकार को त्योहारों से पहले आपूर्ति की समीक्षा,जमाखोरी पर निगरानी और जरूरत पड़ने पर खुले बाजार में पर्याप्त अनाज उपलब्ध कराने पर ध्यान देना चाहिए।यह सम्मेलन भारतीय निर्यातकों के लिए नए बाजार तलाशने, भुगतान जोखिम घटाने, गुणवत्ता मानकों को समझने और दीर्घकालिक विदेशी खरीदारों से संबंध बनाने का अवसर है। लेकिन इसका वास्तविक लाभ तभी मिलेगा जब बढ़ती उत्पादन लागत और घरेलू उपभोक्ता की जरूरतों के बीच संतुलन बनाया जाए। सरकार को त्योहारों से पहले आपूर्ति की समीक्षा, जमाखोरी पर निगरानी और जरूरत पड़ने पर खुले बाजार में पर्याप्त अनाज उपलब्ध कराने पर ध्यान देना चाहिए।
साथियों चीनी की स्थिति भी कम चिंताजनक नहीं है। मीडिया में आई जानकारी के अनुसार,16 अक्टूबर को घोषित 2026-27 के लिए इथेनॉल आपूर्ति संबंधी व्यवस्था में गन्ने के रस,सिरप और बी-हैवी शीरे से चीनी -आधारित इथेनॉल बनाने के लिए चीनी का इस्तेमाल नहीं करने का प्रावधान किया गया है, ताकि घरेलू चीनी आपूर्ति सुरक्षित रखी जा सके। कमजोर वर्षा से महाराष्ट्र और कर्नाटक में गन्ना उत्पादन पर दबाव तथा त्योहारों की मांग कीमतों को प्रभावित कर रही है। इससे स्पष्ट है कि खाद्य महंगाई का समाधान केवल भंडार गिनने से नहीं, बल्कि उत्पादन, वितरण और समय पर सरकारी हस्तक्षेप से निकलेगा।
साथियों बात अगर हम ट्रंप का रूस संबंधी टैरिफ यू-टर्न: भारत को राहत, लेकिन अनिश्चितता बरकरार, इसको समझने की करें तो, 17 अक्टूबर 2026 को अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा रूस से संबंधित प्रतिबंधों और प्रस्तावित दंडात्मक शुल्कों के क्रियान्वयन पर छूट देने की खबर वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है।संबंधित अमेरिकी कानून में रूस से तेल और गैस खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का प्रावधान था। इससे पहले 500 प्रतिशत तक शुल्क लगाने की संभावना भी चर्चा में रही थी।ट्रंप प्रशासन ने राष्ट्रीय हितों का हवाला देते हुए कई उपायों को फिलहाल रोक दिया है। इसे सभी व्यापारिक शुल्कों की स्थायी समाप्ति नहीं समझना चाहिए; भविष्य की नीति अभी भी बदल सकती है। भारत के लिए इसका पहला लाभ रूसी तेल खरीद पर संभावित अतिरिक्त अमेरिकी दंड का तत्काल जोखिम कम होना है। यदि भारत को प्रतिस्पर्धात्मक दरों पर कच्चा तेल मिलता रहता है, तो तेल आयात बिल, चालू खाते और घरेलू महंगाई पर दबाव कम हो सकता है। इससे रुपये को अप्रत्यक्ष समर्थन और तेल विपणन, परिवहन, विमानन तथा कुछ विनिर्माण कंपनियों को राहत मिल सकती है। वैश्विक स्तर पर भी अतिरिक्त व्यापारिक तनाव टलने से ऊर्जा बाजार को कुछ स्थिरता मिल सकती है।हालांकि, यह राहत सशर्त है। पश्चिम एशिया का संघर्ष, तेल आपूर्ति में व्यवधान, डॉलर की मजबूती और भविष्य में अमेरिकी नीति में बदलाव फिर बाजारों में अस्थिरता पैदा कर सकते हैं। भारतीय और अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजार के लिए इसलिए केवल ट्रंप के बयान से अधिक महत्वपूर्ण यह होगा कि कच्चे तेल की कीमतें, विदेशी निवेश का प्रवाह और कंपनियों की कमाई सटीकता से किस दिशा में जाती है।
साथियों बात अगर हम रिलायंस जियो का ऐतिहासिक आईपीओ और स्टारलिंक की चुनौती को समझने की करें तो, भारतीय पूंजी बाजार के लिए अक्टूबर का सबसे बड़ा घटनाक्रम रिलायंस समूह की डिजिटल और दूरसंचार इकाई जियो प्लेटफॉर्म्स का प्रस्तावित आईपीओ है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, आईपीओ 21 अक्टूबर को खुलेगा और 23 अक्टूबर 2026 को बंद होगा। इसका आकार लगभग ₹37,700 करोड़ बताया गया है, जबकि रॉयटर्स की रिपोर्ट में लगभग 3.2 अरब डॉलर जुटाने का लक्ष्य दर्ज है। दोनों आंकड़े अलग-अलग मूल्यांकन और रिपोर्टिंग आधारों से जुड़े हैं। यह भारत के सबसे बड़े सार्वजनिक निर्गमों में शामिल होने की संभावना रखता है। इतने बड़े आईपीओ से शेयर बाजार में नई पूंजी जुटाने की क्षमता, डिजिटल अर्थव्यवस्था और दूरसंचार क्षेत्र में निवेशकों का भरोसा प्रदर्शित हो सकता है। दूसरी ओर, निवेशकों के पास सीमित पूंजी होने सेआईपीओ में भारी रकम लगने पर कुछ समय के लिए दूसरे शेयरों में मांग प्रभावित होने कीआशंका भी रहती है।अंततः इसका असर निर्गम की कीमत, निवेशकों की प्रतिक्रिया और लिस्टिंग के बाद कंपनी के प्रदर्शन पर सटीकता से निर्भर करेगा।
साथियों, इसी बीच एलन मस्क की स्टारलिंक भारत में उपग्रह आधारित हाई-स्पीड इंटरनेट सेवा शुरू करने की तैयारी का संकेत दे रही है। कंपनी ने भारतीय नेटवर्क, गेटवे और आवश्यक बुनियादी ढांचे की तैयारी तथा अनुमतियों से संबंधित दावे किए हैं। रिलायंस ने जवाब में कहा है कि भारत में कारोबार करने वाली सभी कंपनियों को समान सरकारी नियमों और मंजूरी प्रक्रियाओं का पालन करना चाहिए; रिपोर्टों के अनुसार, रिलायंस की अपनी उपग्रह इंटरनेट सेवाएं भी आवश्यक मंजूरियों की प्रतीक्षा में हैं। इस प्रतिस्पर्धा का व्यापक आर्थिक महत्व है। उपग्रह इंटरनेट ग्रामीण क्षेत्रों, दूरदराज के उद्योगों, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं औरडिजिटल कारोबार को लाभ पहुंचा सकता है। वहीं, जियो और अन्य दूरसंचार कंपनियों के लिए नई प्रतिस्पर्धा कीमतों, निवेश और तकनीकी नवाचार को प्रभावित करेगी। हालांकि, सेवा की शुरुआत, अंतिम नियामकीय स्वीकृति और व्यावसायिक उपलब्धता को अलग-अलग समझना जरूरी है।
क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

