कसम जब भी उठे तो सत्य की चौखट पर उठनी चाहिए,
कदम जब भी बढ़े तो इंसानियत की राह चुननी चाहिए,
कलम जब भी चले तो ज़मीर की आवाज़ बनकर चले,
इन तीनों में किसी की दुनियाँ बदलने की ताक़त होती है।
झूठी कसम रिश्तों के विश्वास को राख कर जाती है,
गलत दिशा में उठा कदम कई ज़िंदगियाँ उजाड़ जाता है,
बेलगाम कलम किसी बेगुनाह की इज़्ज़त चीर सकती है,
एक छोटी-सी नासमझी उम्र भर का दर्द छोड़ जाती है।
कदम ऐसे बढ़ाओ कि पीछे दुआओं के निशान रह जाएँ,
क़सम ऐसी निभाओ कि टूटते रिश्तों में प्राण आ जाएँ,
कलम ऐसी चलाओ,दबे हुए सच को आवाज़ मिल जाए,
तुम्हारे होने से किसी मायूस चेहरे पर मुस्कान आ जाए।
कलम को नफ़रत की आग नहीं,संवाद का दीपक बनाओ
कदम को अहंकार नहीं,कमज़ोर का सहारा बनाओ,
कसम को स्वार्थ की ज़ंजीर नहीं,विश्वास की डोर बनाओ,
इंसान हो इंसानियत को अपने किरदार का गौरव बनाओ
याद रखना,कसम टूटे तो भरोसे का घर टूट जाता है,
कदम बहके तो अपनों का साथ कहीं पीछे छूट जाता है,
किशन कलम बहके तो शब्द नहीं,किसी का दिल चीरता है
कसम,कदम और कलम सँभालो,इन्हीं से इंसान की वीरता है



