तीन दिन की बैंक महा हड़ताल :पांच-दिवसीय बैंकिंग से कर्मचारियों के बढ़ते बोझ तक -सरकार,बैंककर्मी और जनता के बीच क्यों गहराया टकराव?
भारतीय बैंकिंग के सामने बड़ा सवाल -काम का बढ़ता बोझ या कर्मचारियों की घटती ताकत? 8 लाख बैंक कर्मियों की 3 दिवसीय बैंक महा हड़ताल ने खोली भारतीय बैंकिंग व्यवस्था की बड़ी बहस -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत का मामला गूंज उठा हैक़ि बैंकिंग क्षेत्र 28 से 30 सितंबर 2026 के बीच एक बड़े औद्योगिक टकराव की दहलीज पर खड़ा है। यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (यूएफबीयू) ने तीन दिवसीय राष्ट्रव्यापी हड़ताल का आह्वान किया है और मांगों का समाधान नहीं होने पर 26 अक्टूबर 2026 से अनिश्चितकालीन हड़ताल की चेतावनी भी दी है।यूएफबीयू सात बैंक यूनियनों का साझा मंच है औरउसके अनुसार लगभग आठ लाख कर्मचारी- अधिकारी तथा बैंकिंग कार्यबल का करीब 90 प्रतिशत हिस्सा उसके दायरे में आता है।यह आंदोलन इसलिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि 30 सितंबर बैंकों की छमाही लेखा- बंदी का दिन है। ऐसे समय में लगातार तीन कार्यदिवस शाखा-स्तरीय गतिविधियों में व्यवधान का असर केवल बैंक कर्मचारियों और ग्राहकों तक सीमित न रहकर व्यापार, चेक निपटान, नकदी प्रबंधन,ऋण संबंधी प्रक्रियाओं और व्यापक वित्तीय गतिविधियों तक पहुंच सकता है।मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र मीडिया में आई खबरों के अनुसार बताना चाहूंगा क़ि,हड़ताल के केंद्र में सबसे बड़ी मांग पांच-दिवसीय बैंकिंग व्यवस्था लागू करने की है। वर्तमान व्यवस्था में बैंक दूसरे और चौथे शनिवार को बंद रहते हैं, जबकि पहले, तीसरे और जहां लागू हो पांचवें शनिवार को शाखाएं खुलती हैं।यूनियनें सभी शनिवारों को अवकाश घोषित करने की मांग कर रही हैं।उनका तर्क है कि सोमवार से शुक्रवार तक दैनिक कार्य- अवधि बढ़ाकर इसकी भरपाई की जा सकती है,जिससे ग्राहकों के लिए कुल बैंकिंग समय में उल्लेखनीय कमी आवश्यक नहीं होगी। मार्च 2024 के वेतन संशोधन समझौते के दौरान भारतीय बैंक संघ और यूनियनों के बीच पांच-दिवसीय बैंकिंग पर सहमति बनी और प्रस्ताव सरकारी स्वीकृति के लिए भेजा गया था; लेकिन अंतिम सरकारी मंजूरी और आवश्यक अधिसूचना अभी लंबित है। यही वह बिंदु है जहां दोनों पक्षों की व्याख्या अलग हो जाती है,यूनियनें इसे सहमत मांग के क्रियान्वयन में दो वर्ष से अधिक की देरी मानती हैं,जबकि सरकार का कहना है कि प्रस्ताव विचाराधीन है और अंतिम निर्णय के लिए विभिन्न हितधारकों के पहलुओं को देखना आवश्यक है।
साथियों, विवाद का दूसरा बड़ा मुद्दा प्रदर्शन- आधारित प्रोत्साहन योजना यानी पीएलआई रहा है।वर्ष 2020 के वेतन समझौते से जुड़ी प्रोत्साहन व्यवस्था के बाद वरिष्ठ अधिकारियों के लिए संशोधित योजना को लेकर अधिकारी संगठनों ने आपत्ति जताई। विवाद बढ़ने के बाद सरकार ने पीएलआई योजना को फिलहाल स्थगित रखने का निर्णय लिया है। वित्त मंत्रालय ने 21 सितंबर को स्पष्ट किया कि यूनियनों की दो प्रमुख मांगों पांच- दिवसीय बैंकिंग और पीएलआई वापस लेने,में से पीएलआई को स्थगित करके एक प्रमुख मुद्दे कासमाधान किया जा चुका है;अब मुख्य विवाद पांच- दिवसीय कार्य सप्ताह पर केंद्रित है। सरकार ने यूनियनों से आंदोलन स्थगित कर बातचीत जारी रखने की अपील भी की है। पेंशन संशोधन, समान पेंशन व्यवस्था तथा कर्मचारियों की कुछ अन्य सेवा-शर्तें भी व्यापक श्रमिक असंतोष का हिस्सा रही हैं।
साथियों,इस आंदोलन के पीछे कार्यबल और बढ़ते काम के बोझ का प्रश्न भी गंभीर है।सरकारी आँकड़ों के अनुसार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में कर्मचारियों की संख्या 2020- 21 में लगभग 7.90 लाख थी,जो 2024- 25 में घटकर करीब 7.58 लाख रह गई, अर्थात लगभग 32 हजार अथवा करीब 4 प्रतिशत की कमी।जून 2025 तक इन बैंकों में 32,567 पद रिक्त थे,जिनमें 17,500 अधिकारी 12,861 लिपिक और 2,206 अधीनस्थ कर्मचारी पद शामिल थे।हालांकि सरकार का पक्ष है कि आवश्यक कार्यबल का लगभग 96 प्रतिशत उपलब्ध था, पिछले पांच वर्षों में 1,48,687 कर्मचारियों की भर्ती की गई और 2025-26 के लिए 48,570 कर्मचारियों की भर्ती प्रक्रिया भी शुरू की गई थी। इसलिए कर्मचारियों की कमी के प्रश्न पर भी दो दृष्टिकोण हैं,यूनियनें बढ़ते कारोबार और लक्ष्य के मुकाबले अपर्याप्त मानव संसाधन का मुद्दा उठाती हैं,जबकि सरकार उपलब्ध कार्यबल और जारी भर्तियों की ओर संकेत करती है।
साथियों,बैंक कर्मचारियों के मानसिक दबाव का मुद्दा फरवरी 2026 में राज्यसभा तक पहुंचा था। केरल से सीपीआई (एम) सांसद ने सदन में दावा किया कि पिछले एक दशक में काम के दबाव,उत्पीड़न और अत्यधिक लक्ष्यों जैसी परिस्थितियों से जुड़े मामलों में करीब 500 बैंक कर्मचारियों ने आत्महत्या की।उन्होंने सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में हजारों रिक्त पदों और कर्मचारियों पर बढ़ते दबाव का भी उल्लेख किया तथा गुजरात, तमिलनाडु और केरल के कुछ मामलों का उदाहरण दिया।यहां सावधानी आवश्यक है,करीब 500 आत्महत्याओं की संख्या को आरबीआई अथवा सरकार द्वारा जारी प्रमाणित राष्ट्रीय आधिकारिक आँकड़े के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा; यह संसद में सांसद द्वारा उठाया गया दावा है,जिसकी पृष्ठभूमि में बैंक कर्मचारियों की कार्यस्थितियों पर पहले प्रकाशित रिपोर्टें भी रही हैं।
साथियों,तीन दिवसीय हड़ताल का सर्वाधिक प्रत्यक्ष प्रभाव सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की शाखाओं में दिखाई देने की संभावना है।नकद जमा-निकासी,चेक समाशोधन खाते से संबंधित दस्तावेजी कार्य,ऋण प्रक्रियाएं और शाखा- आधारित सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं।30 सितंबर छमाही समापन का दिन होने के कारण लेखा- मिलान,प्रावधान तथा कोष और बाजार संबंधी गतिविधियों पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। हालांकि इसका अर्थ पूरे भारतीय बैंकिंग तंत्र का ठप हो जाना नहीं है। यूपीआई, मोबाइल बैंकिंग, इंटरनेट बैंकिंग और एटीएम जैसी डिजिटल सेवाओं के सामान्य रूप से उपलब्ध रहने की अपेक्षा है।निजी बैंकों पर प्रभाव अपेक्षाकृत सीमित रहने की संभावना है, हालांकि जिन निजी बैंकों में संबंधित यूनियनों के सदस्य हैं वहां कुछ स्थानीय व्यवधान संभव है। सहकारी बैंकों पर प्रभाव भी उनकी यूनियन-संबद्धता और स्थानीय भागीदारी पर निर्भर करेगा;अतः सभी निजी और सहकारी बैंक स्वतः तीन दिन बंद रहेंगे, ऐसा कहना सही नहीं होगा।
साथियों सरकार ने संभावित परेशानी कम करने के लिए एक असाधारण कदम उठाते हुए रविवार 27 सितंबर 2026 को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों को सामान्य रूप से खोलने का निर्णय लिया रविवार को बैंक के खुली रही। रिजर्व बैंक ने शाखाओं, कार्यालयों, एटीएम से संबद्ध शाखाओं और मुद्रा-कोषों को पूर्ण संचालन की अनुमति दी थीं।सरकार का तर्क था कि 26 सितंबर के सप्ताहांत अवकाश और 28-30 सितंबर की प्रस्तावित हड़ताल के बीच रविवार भी बंद रहने पर जनता को लंबी अवधि तक शाखा सेवाओं में व्यवधान झेलना पड़ सकता था। लेकिन इस निर्णय का कर्मचारी संगठनों के एक हिस्से ने विरोध किया था।ऑल संभवतः इंडिया बैंक ऑफिसर्स एसोसिएशन ने अपने सदस्यों से रविवार को काम पर न आने की सलाह देते हुए कहा था कि 27 सितंबर औद्योगिक व्यवस्था के तहत अवकाश का दिन है और पहले से तय सेवा-शर्तों में एकतरफा बदलाव नहीं किया जाना चाहिए।
साथियों यह आंदोलन भारतीय बैंकिंग व्यवस्था के सामने एक व्यापक प्रश्न खड़ा करता है,जब डिजिटल बैंकिंग खातों,ऋण,सरकारी योजनाओं बीमा-वितरण और वित्तीय समावेशन के कारण बैंकों की जिम्मेदारियां लगातार बढ़ रही हैं, तब कर्मचारियों के कार्य-जीवन संतुलन और ग्राहक-सुविधा के बीच नया संतुलन कैसे बनाया जाए? पांच-दिवसीय बैंकिंग के समर्थक कहते हैं कि भारतीय बैंकिंग को अन्य आधुनिक वित्तीय संस्थानों की कार्य-संस्कृति के अनुरूप लाने का समय आ गया है; दूसरी ओर सरकार को ग्राहक पहुंच,ग्रामीण बैंकिंग, कार्य -घंटों और अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभाव सहित कई पक्षों का आकलन करना है।उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों से कर्मचारियों की संख्या में 2020-21 से 2024-25 के बीच लगभग चार प्रतिशत गिरावट जरूर दिखाई देती है, लेकिन 2026 तक बैंक खातों, मुनाफे और काम में कितने प्रतिशत की वृद्धि हुई” का एकल समेकित तुलनीय आरबीआई आँकड़ा उपलब्ध स्रोतों में स्पष्ट रूप से प्रमाणित नहीं मिला; इसलिए अपुष्ट प्रतिशत जोड़ना उचित नहीं होगा।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरी विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि यदि कहा जाए कि 28 से 30 सितंबर की प्रस्तावित तीन दिवसीय बैंक हड़ताल केवल शनिवार की छुट्टी का संघर्ष नहीं, बल्कि बैंकिंग क्षेत्र में कार्य-जीवन संतुलन, मानव संसाधन, बढ़ते कार्यभार, कर्मचारी कल्याण और ग्राहक सुविधा के बीच संतुलन की बड़ी बहस बन चुकी है, तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। सरकार ने पीएलआई को स्थगित करके एक विवाद को फिलहाल शांत किया है,लेकिन पांच-दिवसीय बैंकिंग का मूल प्रश्न अभी अनसुलझा है। तीन दिवसीय हड़ताल के बाद 26 अक्टूबर से प्रस्तावित अनिश्चितकालीन आंदोलन की चेतावनी इस विवाद को और गंभीर बनाती है।इसलिए सरकार, भारतीय बैंक संघ और कर्मचारी संगठनों के बीच समयबद्ध समाधान केवल बैंक कर्मचारियों के हित में नहीं, बल्कि करोड़ों खाताधारकों व्यापार-जगत और भारतीय अर्थव्यवस्था की निर्बाध वित्तीय धड़कन के लिए भी आवश्यक है।
क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318



