कविता
नामदान लेने से ही कोई,सच्चा सत्संगी नहीं कहलाता,
सत्संग भवन जाने से ही,मन निर्मल नहीं हो जाता।
जिसके हृदय में प्रेम,दया और परोपकार का वास है,
वही सच्चा सत्संगी है,जिसके कर्मों में प्रभु का एहसास है
रजिस्टर में नाम दर्ज होने से,सेवा का सम्मान नहीं मिलता
गले में बैच पहन लेने से,हृदय में अभिमान नहीं मिटता।
सेवा वह नहीं,जो केवल दुनियाँ को दिखलाई जाती है,
सच्ची सेवा वह है,जो निःस्वार्थ भाव से निभाई जाती है।
जो अपने माँ-बाप को सत्संग भवन छोड़ने आता है,
सत्संग पूर्ण होने पर फ़िर उन्हें लेने जाता है।
वह नास्तिक हो,न नामदान लिया,न सत्संग में जाता हो
माता-पिता की सेवा में,सच्चे सेवादार का धर्म निभाता हो
माथे का तिलक नहीं,मन की पवित्रता पहचान बनती है,
माला के मनकों से बढ़कर,सेवा भावना अनमोल बनती है
प्रभु को पाने की चाह में,अपनों का दिल मत दुखाना,
माता-पिता को छोड़कर नहीं, साथ लेकर धर्म निभाना।
सत्संग की सच्ची शिक्षा है,हर प्राणी से प्यार करो,
माता-पिता की सेवा करके,जीवन का उद्धार करो।
किशन नाम,बैच और दिखावे से,ऊँचा उठकर कर्म करो,
प्रभु को मंदिर में खोजने से पहले,इंसानियत में दर्शन करो
