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Friday, July 19, 2024

अहंकार, मुस्लिम विरोध व कर्मचारियों ने डुबो दी भाजपा की लुटिया

** संविधान व मुस्लिम आरक्षण बना चुनावी मुद्दा
** 10 करोड़ सरकारी कर्मियों की नाराजगी पड़ी सरकार पर भारी
** हर सभा में मोदी की गारंटी में नज़र आया अहंकार
** बसपा उम्मीदवारो ने भी किये मोदी के सपने चकनाचूर
** क्षत्रियों की नाराजगी व सही टिकट वितरण न होना भी कारण
** बदले की राजनीति भी नहीं पसंद आई वोटरों को


आर पी तोमर
खुद की 370 और गठबंधन की 400 पार सीटे प्राप्त कर विश्व रिकार्ड कायम करने का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सपना चकनाचूर हो गया है। हा गठबंधन ने उनके सिर पर तीसरी बार प्रधानमंत्री का ताज रखने लायक सीटे 292 अवश्य ही प्राप्त करा दी है। उन्ही के बल पर7 को वे संसदीय दल के नेता और 8 जून को तीसरी बार प्रधानमंत्री बन जाएंगे। मगर भाजपा खुद के बलबूते बहुमत से 32 सीटे पीछे रही है। इसके एक नही बल्कि अनेक कारण है। पूरे चुनाव में मोदी की गारंटी से लोगों को अहंकार की बू आयी। मुसलमानों के खिलाफ बोलने एवं विपक्ष द्वारा मुसलमानों को आरक्षण देने व संविधान मुद्दे से मुस्लिम एकजुट हुआ। बेरोजगारी, महंगाई व पेपरलीक मामला मुद्दा बना तो महिलाओं को एक लाख रुपये दिए जाने की घोषणा से महिलाएं इंडी गठबंधन के साथ आई। भाजपा का टिकट वितरण व राजपूतों व मतदाताओं की नाराजगी का कारण बना तो बसपा के दलित वोट इस बार भाजपा से इंडी गठबंधन में तब्दील हो गए।


आइए हम आपको बताते हैं कि भाजपा के सपनो को चकनाचूर करने के कौनसे वे बड़े कारण है।
उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि देशभर के करोड़ों सरकारी कर्मचारी पिछले काफी समय से पुरानी पेंशन की मांग कर रहे। हैं। देश मे पुरानी पेंशन पर कोई ठोस निर्णय नही लेना, भाजपा को भारी पड़ गया। दूसरी तरफ पुरानी पेंशन पर सॉफ्ट कार्नर रखने वाले इंडिया गठबंधन को सरकारी कर्मचारियों का साथ मिल गया। इसका सबसे ज्यादा प्रभाव उत्तर प्रदेश में हुआ। राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष संतोष तिवारी, कोषाध्यक्ष दिलीप चौहान व मीडिया प्रभारी विनीत सिंह भी यही मानते हैं कि 10 करोड़ सरकारी कर्मचारियों की नाराजगी भाजपा पर भारी पड़ गई। पुरानी पेंशन की मांग कई राज्यों में मानी भी गयी है लेकिन उत्तर प्रदेश में सरकार मांग मानने की बजाए कर्मचारियों को प्रताड़ित कर रही थी। इससे राज्य के लाखों कर्मचारियों और उनके परिजनों ने भाजपा के विरोध में सपा को वोट किया।

सपा नेता अखिलेश ने कर्मचारियों की इस मांग का समर्थन किया था तथा कांग्रेस के घोषणापत्र में शामिल करने को कहा था। यूपी सरकार की हठधर्मी से उसे नुकसान उठाना पड़ा है।
आम तौर पर बसपा को विपक्ष भाजपा की बी टीम कहकर टार्गेट करता रहा है पर कहानी कुछ और ही चलती दिख रही है। पश्चिम से पूरब तक मायावती ने ऐसे उम्मीदवार खड़े किए जिन्होंने एनडीए प्रत्याशी को ही नुकसान पहुंचाया। मेरठ में देवव्रत त्यागी, मुजफ्फरनगर से दारा सिंह प्रजापति, खीरी सीट से पंजाबी प्रत्याशी ने भाजपा को सीधा नुकसान किया। पूर्वी यूपी में घोसी में बीएसपी ने जो कैंडिडेट दिया वह सीधा इशारा था कि पार्टी ने एनडीए का काम खराब करने का ठेका ले लिया है। घोसी सीट पर बालकृष्ण चौहान ने एनडीए की 2 साल पुरानी तैयारी को ही पलीता लगा दिया। माया के मुस्लिम प्रत्याशी भी पार्टी को फायदा नहीं पहुंचा पाए। सपा नेता अखिलेश यादव ने उम्मीदवार उतारने में सूझबूझ दिखाई। चुनावों के दौरान अखिलेश यादव की इस बात के लिए बहुत आलोचना हुई कि वो बार-बार अपने प्रत्याशी बदल रहे हैं। पर इस बात की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने जो उम्मीदवार खड़े किए वो स्थानीय गणित के हिसाब से बेहतर थे। जिन्होंने भाजपा को धूल चटाई।


चुनाव में राजपूतों की नाराजगी व यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ को हटाने की अफवाह से भी अच्छा खासा नुकसान
भाजपा को हुआ। मुजफ्फरनगर में पूर्व विधायक संगीत सोम ने तो संजीव बालियान के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। उनके काफिले पर हमला भी कराया। ठाकुरों की विरोधी सभाएं भी हुई। कहने का मतलब यह भी है कि उत्तर प्रदेश में क्षत्रियों की नाराजगी की भी बीजेपी को कीमत चुकानी पड़ गई। गुजरात में परषोत्तम रुपाला का क्षत्रियों पर कमेंट मुद्दा बना। जिसका आंच यूपी तक महसूस की जा रही थी। इस बीच गाजियाबाद से जनरल वीके सिंह का टिकट कटना भी मुद्दा बन गया। मतलब साफ था किसी न किसी बहाने बीजेपी को टार्गेट करना। इस बीच चुपचाप तरीके से एक अफवाह यह भी फैलाई गई कि अगर बीजेपी को 400 सीटें मिलती हैं तो उत्तर प्रदेश के सीएम योगी आदित्यनाथ को बीजेपी हटा देगी। इस बात को लेकर आम आदमी पार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल ने बीजेपी पर जमकर हमला भी बोला। पश्चिमी यूपी में लगातार कई जिलों में राजपूतों ने सम्मेलन करके कसम दिलाई गई कि किसी भी हालत में बीजेपी को वोट नहीं देना है।

पेपर्स लीक और परीक्षाओं में देरी के चलते युवा पीढी ने माहौल बदला। गांव के लोगों के लिए जो बात सभी जातियों के लिए समान है वह है सरकारी नौकरियों की तैयारी। चाहे ऊंची जाति का घर हो या पिछड़ी या अनुसूचित जाति के परिवार हों, सभी घरों में सरकारी नौकरियों की परीक्षा की तैयारी करने वाले युवा हैं। इसमें लड़के और लड़कियां दोनों ही शामिल हैं। उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों में इसी मुद्दे पर युवाओं ने पहली बार बीजेपी को इसलिए ही वोट दिया था। पर बीजेपी की दूसरी सरकार के आते-आते परीक्षा माफिया एक बार फिर सरकार पर भारी पड़ने लगा है। यही कारण रहा कि उत्तर प्रदेश में इस समय राज्य में पेपर लीक और बेरोज़गारी के चलते युवाओं का गुस्सा सातवें आसमान पर रहा। भर्ती पेपर में गड़बड़ी और धांधली को लेकर अक्सर ही प्रदेश के युवा सड़कों पर संघर्ष करते नज़र आते हैं, तो वहीं भर्तियों का लंबा इंतज़ार भी वर्तमान सरकार के प्रति असंतोष का प्रमुख कारण रहा।


सबसे अहम कारण मुस्लिमों को आरक्षण एवं संविधान में बदलाव का मुद्दा रहा है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने खुलेआम कहा था कि यदि भाजपा को 400 सीटे मिल गयी तो वह संविधान बदल देगी और मुसलमानों को उससे काफी नुकसान होगा। वही राहुल व अखिलेश ने यह भी प्रचारित किया कि उनकी सरकार आने पर मुसलमानों को आरक्षण दिया जाएगा। दोनों ही मुद्दों से मुसलमान एकजुट हो गया और भाजपा के खिलाफ सपा- कांग्रेस गठबंधन को बढ़चढ़कर वोट किया। मतदान में मत प्रतिशत भी एक कारण रहा। मुसलिमों व भाजपा विरोधियों ने मतदान किया और भाजपा के मतदाता एसी से बाहर नहीं निकले। वे भीषण गर्मी से डरे सहमे बैठे रहे।


एक कारण यह भी बड़ा है कि भाजपा ने चुनाव का पूरा भार प्रधानमंत्री मोदी पर डाल दिया था। मोदी अपनी हर सभा में मोदी की गारंटी ही बोलते थे। उन्होंने राहुल गांधी सहित सभी विपक्षी नेताओं का मजाक उड़ाया और कइयों को जेल भिजवाने के लिए भी अपनी पीठ ठोकी। वही जे पी नड्डा ने तो यहा तक कह दिया कि भाजपा अपने बूते चुनाव जीतेगी उसे आरएसएस की जरूरत नहीं है। वह खुद मैनेज करना जानती है। मोदी व नड्डा के इन बयानों को जनता ने अहंकार माना।


संविधान व मुसलमानों को आरक्षण के मुद्दे के साथ ही बेरोजगारी के मुद्दे ने भी मतदाताओं को सपा व कांग्रेस के करीब लाने में मदद की।इसी के साथ महिलाओं को एक लाख रुपये सालाना दिए जाने से भी महिलाओं के रुख में परिवर्तन आया।

भाजपा ने उत्तर प्रदेश में 47 टिकट पुराने लोगों को दिए। इनके खिलाफ लोगों में जबरदस्त नाराजगी थी। इनमें अजय मिश्रा टेनी भी थे। 11मंत्रियो में से 7 की हार इसका प्रतीक है कि लोगों में किस कदर नाराजगी थी। 5 साल पहले 62 सीट जितने वाली भाजपा इस बार 33 पर सिमट गई। जबकि अखिलेश यादव ने उत्तर प्रदेश में दलित, पिछड़ा व अल्पसंख्यक का दांव खेला और 37 सीटे जीती। सपा का वोट शेयर 18 से बढ़कर 33 फीसद हो गया। उन्होंने 5 यादवों को तो 27 गेर नान ओबोसी उम्मीदवार मैदान में उतारे। जिनमें 11 अपरकास्ट(ब्राह्मण उम्मीदवारों समेत) दो ठाकुर, दो वैश्य, एक खत्री और 4 मुस्लिम, 15 दलित उम्मीदवार मैदान में उतारे थे जबकि भाजपा ने 75 उम्मीदवारों में से 34 अपर कास्ट(16 ब्राह्मण, 13 ठाकुर, 2 वैश्य और 3 अन्य अपरकास्ट) को टिकट दिए थे। वही 25 ओबीसी व एक यादव भी मैदान में उतारा था।

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