सिर्फ डॉक्टर नहीं,पूरा सिंडिकेट निशाने पर: पीसीपीएनडीटी अधिनियम को और कठोर बनाने की दिशा में महाराष्ट्र सरकार का संभावित बड़ा कदम
कन्या भ्रूण हत्या में डॉक्टर के साथ दलाल, एजेंट,अवैध सोनोग्राफी केंद्र, नकली दस्तावेज तैयार करने वाले लोग तथा आर्थिक लाभ के लिए संगठित रूप से काम करने वाले गिरोह शामिल होना मकोका का आधार -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र
गोंदिया – वैश्विक स्तरपर भारत को सदियों से मातृशक्ति की पूजा करने वाली सभ्यता माना जाता है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।” अर्थात जहाँ नारी का सम्मान होता है, वहीं देवताओं का वास होता है। किंतु विडंबना यह है कि आधुनिक विज्ञान की प्रगति का कुछ लोगों ने दुरुपयोग कर कन्या भ्रूण हत्या जैसे अमानवीय अपराध को जन्म दिया अल्ट्रासोनोग्राफी जैसी तकनीक, जिसका उद्देश्य गर्भस्थ शिशु के स्वास्थ्य की रक्षा करना था,उसे भ्रूण के लिंग का अवैध परीक्षण कर बेटियों के जन्म से पहले ही उनका जीवन समाप्त करने के साधन के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा। यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि संविधान, मानवाधिकार, महिला सम्मान और मानवता पर सीधा प्रहार है।इसी गंभीर सामाजिक चुनौती से निपटने के लिए भारत सरकार ने वर्ष 1994 में प्री- कन्सेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्नीक्स (लिंग चयन प्रतिषेध) अधिनियम (पीसीपीएनडीटी एक्ट) लागू किया,जिसे वर्ष 2003 में और अधिक कठोर बनाया गया। इस कानून का मूल उद्देश्य स्पष्ट है,गर्भधारण से पहले या गर्भावस्था के दौरान किसी भी प्रकार का लिंग चयन अथवा भ्रूण का लिंग बताना पूर्णतः प्रतिबंधित है। कानून केवल डॉक्टरों पर ही नहीं, बल्कि ऐसे पूरे तंत्र पर लागू होता है जो अवैध लिंग परीक्षण या कन्या भ्रूण हत्या में किसी भी रूप में शामिल हो। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र बताना चाहूंगा कि हाल के वर्षों में महाराष्ट्र सहित देश के अनेक राज्यों में सामने आए मामलों ने यह संकेत दिया है कि लिंग परीक्षण का अवैध कारोबार अब केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं रह गया है। इसमें दलाल,एजेंट,अवैध सोनोग्राफी केंद्र,नकली दस्तावेज तैयार करने वाले लोग तथा आर्थिक लाभ के लिए संगठित रूप से काम करने वाले गिरोह शामिल पाए जा रहे हैं।विशेष रूप से पुणे में सामने आए चर्चित प्रकरण ने पूरे राज्य और देश का ध्यान आकर्षित किया। विधानसभा में इस मामले का उल्लेख करते हुए कई जनप्रतिनिधियों ने इसे संगठित अपराध की श्रेणी में रखने की आवश्यकता पर बल दिया और कहा कि केवल डॉक्टर को दंडित करने से समस्या का समाधान नहीं होगा,बल्कि पूरे अपराधी नेटवर्क को ध्वस्त करना होगा।इसी पृष्ठभूमि में 1 जुलाई 2026 को महाराष्ट्र विधानसभा में स्वास्थ्य मंत्री ने स्पष्ट संकेत दिए कि सरकार पीसीपीएनडीटी कानून को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए गंभीरता से विचार कर रही है।उन्होंने कहा कि यदि कोई गिरोह बार-बार अवैध लिंग परीक्षण और कन्या भ्रूण हत्या जैसे अपराधों में शामिल पाया जाता है, तो उसके विरुद्ध और अधिक कठोर कानूनी प्रावधानों के उपयोग की संभावनाओं का परीक्षण किया जाएगा। साथ ही संबंधित विभागों को निगरानी मजबूत करने, डिकॉय ऑपरेशन बढ़ाने, पंजीकृत सोनोग्राफी केंद्रों का नियमित निरीक्षण करने तथा दोषियों के विरुद्ध शीघ्र अभियोजन सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए।
साथियों, आज आवश्यकता केवल कानून बनाने की नहीं बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन की है। देश में हजारों पंजीकृत सोनोग्राफी केंद्र संचालित हैं,जहाँ प्रत्येक जांच का रिकॉर्ड निर्धारित प्रारूप में रखना अनिवार्य है। रिकॉर्ड में हेराफेरी,गलत जानकारी देना अथवा आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध न कराना भी कानून के अंतर्गत दंडनीय अपराध है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि चिकित्सा तकनीक का उपयोग केवल चिकित्सकीय आवश्यकता के लिए हो,न कि भ्रूण के लिंग का पता लगाने के लिए।पीसीपीएनडीटीअधिनियम के तहत पहली बार अपराध सिद्ध होने पर तीन वर्ष तक का कारावास और जुर्माने का प्रावधान है। पुनरावृत्ति की स्थिति में पाँच वर्ष तक की सजा तथा अधिक जुर्माना लगाया जा सकता है। संबंधित चिकित्सक का पंजीकरण निलंबित या रद्द किया जा सकता है तथा सोनोग्राफी केंद्र का लाइसेंस भी समाप्त किया जा सकता है। किंतु प्रश्न यह है कि यदि अपराध संगठित रूप से किया जा रहा हो, तो क्या इतनी सजा पर्याप्त है? यही प्रश्न आज राष्ट्रीय बहस का विषय बन चुका है।
साथियों, वास्तव में कन्या भ्रूण हत्या का प्रभाव केवल एक परिवार तक सीमित नहीं रहता। इसका दुष्परिणाम पूरे समाज पर पड़ता है। जब बाल लिंगानुपात लगातार असंतुलित होता है,तब भविष्य में विवाह योग्य महिलाओं की संख्या घटती है, जिससे मानव तस्करी,जबरन विवाह महिलाओं के विरुद्ध अपराध और सामाजिक असंतुलन जैसी गंभीर समस्याएँ जन्म लेती हैं। इसलिए यह केवल स्वास्थ्य विभाग का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक न्याय, महिला अधिकार और सतत विकास का भी विषय है।भारत ने “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” जैसे अभियानों के माध्यम से समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास किया है। अनेक राज्यों में बालिका शिक्षा, कन्या जन्म प्रोत्साहन और महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए योजनाएँ चलाई जा रही हैं। किंतु यदि दूसरी ओर अवैध लिंग परीक्षण का कारोबार चलता रहेगा, तो इन सभी प्रयासों की प्रभावशीलता सीमित हो जाएगी। इसलिए कानून और सामाजिक जागरूकता दोनों का समान महत्व है।
साथियों, विशेषज्ञों का मानना है कि अब समय आ गया है जब केवल अपराध होने के बाद कार्रवाई करने के बजाय अपराध की पूरी श्रृंखला को समाप्त करने की रणनीति अपनाई जाए।इसमें डिजिटल रिकॉर्ड, अल्ट्रासाउंड मशीनों की ट्रैकिंग,कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी, अंतरराज्यीय समन्वय, वित्तीय लेन-देन की जांच और मुखबिर तंत्र को मजबूत करना जैसे उपाय अत्यंत उपयोगी सिद्ध हो सकते हैं। जिस प्रकार मादक पदार्थों की तस्करी, हवाला, मानव तस्करी और संगठित अपराध के विरुद्ध नेटवर्क आधारित कार्रवाई की जाती है, उसी प्रकार अवैध लिंग परीक्षण के नेटवर्क पर भी प्रहार आवश्यक है।यह भी ध्यान रखना होगा कि सभी चिकित्सकों को संदेह की दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। देश के अधिकांश डॉक्टर कानून का पालन करते हैं और मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अतः कार्रवाई केवल उन्हीं व्यक्तियों और संस्थानों पर होनी चाहिए जो जानबूझकर कानून का उल्लंघन करते हैं। इससे ईमानदार चिकित्सा समुदाय का सम्मान भी सुरक्षित रहेगा और दोषियों को कठोर दंड भी मिलेगा।
साथियों, न्यायिक प्रक्रिया को भी अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता है। यदि गंभीर मामलों में वर्षों तक मुकदमे लंबित रहेंगे,तो कानून का भय कम हो जाएगा। इसलिए ऐसे मामलों के लिए विशेष अदालतें,समयबद्ध सुनवाई, वैज्ञानिक साक्ष्य और प्रभावी अभियोजन व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए। दोषसिद्धि की दर बढ़ेगी तो अपराध स्वतःकम होंगे।राष्ट्रीय स्तर पर केंद्र और राज्यों के बीच बेहतर समन्वय भी अत्यंत आवश्यक है। कईe बार अपराधी एक राज्य में पंजीकरण कर दूसरे राज्य में अवैध गतिविधियाँ संचालित करते हैं। ऐसे मामलों में साझा डिजिटल डेटाबेस, संयुक्त जांच और नियमित सूचना आदान-प्रदान से अपराधियों पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है।
साथियों, समाज की मानसिकता में परिवर्तन भी उतना ही महत्वपूर्ण है जितना कानून। जब तक पुत्र और पुत्री के बीच भेदभाव की सोच समाप्त नहीं होगी, तब तक केवल कानूनी कठोरता पर्याप्त नहीं होगी। परिवार, विद्यालय, धार्मिक संस्थाएँ, सामाजिक संगठन, मीडिया और जनप्रतिनिधियों को मिलकर यह संदेश देना होगा कि बेटी बोझ नहीं, बल्कि परिवार, समाज और राष्ट्र की समान भागीदार है।यदि महाराष्ट्र सरकार द्वारा विचाराधीन कठोर कदम प्रभावी रूप से लागू होते हैं और अन्य राज्य भी उनसे प्रेरणा लेते हैं, तो यह पूरे देश के लिए एक नया मॉडल बन सकता है। इससे स्पष्ट संदेश जाएगा कि कन्या भ्रूण हत्या केवल चिकित्सा नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि मानवता के विरुद्ध गंभीर अपराध है, जिसके लिए किसी भी प्रकार की नरमी स्वीकार नहीं की जाएगी।
अतः ग्राम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन करें इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे के कहा जा सकता है कि विकसित भारत का सपना तभी साकार होगा जब प्रत्येक बेटी को जन्म लेने, जीने, शिक्षा प्राप्त करने और सम्मानपूर्वक आगे बढ़ने का समान अवसर मिलेगा। पीसीपीएनडीटी अधिनियम केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि भारत की बेटियों के जीवन, समानता और गरिमा की रक्षा का संवैधानिक संकल्प है। यदि इस कानून का कठोर, पारदर्शी और निष्पक्ष क्रियान्वयन आधुनिक तकनीक, सामाजिक जागरूकता और प्रभावी न्यायिक व्यवस्था के साथ किया जाए, तो वह दिन दूर नहीं जब अवैध लिंग परीक्षण और कन्या भ्रूण हत्या जैसे अपराध इतिहास का विषय बन जाएंगे। यही सच्चे अर्थों में महिला सम्मान, सामाजिक न्याय, सुशासन और विकसित भारत की दिशा में सबसे बड़ी उपलब्धि होगी।
संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9226229318
