More

Social Media

Friday, July 19, 2024

बुद्ध पूर्णिमा 24 मई 2024 पर विशेष आलेख

नमोः तस्स भगवतों अरहतों सम्बुद्धस्स, बुद्धं, शरणम गच्छामि संघम शरणम गच्छामि

पीयूष त्रिपाठी
लखनऊ। भगवान बुद्ध का जन्म, ज्ञान प्राप्ति (बुद्धत्व या संबोधि) और महापरिनिर्वाण ये तीनों वैशाख पूर्णिमा के दिन ही हुए थे। इसी दिन भगवान बुद्ध को बुद्धत्व की प्राप्ति भी हुई थी। आज बौद्ध धर्म को मानने वाले विश्व में 180 करोड़ से अधिक लोग है तथा इसे धूमधाम से मनाते हैं। त्यौहार भारत, चीन, नेपाल, सिंगापुर, वियतनाम, थाइलैंड, जापान, कंबोडिया, मलेशिया, श्रीलंका, म्यांमार, इंडोनेशिया, पाकिस्तान तथा विश्व के कई देशों में मनाया जाता है।


बिहार स्थित बोधगया नामक स्थान हिन्दू व बौद्ध धर्मावलंबियों के पवित्र तीर्थ स्थान हैं। गृहत्याग के पश्चात सिद्धार्थ सत्य की खोज के लिए सात वर्षों तक वन में भटकते रहे। यहाँ उन्होंने कठोर तप किया और अंततः वैशाख पूर्णिमा के दिन बोधगया में बोधिवृक्ष के नीचे उन्हें बुद्धत्व ज्ञान की प्राप्ति हुई। तभी से यह दिन बुद्ध पूर्णिमा के रूप में जाना जाता है। बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर बुद्ध की महापरिनिर्वाणस्थली कुशीनगर में स्थित महापरिनिर्वाण विहार पर एक माह का मेला लगता है। यद्यपि यह तीर्थ गौतम बुद्ध से संबंधित है, लेकिन आस-पास के क्षेत्र में हिंदू धर्म के लोगों की संख्या ज्यादा है जो विहारों में पूजा-अर्चना करने वे श्रद्धा के साथ आते हैं। इस विहार का महत्व बुद्ध के महापरिनिर्वाण से है। इस मंदिर का स्थापत्य अजंता की गुफाओं से प्रेरित है। इस विहार में भगवान बुद्ध की लेटी हुई (भू-स्पर्श मुद्रा) 6.1 मीटर लंबी मूर्ति है। जो लाल बलुई मिट्टी की बनी है। यह विहार उसी स्थान पर बनाया गया है, जहां से यह मूर्ति निकाली गयी थी। विहार के पूर्व हिस्से में एक स्तूप है। यहां पर भगवान बुद्ध का अंतिम संस्कार किया गया था। यह मूर्ति भी अजंता में बनी भगवान बुद्ध की महापरिनिर्वाण मूर्ति की प्रतिकृति है।


श्रीलंका व अन्य दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में इस दिन को वेसाक उत्सव के रूप में मनाते हैं जो वैशाख शब्द का अपभ्रंश है। इस दिन बौद्ध अनुयायी घरों में दीपक जलाए जाते हैं और फूलों से घरों को सजाते हैं। विश्व भर से बौद्ध धर्म के अनुयायी बोधगया आते हैं और प्रार्थनाएँ करते हैं। इस दिन बौद्ध धर्म ग्रंथों का पाठ किया जाता है। विहारों व घरों में बुद्ध की मूर्ति पर फल-फूल चढ़ाते हैं और दीपक जलाकर पूजा करते हैं। बोधिवृक्ष की भी पूजा की जाती है। उसकी शाखाओं को हार व रंगीन पताकाओं से सजाते हैं। वृक्ष के आसपास दीपक जलाकर इसकी जड़ों में दूध व सुगंधित पानी डाला जाता है। पिंजरों से पक्षियों को मुक्त करते हैं व गरीबों को भोजन व वस्त्र दान किए जाते हैं। दिल्ली स्थित बुद्ध संग्रहालय में इस दिन बुद्ध की अस्थियों को बाहर प्रदर्शित किया जाता है, जिससे कि बौद्ध धर्मावलंबी वहाँ आकर प्रार्थना कर सकें। विश्व के सभी महाद्वीपों में बौद्ध धम्म के अनुयायी रहते हैं।

धार्मिक स्थल
चार मुख्य स्थल, लुंबिनी – बोध गया, सारनाथ – कुशीनगर, चार अन्य स्थल
श्रावस्ती – राजगीर, सनकिस्सा – वैशाली,

अन्य स्थल
पटना – गया, कौशांबी – मथुरा, कपिलवस्तु – देवदह, केसरिया – पावा, नालंदा – वाराणसी
बाद के स्थल, साँची – रत्नागिरी, एल्लोरा – अजंता, भरहुत – दीक्षाभूमि

भारत में इस विश्व धम्म का उदय हुआ था। इसके प्रवर्तक पूर्व बुद्ध तथा गौतम बुद्ध (ईसवी पूर्व 563 – ईसवी पूर्व 483) थे। 2010 में 15 अरब से 20 करोड़ जनसंख्या के साथ चीन बौद्धों की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। चीन की कुल आबादी में से लगभग 20 करोड़ लोग बौद्ध अनुयायी है। ज्यादातर चीनी बौद्ध महायान सम्प्रदाय के अनुयायी है। दुनिया की 68 प्रतिशत बौद्ध आबादी चीन में रहती है।

संपूर्ण एशिया में आज बौद्ध धम्म प्रभावशाली है। भारत में पूर्व बुद्ध पांच हजार ईसा पूर्व से है तथा इसवी पूर्व 6वी शताब्धि में उत्तर भारत में गौतमबुद्ध बौद्ध धम्म का उदय हुआ। फिर यह धम्म बौद्ध भिक्खु, बौद्ध प्रचारक और बौद्ध सम्राट और राजांओ के माध्यम से विश्व में दूर तक फैल गया।

बौद्ध परम्पराओं का सबसे बड़ा संप्रदाय महायान हैं। महायान व्यापक रूप से संपूर्ण पूर्वी एशिया में सर्वाधिक प्रचलित है, दुनिया की कुल बौद्ध आबादी में करीब 70 प्रतिशत बौद्ध आबादी महायान बौद्ध धर्म को माननेवाली है। चीन, हांगकांग, जापान, दक्षिण कोरिया, उत्तर कोरिया, ताइवान, मकाउ और वियतनाम में महायान बौद्ध धर्म बहुसंख्यक रूप में है।
बौद्ध धर्म का दूसरा सबसे बड़ा संप्रदाय थेरवाद है, और यह संप्रदाय ज्यादातर दक्षिण पूर्व एशिया रहता है। थेरवाद बौद्ध धर्म कंबोडिया, लाओस, म्यांमार, थाईलैंड, क्रिसमस द्वीप और सिंगापुर, श्रीलंका में बहुसंख्यक तथा मलेशिया, ब्रुनेई, तिमोर, इंडोनेशिया, फिलीपींस में भी बडी संख्या में है।

वज्रयान तीसरा और छोटा संप्रदाय है, ज्यादातर वज्रयानी बौद्ध तिब्बत, भूटान, हिमालय क्षेत्र, मंगोलिया और रूस के कुछ हिस्सों में बहुसंख्यक के रूप में रहता है, और यह संप्रदाय दुनिया भर में प्रसारित किया गया है।

नवयान भारत में मुख्य बौद्ध सम्प्रदाय है, इसे नवबौद्ध भी कहां जाता है। डॉ भीमराव रामजी सकपाल आम्बेडकर ने बौद्ध-दलित आंदोलन द्वारा इसकी शुरूवात की। 20वी सदीं में नवयान बौद्ध सम्प्रदाय का उदय हुआ था और उसका निर्माण दलितों को बराबरी एवं समानता का अधिकार दिलाना था, हालाँकि यह उद्देश्य अभी तक सफल नहीं हुआ। क्योंकि बौद्ध धम्म भी ऊंच नीच के भाव से अछूता नहीं है।

संपूर्ण विश्व में बौद्ध हैं। इनमें से लगभग 70 प्रतिशत से 75 प्रतिशत महायानी बौद्ध और शेष 25 प्रतिशत से 30 प्रतिशत थेरावादी, नवयानी (भारतीय) और वज्रयानी बौद्ध है। महायान और थेरवाद (हीनयान), नवयान, वज्रयान के अतिरिक्त बौद्ध धम्म में इनके अन्य कई उपसंप्रदाय या उपवर्ग भी हैं परन्तु इन का प्रभाव बहुत कम है। सबसे अधिक बौद्ध पूर्वी एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया के सभी देशों बहूसंख्यक के रूप में रहते हैं। दक्षिण एशिया के दो या तीन देशों में भी बौद्ध धम्म बहुसंख्यक है। एशिया महाद्वीप की लगभग 1/4 से ज्यादा आबादी पर बौद्ध धम्म का गहरा प्रभाव है। महाअमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, अफ़्रीका और यूरोप जैसे महाद्विपों में भी लाखो बौद्धों के समुदाय रहते हैं। विश्व में लगभग 18 से अधिक देश ऐसे हैं जहां बौद्ध बहुसंख्यक या बहुमत में हैं। विश्व में कई देश ऐसे भी हैं जहां की बौद्ध जनसंख्या के बारे में कोई विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध नहीं है।
प्रमुख बौद्ध तीर्थ

बौद्ध धर्म के उपासनास्थलों को विहार, स्तूप, मठ और पगोडा कहां जाता है। भगवान बुद्ध के अनुयायीओं के लिए विश्व भर में पांच मुख्य तीर्थ मुख्य माने जाते हैं।
माया देवी मंदिर, लुंबिनी, नेपाल

यह स्थान नेपाल की तराई में नौतनवां रेलवे स्टेशन से 25 किलोमीटर और गोरखपुर-गोंडा लाइन के नौगढ़ स्टेशन से करीब 12 किलोमीटर दूर है। अब तो नौगढ़ से लुम्बिनी तक पक्की सडक़ भी बन गई है। ईसा पूर्व 563 में राजकुमार सिद्धार्थ गौतम (बुद्ध) का जन्म यहीं हुआ था। हालांकि, यहां के बुद्ध के समय के कोई प्राचीन विहार नहीं मिले हैं। केवल सम्राट अशोक का एक स्तंभ अवशेष के रूप में इस बात की गवाही देता है कि भगवान बुद्ध का जन्म यहां हुआ था। इस स्तंभ के अलावा एक समाधि स्तूप में बुद्ध की एक मूर्ति है। नेपाल सरकार ने भी यहां पर दो स्तूप और बनवाए हैं।

बोधगया
करीब छह साल तक जगह-जगह और विभिन्न गुरुओं के पास भटकने के बाद भी बुद्ध को कहीं परम ज्ञान न मिला। इसके बाद वे गया पहुंचे। आखिर में उन्होंने प्रण लिया कि जब तक असली ज्ञान उपलब्ध नहीं होता, वह पिपल वृक्ष के नीचे से नहीं उठेंगे, चाहे उनके प्राण ही क्यों न निकल जाएं। इसके बाद करीब छह दिन तक दिन रात एक पिपल वृक्ष के नीचे भूखे-प्यासे तप किया। आखिर में उन्हें परम ज्ञान या बुद्धत्व उपलब्ध हुआ। सिद्धार्थ गौतम अब बुद्धत्व पाकर आकाश जैसे अनंत ज्ञानी हो चूके थे। जिस पिपल वृक्ष के नीचे वह बैठे, उसे बोधि वृक्ष यानी ज्ञान का वृक्ष कहां जाता है। वहीं गया को तक बोधगया (बुद्ध गया) के नाम से जाना जाता है।

धामेक स्तूप के पास प्राचीण बौद्ध मठ, सारनाथ, उत्तरप्रदेश, भारत
बनारस छावनी स्टेशन से छह किलोमीटर, बनारस-सिटी स्टेशन से साढ़े तीन किलोमीटर और सडक़ मार्ग से सारनाथ चार किलोमीटर दूर पड़ता है। यह पूर्वाेत्तर रेलवे का स्टेशन है और बनारस से यहां जाने के लिए सवारी तांगा और रिक्शा आदि मिलते हैं। सारनाथ में बौद्ध-धर्मशाला है। यह बौद्ध तीर्थ है। लाखों की संख्या में बौद्ध अनुयायी और बौद्ध धर्म में रुचि रखने वाले लोग हर साल यहां पहुंचते हैं। बौद्ध अनुयायीओं के यहां हर साल आने का सबसे बड़ा कारण यह है कि भगवान बुद्ध ने अपना प्रथम उपदेश यहीं दिया था। सदियों पहले इसी स्थान से उन्होंने धर्म-चक्र-प्रवर्तन प्रारंभ किया था। बौद्ध अनुयायी सारनाथ के मिट्टी, पत्थर एवं कंकरों को भी पवित्र मानते हैं। सारनाथ की दर्शनीय वस्तुओं में अशोक का चतुर्मुख सिंह स्तंभ, भगवान बुद्ध का प्राचीन मंदिर, धामेक स्तूप, चौखंडी स्तूप, आदि शामिल हैं।

महापरिनिर्वाण स्तूप, कुशीनगर, उत्तर प्रदेश, भारत
कुशीनगर बौद्ध अनुयायीओं का बहुत बड़ा पवित्र तीर्थ स्थल है। भगवान बुद्ध कुशीनगर में ही महापरिनिर्वाण को प्राप्त हुए। कुशीनगर के समीप हिरन्यवती नदी के समीप बुद्ध ने अपनी आखरी सांस ली। रंभर स्तूप के निकट उनका अंतिम संस्कार किया गया। उत्तर प्रदेश के जिला ख्कुशीनगर, में कुशीनगर बौद्ध अनुयायीओं के अलावा पर्यटन प्रेमियों के लिए भी खास आकर्षण का केंद्र है। 80 वर्ष की आयु में शरीर त्याग से पहले भारी संख्या में लोग बुद्ध से मिलने पहुंचे। माना जाता है कि 120 वर्षीय ब्राह्मण सुभद्र ने बुद्ध के वचनों से प्रभावित होकर संघ से जुडऩे की इच्छा जताई। माना जाता है कि सुभद्र आखरी भिक्षु थे जिन्हें बुद्ध ने दीक्षित किया।

दीक्षाभूमि, नागपुर, महाराष्ट्र, भारत
दीक्षाभूमि महाराष्ट्र राज्य के नागपुर शहर में स्थित महत्त्वपूर्ण बौद्ध तीर्थ स्थल है। बौद्ध धर्म भारत में ईसापूर्व 6वीं शताब्धीं से 12वीं शताब्दी तक रहा, किन्तु बाद में बौद्ध धर्म का प्रभाव कम होता गया और 12वीं शताब्दी में बौद्ध धर्म भारत से लुप्तप्राय हो गया।

लेकिन, डॉ॰ बाबासाहेब आंबेडकर ने 14 अक्टूबर, 1956 को हिन्दू धर्म त्यागकर अपनी पत्नी डॉ॰ माई साहेब आंबेडकर के साथ बौद्ध धम्म की दीक्षा ली और फिर अपने 5,00,000 हिंदू दलित समर्थकों को बौद्ध धर्म की दीक्षा दी। बौद्ध धर्म की दीक्षा देने के लिए बाबासाहेब ने त्रिशरण, पँचशील एवं अपनी 22 प्रतिज्ञाँए अपने नव-बौद्धों को दी। केवल तीन दिन में उन्होने 10 लाख से अधिक लोगों को बौद्ध धम्म की दीक्षा दी। एक सर्वेक्षण के अनुसार मार्च 1959 तक लगभग 1.5 से 2 करोड़ दलितों ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया था।ख्141, 1956 से आज तक हर साल यहाँ देश और विदशों से 20 से 25 लाख बुद्ध और बाबासाहेब के बौद्ध अनुयायी अभिवादन करने के लिए आते है। इस प्रवित्र एवं महत्त्वपूर्ण तीर्थ स्थल को महाराष्ट्र सरकार द्वारा ‘अ’ वर्ग पर्यटन एवं तीर्थ स्थल का दर्जा भी प्राप्त हुआ है।

I am the CEO founder of Page3news worldwide & Page3news foundation. Believe in simple living & high thinking.
Page3news is the first multilingual worldwide newspaper based in Thailand and is making news touch the truth without any fear, without any pressure.

Mr King (Parvinder Singh)
Founder & CEO - Page3News Worldwide
&
Dr. Monruedee Sommart
Co-Founder Page3news Worldwide

Email : [email protected]