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अमेरिकन व्हाइट-कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट 2026- एच-1बी वीजा से ग्रीन कार्ड का रास्ता बंद करने की कवायद, भारतीय पेशेवरों और छात्रों के लिए नई चुनौती?

by Page 3 News International Desk
June 7, 2026
in Hindi Editorials
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टारगेट भ्रष्टाचार ज़ीरो टॉलरेंस @ 2029 -भारत में भ्रष्टाचार- विरोधी कानूनों, नियमों और सेवा विनियमों की धाराओं में लीकेज का प्रश्न?- सख़्त संशोधन की तात्कालिक आवश्यकता?

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अमेरिकन व्हाइट-कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट 2026 और भारत की वैश्विक रणनीति: क्या भारत पहले से कर रहा है संभावित झटके की तैयारी?

भारतीय मेक इन इंडिया, डिजिटल इंडिया, सेमीकंडक्टर मिशन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इलेक्ट्रॉनिक्स निर्माण तथा वैश्विक सप्लाई चेन से भारतीय प्रतिभा को नई ऊंचाइयों तक ले जाने का प्रयास -एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र

गोंदिया – वैश्विक प्रतिभा, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और आर्थिक राष्ट्रवाद के बीच अमेरिका की आव्रजन नीति एक नए निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। राष्ट्रपति ट्रम्प के सत्ता में लौटने के बाद अमेरिकीप्रशासन ने कानूनी आव्रजन कार्यक्रमों, विशेषकर एच-1बी वीजा प्रणाली, पर लगातार सख्ती का रुख अपनाया है। उच्च वेतन आधारित चयन प्रणाली की वकालत, वीजाआवेदनों की कड़ी जांच, रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड प्रक्रिया में बाधाएं, विदेशी श्रमिकों की भर्ती पर बढ़ती निगरानी, अमेरिकी कर्मचारियों को प्राथमिकता देने वाली नीतियां तथा विदेशी छात्रों के लिए उपलब्ध अवसरों को सीमित करने जैसे अनेक कदम इस व्यापक नीति परिवर्तन का हिस्सा माने जा रहे हैं। इसी क्रम में टेक्सास से रिपब्लिकन सांसद द्वारा अमेरिकी संसद में प्रस्तुत अमेरिकन व्हाइट-कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट 2026 ने वैश्विक स्तर पर बहस छेड़ दी है। यदि यह विधेयक कानून का रूप लेता है तो एच-1बी वीजा धारकों के लिए ग्रीन कार्ड प्राप्त करने का मार्ग अत्यंत कठिन हो जाएगा, वीजा अवधि घट सकती है, ओपीटी कार्यक्रम समाप्त हो सकता है और अमेरिका में कार्यरत लगभग 12 लाख भारतीय मूल के पेशेवरों तथा उनके परिवारों के भविष्य पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है। यह केवल एक आव्रजन सुधार प्रस्ताव नहीं, बल्कि अमेरिका की बदलती आर्थिक, राजनीतिक और श्रम नीति का प्रतीक माना जा रहा है। मैं एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र यह मानता हूं क़ि एच-1बी वीजा पिछले कई दशकों से अमेरिका की तकनीकी और नवाचार आधारित अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण स्तंभ रहा है। इस कार्यक्रम के माध्यम से अमेरिकी कंपनियां विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित जैसे क्षेत्रों में उच्च कौशल वाले विदेशी पेशेवरों को नियुक्त करती हैं। विशेष रूप से भारतीय आईटी पेशेवरों ने इस कार्यक्रम का सबसे अधिक लाभ उठाया है।विश्व की प्रमुख प्रौद्योगिकी कंपनियों में कार्यरत हजारों भारतीय इंजीनियर, सॉफ्टवेयर डेवलपर, डेटा वैज्ञानिक और अनुसंधान विशेषज्ञ एच-1बी वीजा के माध्यम से अमेरिका पहुंचे हैं। यही कारण है कि एच-1बी वीजा में किसी भी प्रकार का परिवर्तन भारत के तकनीकी समुदाय और छात्रों के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण विषय बन जाता है।
साथियों वैश्विक भू-राजनीति, आर्थिक राष्ट्रवाद और प्रतिभा आधारित प्रतिस्पर्धा के इस दौर में अमेरिका द्वारा प्रस्तावित अमेरिकन व्हाइट-कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट 2026 केवल एक आव्रजन सुधार विधेयक नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे वैश्विक प्रतिभा प्रवाह, तकनीकी सहयोग और अंतरराष्ट्रीय श्रम बाजार के पुनर्गठन के संकेत के रूप में भी देखा जा रहा है। विशेष रूप से भारत के संदर्भ में यह विधेयक अत्यंत महत्वपूर्ण है,क्योंकि एच- 1बी वीजा प्रणाली के सबसे बड़े लाभार्थियों में भारतीय पेशेवर शामिल हैं। पिछले कुछ वर्षों में राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा अपनाई गई अमेरिका फर्स्ट नीति, कानूनी और अवैध दोनों प्रकार के आव्रजन पर सख्ती,एच-1बी वीजानियमों की समीक्षा तथा अमेरिकी नौकरियों को प्राथमिकता देने की रणनीति ने भारत को यह संकेत पहले ही दे दिया था कि भविष्य में अमेरिकी श्रम बाजार भारतीय पेशेवरों के लिए पहले जैसा खुला नहीं रह सकता। यही कारण है कि भारत समानांतर रूप से अपने आर्थिक, व्यापारिक और रणनीतिक विकल्पों को मजबूत करने में जुटा हुआ दिखाई देता है।
साथियों, रिपब्लिकन सांसद का तर्क है कि लगभग चार दशकों के इतिहास में एच-1बी कार्यक्रम का व्यापक दुरुपयोग हुआ है। उनके अनुसार अमेरिकी नियोक्ताओं ने कम वेतन पर विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त कर अमेरिकी विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित क्षेत्र के कर्मचारियों के अवसरों को सीमित किया है। उनका दावा है कि कंपनियों ने कर्मचारियों की कथित कमी का हवाला देकर सस्ते विदेशी श्रमिकों को प्राथमिकता दी जबकि अनेक अमेरिकी नागरिक रोजगार और वेतन संबंधी चुनौतियों का सामना करते रहे। इसी सोच के आधार पर उन्होंने अमेरिकन व्हाइट- कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट प्रस्तुत किया है, जिसका घोषित उद्देश्य अमेरिकी व्हाइट-कॉलर कर्मचारियों के हितों की रक्षा करना है।इस विधेयक का सबसे विवादास्पद प्रावधान एच-1बी वीजा से ग्रीन कार्ड तक पहुंचने के रास्ते को समाप्त करने की दिशा में उठाया गया कदम है। वर्तमान व्यवस्था में एच-1बी धारक अमेरिका में कार्य करते हुए रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन कर सकते हैं। यही कारण है कि लाखों विदेशी पेशेवर अमेरिका में दीर्घकालिक करियर और पारिवारिक भविष्य की योजना बनाते हैं। प्रस्तावित कानून इस अवधारणा को बदलना चाहता है। इसके अनुसार एच-1बी वीजा केवल अस्थायी कार्य वीजा रहेगा और इसे स्थायी निवास प्राप्त करने के साधन के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकेगा। इससे अमेरिका में बसने की आकांक्षा रखने वाले लाखों लोगों की योजनाओं पर सटीकता से गहरा प्रभाव पड़ सकता है।
साथियों, विधेयक का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू ड्यूल इंटेंट सिद्धांत को कमजोर करना है।वर्तमान प्रणाली में एच -1बी धारक अमेरिका में अस्थायी रूप से काम करते हुए भविष्य में स्थायी निवास के लिए आवेदन कर सकते हैं। लेकिन प्रस्तावित व्यवस्था में आवेदक को यह साबित करना होगा कि उसका स्थायी निवास अमेरिका के बाहर है और वह अंततः अपने देश लौटने का इरादा रखता है। यह परिवर्तन अमेरिकी आव्रजन दर्शन में एक बड़े बदलाव का संकेत देता है, क्योंकि इससे एच-1बी वीजा का स्वरूप मूलतः अस्थायी रोजगार कार्यक्रम तकसीमित हो जाएगा।विधेयक में एच-1बी वीजा की अधिकतम अवधि छह वर्ष से घटाकर केवल दो वर्ष करने काप्रस्ताव भी शामिल है। वर्तमान में अधिकांश पेशेवर छह वर्षों तक अमेरिका में रहकर कार्य कर सकते हैं और ग्रीनकार्ड प्रक्रिया लंबित होने की स्थिति में अतिरिक्त विस्तार भी प्राप्त कर सकते हैं। यदि नई व्यवस्था लागू होती है तो कंपनियों के लिए दीर्घकालिक प्रतिभा प्रबंधन कठिन हो सकता है। कर्मचारियों को भी अपने करियर और पारिवारिक निर्णयों को लेकर अधिक अनिश्चितता का सामना करना पड़ सकता है।
साथियों, एक अन्य महत्वपूर्ण बदलाव ग्रीन कार्ड प्रक्रिया लंबित रहने की स्थिति में मिलने वाले वीजा विस्तार को समाप्त करना है। आज अनेक भारतीय पेशेवर वर्षों तक ग्रीन कार्ड की प्रतीक्षा सूची में रहते हैं और इस दौरान एच-1बी विस्तार के माध्यम से अमेरिका में कार्य करते रहते हैं। प्रस्तावित कानून इस सुविधा को समाप्त कर सकता है। परिणामस्वरूप हजारों लोग ग्रीन कार्डस्वीकृत होने से पहले ही अमेरिका छोड़ने के लिए बाध्य हो सकते हैं।इस विधेयक का एक और महत्वपूर्ण आयामवैकल्पिक व्यावहारिक प्रशिक्षण अर्थात ओपीटी कार्यक्रम को समाप्त करने का प्रस्ताव है।ओपीटी अमेरिकी विश्वविद्यालयों से शिक्षा प्राप्त करने वाले विदेशी छात्रों को डिग्री पूर्ण करने के बाद सीमित अवधि तक अमेरिका में कार्य करने का अवसर देता है। भारतीय छात्र इस कार्यक्रम के सबसे बड़े लाभार्थियों में शामिल हैं। ओपीटी समाप्त होने की स्थिति में अमेरिकी शिक्षा प्राप्त करने वाले विदेशी छात्रों के लिए रोजगार के अवसर काफी सीमित हो सकते हैं। इससे अमेरिका की उच्च शिक्षा प्रणाली की वैश्विक आकर्षण क्षमता पर भी प्रभाव पड़ सकता है।संसद और उनके समर्थकों का कहना है कि वर्तमान लॉटरी आधारित एच-1बी प्रणाली योग्यता और आर्थिक मूल्य के बजाय भाग्य पर आधारित है। इसलिए विधेयक में लॉटरी समाप्त कर उच्च वेतन वाली नौकरियों को प्राथमिकता देने का प्रस्ताव रखा गया है। इस मॉडल के समर्थकों का मानना है कि इससे केवल अत्यधिक कुशल और उच्च मूल्य वाले पेशेवरों को अवसर मिलेगा। हालांकि आलोचकों का तर्क है कि इससे छोटे और मध्यम आकार के नियोक्ताओं के लिए प्रतिभाशाली विदेशी कर्मचारियों की भर्ती कठिन हो सकती है।ट्रंप प्रशासन के दौरान एच-1बी नीति को लेकर पहले भी अनेक सख्त कदम देखे गए थे और अब पुनः ऐसी चर्चाएं तेज हो गई हैं। अमेरिकी श्रम बाजार में घरेलू कर्मचारियों को प्राथमिकता देने,विदेशी श्रमिकों के वेतन मानकों को बढ़ाने, आवेदनों की जांच को कठोर बनाने तथा रोजगार-आधारित आव्रजन को सीमित करने जैसे विचार रिपब्लिकन राजनीति के एक प्रभावशाली वर्ग में लंबे समय से मौजूद रहे हैं। अमेरिकन व्हाइट-कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट इन्हीं विचारों का विधायी विस्तार माना जा रहा है।
साथियों, इस पूरे विवाद का सबसे अधिक प्रभाव भारतीय समुदाय पर पड़ सकता है। भारत एच-1बी वीजा प्राप्त करने वाले देशों में लंबे समय से अग्रणी रहा है। अमेरिकी तकनीकी उद्योग में भारतीय इंजीनियरों और पेशेवरों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। बड़ी संख्या में भारतीय परिवारों ने अमेरिका में स्थायी भविष्य की योजना एच-1बी से ग्रीन कार्ड की पारंपरिक यात्रा के आधार पर बनाई है। यदि यह मार्ग सीमित या बंद हो जाता है तो लाखों लोगों की दीर्घकालिक योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं।भारतीय छात्रों के लिए भी यह प्रस्ताव चिंता का विषय है। हर वर्ष हजारों छात्र अमेरिकी विश्वविद्यालयों में उच्च शिक्षा के लिए जाते हैं और ओपीटी तथा बाद में एच-1बी वीजा के माध्यम से अपने करियर की शुरुआत करते हैं। यदि ओपीटी समाप्त हो जाता है और एच-1बी प्राप्त करना अधिक कठिन हो जाता है, तो अमेरिका की तुलना में अन्य देशों जैसे कनाडा , ऑस्ट्रेलिया , यूनाइटेड किंगडम और जर्मनी अधिक आकर्षक विकल्प बन सकते हैं।हालांकि यह समझना आवश्यक है कि यह अभी केवल एक प्रस्तावित विधेयक है। अमेरिकी विधायी प्रक्रिया में किसी भी बिल को कानून बनने के लिए प्रतिनिधि सभा, सीनेट और राष्ट्रपति की स्वीकृति सहित अनेक चरणों से गुजरना पड़ता है। इसलिए इसका अंतिम रूप वर्तमान प्रस्ताव से भिन्न भी हो सकता है। फिर भी इसने अमेरिकी आव्रजन नीति की दिशा को लेकर गंभीर बहस शुरू कर दी है। समर्थकों का मानना है कि यह कानून अमेरिकी श्रमिकों की रक्षा करेगा, वेतन स्तर बढ़ाएगा और घरेलू प्रतिभा को प्राथमिकता देगा। दूसरी ओर आलोचकों का तर्क है कि अमेरिका की तकनीकी श्रेष्ठता का एक बड़ा कारण दुनिया भर से प्रतिभाशाली लोगों को आकर्षित करने की क्षमता रही है। यदि विदेशी पेशेवरों और छात्रों के लिए अवसर सीमित किए जाते हैं तो दीर्घकाल में अमेरिकी नवाचार क्षमता और वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता प्रभावित हो सकती है।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि अमेरिकन व्हाइट -कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट 2026 केवल एच-1बी वीजा सुधार का प्रस्ताव नहीं है,बल्कि यह अमेरिका में रोजगार, आव्रजन, राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा और आर्थिक राष्ट्रवाद के बीच चल रही व्यापक बहस का प्रतिनिधित्व करता है। यदि यह विधेयक पारित होता है तो एच-1बी वीजा का स्वरूप मूल रूप से बदल सकता है और विशेष रूप से भारतीय पेशेवरों, छात्रों तथा उनके परिवारों के लिएअमेरिका में अवसरों की संरचना नई चुनौतियों से भर सकती है। आने वाले महीनों में अमेरिकी कांग्रेस में इस विधेयक पर होने वाली चर्चा न केवल अमेरिका बल्कि वैश्विक प्रतिभा प्रवाह और अंतरराष्ट्रीय श्रम बाजार की दिशा तय करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए (एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र 9284141425

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