सुप्रीम कोर्ट का आरोप और अपराध के बीच न्यायिक सुरक्षा-कवच! -वैवाहिक विवादों में पॉक्सो के दुरुपयोग पर अंकुश; गिरफ्तारी से कस्टडी तक नए मानदंड तय हुए
न्याय के तराजू पर सच्चाई की जीत- सुप्रीम कोर्ट के तीन बड़े संदेश! -पॉक्सो दुरुपयोग पर सुरक्षा-कवच,डोंबिवली पार्षद की जमानत रद्द और दिल्ली- एनसीआर यौन अपराधों पर स्वतःसंज्ञान -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत में न्यायपालिका को आम नागरिक न्याय की अंतिम आशा के रूप में देखता है शासन -प्रशासन, संस्था अथवा किसी शक्तिशाली व्यक्ति के विरुद्ध शिकायत हो या दो सामान्य नागरिकों के बीच विवाद, संविधान के समक्ष समानता और विधि के शासन का मूल सिद्धांत यही है कि न्यायिक प्रक्रिया व्यक्ति की हैसियत नहीं,कानून और साक्ष्यों को देखे।सितंबर 2026 के अंतिम सप्ताह में सर्वोच्च न्यायालय से जुड़े तीन घटनाक्रमों ने न्याय,सुरक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के इसी संतुलन को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र बताना चाहूंगा क़ि 28 सितंबर को न्यायालय ने दिल्ली- एनसीआर में हाल की यौन अपराध की घटनाओं,जिनमें चलती स्लीपर बस में नाबालिग के साथ कथित सामूहिक यौन अपराध भी शामिल है,का स्वतः संज्ञान लेकर इसे 2012 के निर्भया प्रकरण की पीड़ादायक याद दिलाने वाला बताया और सार्वजनिक स्थानों की सुरक्षा तथा प्रशासनिक जवाबदेही पर सवाल उठाए।इसी दिन महाराष्ट्र के डोंबिवली स्थित शास्त्रीनगर अस्पताल में चिकित्सकों पर कथित हमले के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने एक राजनीतिक पार्टी के पार्षद को मिली जमानत पर रोक लगाते हुए तीन दिनों में आत्मसमर्पण का निर्देश दिया और चिकित्सा समुदाय की सुरक्षा पर कठोर संदेश दिया।तीसरा और दूरगामी घटनाक्रम 24 सितंबर 2026 का आर बनाम ई एवं अन्य,2026 आईएनएससी 1049 फैसला है,जिसमें वैवाहिक एवं बाल-अभिरक्षा विवादों के बीच पॉक्सो कानून के संभावित दुरुपयोग को रोकने के लिए सर्वोच्च न्यायालय ने विस्तृत सुरक्षा उपाय निर्धारित किए।
साथियों दिल्ली-एनसीआर की घटना में सर्वोच्च न्यायालय ने स्वयं संज्ञान लेते हुए अपनी रजिस्ट्री को जनहित मामला दर्ज करने का निर्देश दिया।उपलब्ध विवरण के अनुसार 16 वर्षीय लड़की के साथ चलती स्लीपर बस में चालक और परिचालक द्वारा कथित सामूहिक यौन अपराध का मामला सामने आया था। न्यायालय ने कहा कि पार्क,बस जैसे सार्वजनिक स्थान कमजोर प्रकाश व्यवस्था, अपर्याप्त निगरानी और प्रशासनिक कमियों के कारण उच्च जोखिम वाले क्षेत्र नहीं बनने दिए जा सकते।नाबालिग से यौन अपराध के मामलों में लैंगिक अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (पॉक्सो) के प्रासंगिक प्रावधान तथा तथ्य के अनुसार भारतीय न्याय संहिता,2023 के यौन अपराध संबंधी प्रावधान लागू हो सकते हैं; हालांकि किसी विशेष धारा का अंतिम निर्धारण प्राथमिकी, पीड़िता के बयान,चिकित्सकीय-साक्ष्य और आरोपपत्र पर निर्भर करता है।अतःन्यायालय के स्वतः संज्ञान को किसी आरोपी के अपराध का अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।
साथियों, दूसरी ओर डोंबिवली अस्पताल प्रकरण सत्ता या सामाजिक प्रभाव से ऊपर कानून के शासन का महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है। रमेश म्हात्रे और अन्य पर चिकित्सकों एवं अस्पताल कर्मचारियों से कथित मारपीट का मामला है। प्राथमिकी में भारतीय न्याय संहिता की धारा 132 लोक सेवक को कर्तव्य निर्वहन से रोकने के लिए हमला या आपराधिक बल,धारा121(1) लोक सेवक को चोट पहुंचाने से संबंधित प्रावधान, धारा 351(1) आपराधिक धमकी, धारा 352 जानबूझकर अपमान,धारा 189 (2) विधिविरुद्ध जमाव और धारा 191(2) दंगा सहित प्रावधान लगाए जाने की खबर है। मामले में महाराष्ट्र के चिकित्सा सेवा कर्मियों और चिकित्सा संस्थानों में हिंसा एवं संपत्ति की क्षति रोकने संबंधी विशेष राज्य कानून के प्रावधान भी लगाए गए हैं।सर्वोच्च न्यायालय ने 28 सितंबर को उच्च न्यायालय द्वारा दी गई जमानत पर रोक लगाते हुए आरोपी को तीन दिनों में आत्मसमर्पण का निर्देश दिया। पीठ के समक्ष उसके पूर्व आपराधिक मामलों का रिकॉर्ड भी विचार में आया।महत्वपूर्ण है कि मुकदमा अभी न्यायिक प्रक्रिया में है, इसलिए आरोपों को अंतिम दोषसिद्धि के समान नहीं समझा जाना चाहिए।
साथियों इन घटनाक्रमों में सबसे व्यापक कानूनी प्रभाव वाला निर्णय आर बनाम ई एवं अन्य,सिविल अपील संख्या 13119/ 2026, विशेष अनुमति याचिका (सिविल) संख्या 1092/2024 से उत्पन्न संबंधित आपराधिक अपीलों तथा अवमानना याचिका संख्या 208/2024 है। माननीय दो सदस्यों की पीठ के सामने माता-पिता के बीच लंबे समय से चल रहा वैवाहिक एवं बच्चे की अभिरक्षा का विवाद था।बच्चे का जन्म 2015 में हुआ था।बेंगलुरु परिवार न्यायालय ने मार्च 2022 में अभिरक्षा पिता को दी,जिसे जनवरी 2023 में कर्नाटक उच्च न्यायालय और बाद में सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती असफल होने के बाद प्रभावी रखा गया। इसके बाद 2024 में मां की ओर से पिता तथा परिवार के सदस्यों के विरुद्ध बच्चे के यौन शोषण का आरोप लगाते हुएमामला दर्ज कराया गया, जिसमें पॉक्सो अधिनियम की धारा 10,किशोर न्याय (बालकों की देखरेख औरसंरक्षण) अधिनियम की धारा 75 तथा तत्कालीन भारतीय दंड संहिता के प्रावधान शामिल थे।आरोपों की असाधारण गंभीरता देखते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने अप्रैल 2026 में जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो को सौंपी और बाल एवं किशोर मनोचिकित्सा तथा नैदानिक मनोविज्ञान विशेषज्ञों की सहायता लेने की व्यवस्था की। जांच में बच्चे के बयान, सीसीटीवी दृश्य, चिकित्सा- मनोवैज्ञानिक सामग्री तथा परिस्थितियों का परीक्षण किया गया। न्यायालय के समक्ष आई सीबीआई सामग्री में आरोप विश्वसनीय नहीं पाए गए और न्यायालय ने निष्कर्ष निकाला कि आपराधिक कार्यवाही जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। फलतः संबंधित प्राथमिकी और कार्यवाही रद्द कर दी गई तथा बच्चे की कानूनी अभिरक्षा पिता के पास बनाए रखने का निर्देश दिया गया। न्यायालय ने फैसले की शुरुआत में इस गंभीर परिस्थिति को रेखांकित किया कि जब माता-पिता की कटुता बच्चे के यौन उत्पीड़न के अनुचित आरोप तक पहुंच जाए तो विवाद बिल्कुल अलग और अत्यंत गंभीर आयाम सटिका से ग्रहण कर लेता है।
साथियों, इस निर्णय का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष भविष्य के मामलों के लिए बनाया गया न्यायिक सुरक्षा-कवच है। जहां बच्चे के साथ रहने वाले माता-पिता अथवा परिवार के सदस्य के विरुद्ध पॉक्सो अपराध का आरोप हो और माता-पिता के बीच वैवाहिक विवाद भी मौजूद हो, वहां जांच अधिकारी को गिरफ्तारी के प्रश्न पर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 35 के मानकों का कठोरता से पालन करना होगा। ऐसे मामलों में बाल एवं किशोर मनोचिकित्सा अथवा नैदानिक मनोविज्ञान विशेषज्ञ की सहायता लेकर बच्चे का स्वतंत्र मूल्यांकन कराया जाना महत्वपूर्ण सुरक्षा उपाय बनाया गया है। विशेषज्ञ सामान्यतःपॉक्सो नियम, 2020 के नियम 5 के अंतर्गत जिला बाल संरक्षण इकाई के उपलब्ध विशेषज्ञों में से लिया जा सकता है। इसका उद्देश्य बच्चे पर किसी प्रकार के प्रभाव, परिस्थितियों और उसके कथन को पेशेवर दृष्टि से समझने में जांच की सहायता करना है। सर्वोच्च न्यायालय ने एक और अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत स्पष्ट किया,केवल पॉक्सो प्राथमिकी दर्ज हो जाना आरोप को सत्य सिद्ध नहीं करता और न उससे किसी माता-पिता का अभिरक्षा या संरक्षकत्व का दावा स्वतः समाप्त होता है।परिवार न्यायालय को उपलब्ध सामग्री और जांच के तथ्यों के आधार पर स्वतंत्र प्रथमदृष्टया राय बनानी होगी।इसी प्रकार पॉक्सो अधिनियम की धारा 33 के अंतर्गत विशेष न्यायालय के सामने सीधे निजी शिकायत आने पर भी,निर्धारित परिस्थितियों में संज्ञान लेने और प्रक्रिया आगे बढ़ाने से पहले बच्चे के विशेषज्ञ मूल्यांकन को अन्य सामग्री के साथ देखा जाना चाहिए। पॉक्सो अधिनियम की धारा 22 झूठी शिकायत या झूठी सूचना की कुछ परिस्थितियों के लिए दंड का प्रावधान करती है,लेकिन न्यायालय का मूल उद्देश्य वास्तविक पीड़ित बच्चों की सुरक्षा को कमजोर करना नहीं,बल्कि कानून को वैवाहिक प्रतिशोध का साधन बनने से रोकना है।
साथियों, इस फैसले की अंतरराष्ट्रीय विधिक दृष्टि से भी बड़ी प्रासंगिकता है, क्योंकि बाल-अधिकार न्यायशास्त्र का मूल तत्व बच्चे का सर्वोत्तम हित है।एक तरफ वास्तविक यौन अपराध की शिकायत को अत्यंत संवेदनशीलता और तत्परता से लेना आवश्यक है, तो दूसरी तरफ बच्चे को माता-पिता के संघर्ष में हथियार बनाना स्वयं उसके मनोवैज्ञानिक कल्याण को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।सर्वोच्च न्यायालय ने इसी द्वंद्व के बीच संतुलित रास्ता तलाशने का प्रयास किया है,न वास्तविक पीड़ित की आवाज दबे, न निर्दोष व्यक्ति केवल आरोप के कारण अपरिवर्तनीय सामाजिक, पारिवारिक और व्यक्तिगत क्षति का शिकार बने। इसीलिए फैसले की प्रतियां सभी उच्च न्यायालयों के रजिस्ट्रार जनरल और राज्यों-केंद्रशासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों के माध्यम से आपराधिक न्यायालयों और पुलिस तंत्र तक पहुंचाने का निर्देश इसकी राष्ट्रीय महत्ता को दर्शाता है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि सितंबर 2026 के ये न्यायिक घटनाक्रम कानून के तीन अलग लेकिन परस्पर जुड़े आयाम सामने रखते हैं, सार्वजनिक स्थान पर महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा, चिकित्सकों जैसे सार्वजनिक सेवा प्रदाताओं की सुरक्षा और अत्यंत कठोर बाल-सुरक्षा कानून के संभावित दुरुपयोग से नागरिक स्वतंत्रता की रक्षा। न्याय का वास्तविक अर्थ केवल अपराधी को दंडित करना नहीं, बल्कि वास्तविक पीड़ित को संरक्षण देना, निर्दोष को अनुचित दंडात्मक प्रक्रिया से बचाना और बच्चे के सर्वोत्तम हित को हर संघर्ष से ऊपर रखना भी है। ‘आर बनाम ई एवं अन्य’ का निर्णय इसलिए महज एक वैवाहिक विवाद का पटाक्षेप नहीं, बल्कि देशभर की पुलिस, विशेष पॉक्सो अदालतों और परिवार न्यायालयों के लिए यह महत्वपूर्ण संदेश है कि बाल-सुरक्षा कानून की कठोरता अक्षुण्ण रहे, किंतु आरोप को अपने-आप अपराध का प्रमाण न मान लिया जाए—क्योंकि न्याय की विश्वसनीयता अंततः निष्पक्ष जांच, साक्ष्य, प्रक्रिया और सत्य के संतुलन पर ही टिकी रहती है।
क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318


