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क्या शिक्षा सेवा है या बाज़ार? स्कूलों में कॉपी- किताब, यूनिफॉर्म और शैक्षणिक सामग्री की अनिवार्य खरीद पर राष्ट्रीय विमर्श की आवश्यकता

by Page 3 News International Desk
July 3, 2026
in Hindi Editorials, Hindi News
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अभिभावक विद्यालय प्रबंधन के ग्राहक नहीं, शिक्षा के साझेदार हैं -विश्वास, सहयोग और पारदर्शिता पर आधारित संबंध ही किसी भी उत्कृष्ट विद्यालय की पहचान होते हैं

क्या विद्यालय ज्ञान के मंदिर बने रहेंगे या धीरे- धीरे बाज़ार का विस्तार बन जाएँगे? इसका उत्तर सरकार, विद्यालय प्रबंधन, शिक्षकों,अभिभावकों और समाज सभी को मिलकर देना होगा -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं की गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत में प्रत्येक वर्ष जुलाई का महीना लाखों करोड़ों विद्यार्थियों और अभिभावकों के लिए नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत का प्रतीक होता है। नई कक्षाएँ,नए सपने, नई पुस्तकें,नई वर्दी और नई उम्मीदें, ये सब मिलकर शिक्षा का उत्सव रचते हैं। किंतु इसी उत्सव के बीच एक ऐसी समस्या लगातार गहराती जा रही है,जो शिक्षा के मूल उद्देश्य पर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है। देश के अनेक निजी विद्यालयों में अभिभावकों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से किसी विशेष दुकान अथवा स्वयं विद्यालय से ही पुस्तकें, कॉपियाँ, यूनिफॉर्म, जूते, बैग तथा अन्य शैक्षणिक सामग्री खरीदने के लिए बाध्य किए जाने की शिकायतें वर्षों से सामने आती रही हैं।इससे शिक्षा का उद्देश्य ज्ञानार्जन से हटकर व्यावसायिक गतिविधि का रूप लेता दिखाई देता है। 2 जुलाई 2026 को महाराष्ट्र विधानसभा में शालेय शिक्षण मंत्री ने इस विषय पर सरकार का पक्ष स्पष्ट करते हुए महत्वपूर्ण संदेश दिया। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार का उद्देश्य प्रत्येक पात्र विद्यार्थी तक शैक्षणिक सत्र के प्रारंभ में ही आवश्यक सामग्री समय पर पहुँचाना है। यदि किसी जिले या विद्यालय में वितरण में देरी अथवा अनियमितता होती है, तो उसकी जिम्मेदारी तय कर संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की जाएगी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि कोई भी निजी विद्यालय अभिभावकों को किसी एक विशेष दुकान से पुस्तकें, यूनिफॉर्म या अन्य शाला सामग्री खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। यदि ऐसी शिकायतें प्राप्त होती हैं, तो संबंधित विद्यालयों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं कि यह वक्तव्य केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि पूरे भारत की शिक्षा व्यवस्था के लिए एक नीति- संदेश के रूप में देखा जाना चाहिए।दरअसल, भारत का संविधान शिक्षा को समान अवसर का आधार मानता है। शिक्षा का अधिकार केवल विद्यालय में प्रवेश तक सीमित नहीं है, बल्कि ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करना भी राज्य की जिम्मेदारी है जिसमें आर्थिक स्थिति किसी बच्चे की शिक्षा में बाधा न बने। यदि किसी अभिभावक को बाजार में उपलब्ध समान गुणवत्ता की पुस्तकें या यूनिफॉर्म कम कीमत पर मिल सकती हैं, फिर भी उसे विद्यालय द्वारा निर्धारित विक्रेता से ही खरीदने के लिए बाध्य किया जाता है,तो यह प्रतिस्पर्धा उपभोक्ता अधिकार और शिक्षा की नैतिकता, सटीक रूप से तीनों के विरुद्ध है।
साथियों, देश के अनेक शहरों और कस्बों में यह देखा गया है कि कुछ विद्यालय विशेष प्रकाशकों से समझौता कर ऐसी पुस्तकें निर्धारित कर देते हैं जो सामान्य बाजार में उपलब्ध नहीं होतीं।कई विद्यालय अपनी अलग अभ्यास पुस्तिकाएँ भी अनिवार्य कर देते हैं। इसी प्रकार यूनिफॉर्म के लिए भी एक निश्चित दुकान तय कर दी जाती है। परिणामस्वरूप अभिभावकों के पास विकल्प समाप्त हो जाता है और उन्हें अधिक कीमत चुकानी पड़ती है। कई बार एक ही गुणवत्ता की सामग्री खुले बाजार में काफी कम मूल्य पर उपलब्ध होती है, लेकिन विद्यालय की शर्तों के कारण उसका लाभ नहीं मिल पाता।भारत जैसे देश में,जहाँ बड़ी संख्या में परिवार मध्यमवर्गीय और निम्न आय वर्ग से आते हैं, शिक्षा पर होने वाला अतिरिक्त व्यय परिवार की आर्थिक व्यवस्था को गंभीर रूप से प्रभावित करता है। कई अभिभावकों को बच्चों की फीस, परिवहन, पुस्तकें, यूनिफॉर्म और अन्य खर्चों के लिए ऋण लेना पड़ता है। यदि शैक्षणिक सामग्री की खरीद में प्रतिस्पर्धा और विकल्प समाप्त कर दिए जाएँ, तो यह आर्थिक बोझ और बढ़ जाता है। शिक्षा का उद्देश्य सामाजिक समानता स्थापित करना है, न कि आर्थिक असमानता को और गहरा करना।
साथियों, शासकीय विद्यालयों की स्थिति इससे भिन्न होते हुए भी चुनौतियों से मुक्त नहीं है। केंद्र और राज्य सरकारें विद्यार्थियों को निःशुल्क पाठ्य पुस्तकें,यूनिफॉर्म,बैग तथा अन्य आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराने के लिए बड़ी धनराशि खर्च करती हैं।कई राज्यों में वितरण प्रक्रिया में देरी,आपूर्ति संबंधी समस्याएँ अथवा प्रशासनिक लापरवाही जैसी शिकायतें सामने आती हैं। महाराष्ट्र विधानसभा में मंत्री द्वारा अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की बात इसी दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। यदि निर्धारित समय पर सामग्री विद्यार्थियों तक पहुँचेगी, तभी सरकारी योजनाओं का वास्तविक उद्देश्य पूरा होगा।आज आवश्यकता केवल सामग्री उपलब्ध कराने की नहीं, बल्कि उसकी गुणवत्ता, समयबद्धता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की भी है। यदि पुस्तकें सत्र शुरू होने के कई सप्ताह बाद मिलती हैं, तो विद्यार्थी प्रारंभिक अध्ययन से वंचित हो जाते हैं। यदि यूनिफॉर्म समय पर नहीं मिलती, तो आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों को सामाजिक असहजता का सामना करना पड़ता है। इसलिए वितरण व्यवस्था का वैज्ञानिक और डिजिटल प्रबंधन समय की मांग है।
साथियों, यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारत में शिक्षा का निजीकरण तेजी से बढ़ा है। निजी विद्यालयों ने शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, लेकिन शिक्षा सेवा और व्यावसायिक गतिविधि के बीच संतुलन बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है। अधिकांश निजी विद्यालय नियमों का पालन करते हैं, किंतु कुछ संस्थानों की गलत कार्यप्रणालियाँ पूरे निजी शिक्षा क्षेत्र की छवि को प्रभावित करती हैं। इसलिए नियमों का समान और निष्पक्ष पालन आवश्यक है।शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि विद्यालय केवल पाठ्यक्रम पढ़ाने का केंद्र नहीं, बल्कि नैतिक मूल्यों का भी निर्माण करते हैं। यदि विद्यालय स्वयं पारदर्शिता, निष्पक्षता और उपभोक्ता अधिकारों का सम्मान नहीं करेंगे, तो विद्यार्थियों में इन मूल्यों का विकास कैसे होगा? शिक्षा संस्थानों का आचरण स्वयं विद्यार्थियों के लिए सबसे बड़ा पाठ होता है।
साथियों, अभिभावकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। यदि किसी विद्यालय द्वारा किसी विशेष दुकान से सामग्री खरीदने का दबाव बनाया जाता है, तो अभिभावकों को सामूहिक रूप से विद्यालय प्रबंधन से संवाद करना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर संबंधित शिक्षा अधिकारी अथवा सक्षम प्रशासनिक प्राधिकारी के समक्ष शिकायत भी प्रस्तुत की जा सकती है। जागरूक नागरिक ही पारदर्शी व्यवस्था की नींव होते हैं।आज डिजिटल तकनीक इस समस्या का व्यावहारिक समाधान भी प्रस्तुत करती है। प्रत्येक विद्यालय अपनी पुस्तक सूची, यूनिफॉर्म का डिज़ाइन, आवश्यक सामग्री और उनकी विशिष्टताएँ सार्वजनिक पोर्टल पर उपलब्ध करा सकता है। इससे अभिभावक किसी भी अधिकृत विक्रेता से निर्धारित मानकों के अनुरूप सामग्री खरीद सकेंगे। प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, कीमतें नियंत्रित रहेंगी और पारदर्शिता सटीकता से स्वतः स्थापित होगी।
साथियों, राष्ट्रीय स्तर पर भी ऐसी नीति विकसित करने की आवश्यकता है जिसमें स्पष्ट रूप से यह प्रावधान हो कि विद्यालय किसी एक दुकान, विक्रेता या प्रकाशक से खरीद को अनिवार्य नहीं बना सकेंगे।विद्यालय केवल गुणवत्ता और विनिर्देश निर्धारित करें,खरीद का विकल्प अभिभावकों के पास रहे। यदि कोई विशेष सामग्री विद्यालय द्वारा तैयार की गई हो,तो उसकी कीमत, लागत और वितरण प्रक्रिया भी पारदर्शी होनी चाहिए।उपभोक्ता अधिकारों के दृष्टिकोण से भी यह विषय अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रत्येक नागरिक को अपनी पसंद के विक्रेता से वस्तु खरीदने का अधिकार है। यदि किसी संस्था द्वारा यह स्वतंत्रता सीमित की जाती है, तो यह निष्पक्ष व्यापार की भावना के विपरीत है। शिक्षा संस्थानों को इस सिद्धांत का सम्मान करना चाहिए।
साथियों, विद्यालय प्रबंधन को भी यह समझना होगा कि अभिभावक उनके ग्राहक नहीं, बल्कि शिक्षा के साझेदार हैं। विश्वास,सहयोग और पारदर्शिता पर आधारित संबंध ही किसी भी उत्कृष्ट विद्यालय की पहचान होते हैं। अल्पकालिक आर्थिक लाभ के लिए यदि अभिभावकों का विश्वास खो दिया जाए, तो संस्था की सामाजिक प्रतिष्ठा भी प्रभावित होती है।समाज के स्तर पर भी हमें यह स्वीकार करना होगा कि शिक्षा को व्यापार नहीं बनने देना है। विद्यालयों का मूल्यांकन केवल भवन, परिणाम या सुविधाओं से नहीं,बल्कि उनकी नैतिकता, पारदर्शिता और सामाजिक उत्तरदायित्व से भी होना चाहिए। जो विद्यालय अभिभावकों को विकल्प देते हैं, उचित मूल्य सुनिश्चित करते हैं और विद्यार्थियों के हित को सर्वोपरि रखते हैं, वे वास्तव में आदर्श शिक्षा संस्थान कहलाने के अधिकारी हैं।महाराष्ट्र विधानसभा में मंत्री द्वारा दिया गया संदेश इसी व्यापक राष्ट्रीय सोच का प्रतिनिधित्व करता है कि शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता जवाबदेही और अभिभावकों के अधिकारों की रक्षा अनिवार्य है। यदि इस भावना को सभी राज्य अपनाएँ और प्रभावी रूप से लागू करें, तो करोड़ों परिवारों को आर्थिक राहत मिलेगी तथा शिक्षा व्यवस्था में जनता का विश्वास और सटीकता से मजबूत होगा।
साथियों, अंतरराष्ट्रीय अनुभव भी यही बताते हैं कि विकसित देशों में अधिकांश विद्यालय आवश्यक सामग्री की सूची उपलब्ध कराते हैं, लेकिन खरीद का विकल्प अभिभावकों पर छोड़ते हैं। इससे प्रतिस्पर्धा बनी रहती है, कीमतें नियंत्रित रहती हैं और परिवारों पर अनावश्यक आर्थिक दबाव नहीं पड़ता। भारत भी इस दिशा में प्रभावी कदम उठाकर शिक्षा प्रणाली को और अधिक पारदर्शी तथा जनहितकारी बना सकता है।शासन की जिम्मेदारी केवल नियम बनाने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। नियमित निरीक्षण, ऑनलाइन शिकायत निवारण प्रणाली, समयबद्ध जांच, दोषी संस्थानों पर दंडात्मक कार्रवाई तथा शिकायतकर्ताओं कीगोपनीयता सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है। जब तक नियमों का प्रभावी क्रियान्वयन नहीं होगा, तब तक केवल दिशा-निर्देश पर्याप्त सिद्ध नहीं होंगे।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे कि यह प्रश्न केवल कॉपी, पुस्तक, बैग या यूनिफॉर्म का नहीं है। यह प्रश्न शिक्षा के चरित्र का है। क्या विद्यालय ज्ञान के मंदिर बने रहेंगे या धीरे-धीरे बाज़ार का विस्तार बन जाएँगे? इसका उत्तर सरकार, विद्यालय प्रबंधन, शिक्षकों, अभिभावकों और समाज—सभी को मिलकर देना होगा। जब प्रत्येक विद्यार्थी को समय पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सामग्री मिले, अभिभावकों को खरीद की स्वतंत्रता प्राप्त हो, सरकारी योजनाओं का लाभ बिना विलंब पहुँचे और निजी विद्यालय पूर्ण पारदर्शिता से कार्य करें, तभी भारत की शिक्षा व्यवस्था वास्तव में समावेशी, न्यायपूर्ण, उत्तरदायी और विश्वस्तरीय बन सकेगी। यही शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य है और यही विकसित भारत की मजबूत नींव भी।

संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318

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